मंगलवार, 14 जून 2016

-सम्भावना-


एक नेता कम ठेकेदार और नौकरशाह कम धनपशु के समधी बनने से गांव के दक्खिन अंलग को छू कर गुजरती कच्ची सड़क कोलतार से खिल उठी ।
छोटे-मोटे खेतिहर, मजूर सड़क के किनारे अपने-अपने हक-हिस्से का बखरा-बटवारा करके नाद, कोहा, गाय, बकरी, मुर्गा-मुर्गी लेकर आ बसे ।
शहर और कस्बे को जोड़ती नयी बनी सड़क ने दूर दराज के गांव के खेतिहर समाज मे कई तरह से हस्तक्षेप कर दिया ।
मसलन महिलाओं का कुछ समय खेती-बारी, गाय-गोरु के काम से खाली होकर, सास-जेठान के तानो से उबकर एकान्त ओढ़कर किसिम-किसिम की सवारियों और आते जाते लोगों को निहारते वक्त कट जाता था।
बुर्जुगों के लिए सड़क टी0वी0 स्क्रीन थी, जिस पर पल-पल बदलती छवियांे को निहारते समय बीत जाता था।
नई नेवलियों के लिए सुबह-शाम की शौच के लिए आबादी से कुछ दूरी पर स्थित पटरियां हंसी-ठिठोली का स्थान बन गयी थी ।
छोटे बच्चो के लिए खाली सड़क गाहे-बगाहे क्रिकेट की पिच हो जाती थी ।
गांव के किशोर आबादी से कुछ आगे पुलिया पर बैठ कर फिल्मी हीरो-हिरोइनों, द्विअर्थी गीतों और क्रिकेट मैचों पर एक दूसरे के अज्ञान की खिल्ली उड़ाते।
महानगरों मे खट रही जवानियों के पसीने से इन किशोरो के हाथ मे सेकेण्ड हैण्ड मोबाइले आ गयी थी, जिसपर सुलभ अश्लील फिल्मों ने नारी देह का मूर्तन कर दिया था।
मोबाइल और टी0वी0 स्क्रीनो पर तैरते अथाह सम्पन्नताओ मे डूबे जीवन की छवियों ने इन किशोरो को अपनी वास्तविक दुनिया से निराश कर दिया था ।
ऐसी ही एक थकी हुई रात के अंधेरे मे दो हेडलाइटें आपसे में चीख कर टकरा गयी ।
एकाएक पसरे सन्नाटे को कुछ चीखों, खूंटे पर बंधे पगुरी करते जानवरों और दरबो मे बन्द मुर्गे-मुर्गियों ने तोड़ा और फिर सभी दौड़ पड़े।
कुछ ने लथपथ शरीरो मे जिन्दगी की उम्मीद टटोली और कुछ ने मोबाइल, पर्स और नगदी टटोली ।
गांव का उम्रदराज मानस अपने पालितों के इस बर्बरता पर स्तब्ध था, लेकिन जिनमे जीने की लालसा थी उनके लिए ये दुर्घटना कुछ सुविधाओं के लिए एक सम्भावना थी ।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

डर

बहुत डरते हैं बड़े बाबू।
सुबह के अखबार मे बलात्कार की खबरें पढ़कर डर जाते हैं कहीं उनकी कालेज जाती बेटियों के साथ ऐसा न हो ।
सड़क दुर्घटना में इकठ्ठी भीड़ के बगल से डरते हुए निकल जाते हैं कहीं इसमे कोई अपना न हो ।
बीमार परिचित के हास्पिटल के बिल को देखकर डरते हैं कि इतना बिल उनके नाम पर होगा तो किससे-किससे उधार मांगेगे ।
किसी छात्र, नौजवान की आत्महत्या की खबर पढ़कर डर जाते हैं क्योंकि बड़का आजकल बहुत गुम-सुम रहता है।
शादी के पण्डाल की भब्यता देखकर डरते हैं कि बेटियों के लिए इतना जोगाड़ कहां से करेगें ।
साहब का चेम्बर खोलते हुए डरते हैं, कही साहब को पुराना हिसाब याद आ गया ता कौन सा नया बहाना बनाएगें ।
अपने टेबुल के सामने खड़े आसामी की तरफ जानबूझकर निगाह नही उठाते हैं कहीं जान-पहचान का हवाला न देने लगे ।
बस इसी तरह अपने डर से डरते हुए ठहाका लगाते हैं ।
सामने वाली कुर्सी की बिरादरी पर बना मुहावरा मन में दुहराते हैं ।
टेबुल पर फैले कागज को गरियाते हैं ।
लेबरो की बढ़ती मजूरी और साग-तरकारी की मंहगाई का किस्सा सुनाते हैं ।
और डरते हुए पान की दुकान पर निकल जाते हैं, बड़े बाबू ।

कितनी

सुबह,
कितनी सुबह है ?
रात,
कितनी रात है ?

भूख,
कितनी भूखी है ?
प्यास,
कितनी प्यासी है ?
दुख,
कितना दुखी है ?
दर्द,
कितना सर्द है ?
स्याह,
कितना जर्द है ?
मौन,
कितना मुखर है ?
प्रश्न,
कितना प्रखर है ?
मृत्यु,
कितनी अमर है ?

-मुकाम-


कपड़ो से ठुंसे वार्डरोब,
पक्कवानों से भरा रसोंईघर,
आलीशान बैठक खाना,
शानदार पूजा घर,
देखते ही,
आधुनिक गुफा मानवों
की मेरी तलाश को
मुकाम मिल जाता है।
किसी अस्त ब्यस्त मकान मे,
बिखरी किताबे,
उनके बीच छिपा चश्मा,
सूखकर लुढ़के हुए प्याले,
बताते है यहां,
इस ज्ञात ब्रम्हाण्ड मे,
चेतन होने की विशिष्टिता को महसूस करते,
खिड़की से झांकते बच्चों की,
खिलंदड़ी हंसी को ठहाकों से,
गुंजायमान करते,
छोटी-छोटी गुत्थियों को,
सुलझाने मे,
बड़ी-बड़ी खुशियां तलाशते,
किसी आधुनिक मनुष्य का डेरा है,
जहां
न क्षुद्रताओं का वृत्त है,
न धूर्तताओं का घेरा है।

परधानी का गणित


परधानी का गणित बड़ा कठिन होता है। सदियों की बसावट मे किसको कौन सी बात चुभी है, कौन किस पुश्त की अदावत सहेजे हुए है, वोट मांगने और देने मे पता चल जाता है। पूरा गांव किंग मेकर होता है और सभी खुद लड़ रहे होते हैं । दो चीजे प्रभावी भूमिका अदा करती है, लालच और नफरत । गांव के गणितज्ञ प्रत्येक वोट या परिवार पर बारी-बारी से इन दोनो सूत्रों का प्रयोग करते हैं । दुश्मनी कोई भी हो सकती है, बाप-दादों के जमाने की या हाल की । सभी प्रत्याशी समान भाव से इसको भंजाते हैं। जाति और खानदान शादी-विवाह के अलावा इस चुनाव मे सबसे प्रभावी भूमिका में होते हैं । यह ऐसा उत्सव होता है, जिसमे इष्र्यालु पड़ोसी के पक्ष की पराजय का जश्न होता है, पुश्तों के अपमान का प्रतीकात्मक बदला होता है । महंतो के मठ मे अगले कुछ साल के लिए भर्ती हो रहे नए चेलो का प्रवेश समारोह होता है और कुछ पुरा छात्रों का मिलन समारोह होता है। गणितज्ञों को यह भी पता होता है कि इससे बदलेगा कुछ नही बस कउड़ा और चट्टियों पर बैठने वाले चेहरे अपनी जगह बदल लेंगे । पंचायत की सीमित भूमिका सरकारी इमदाद को गरीबो मे न्यायपूर्ण बटवारे भर की होती है लेकिन इससे खेलते हैं प्रायः गांव के दबंग और अमीर लोग। सब इसको इसी तरह खेलते हैं चाहे रोजही पर मजूरी करने वाला हो या ए0सी0बोगी मे टिकट बुक कराकर वोट देने पहुंचा परदेशी ।

-फर्क-


कुत्ते से सावधान
लिखी इबारतों से सजे,
मुहल्लों से गुजरते हुए,
भ्रम बना रहता है,
इन इमारतों मे
,आदमी रहते हैं
या
कुत्ते बसते हैं ।
ये इमारते अगर,
व्यवस्था से वफादारी का इनाम हैं,
तो इसके बाशिन्दों के
गले में बंधा पट्टा
दृश्य भी हो सकता है
,अदृश्य भी हो सकता है,
फर्क मेरे चश्मे के लेंस का है
या लहूलुहान आदमी के सेंस का है।

-किस्त-


दरकते ग्लेशियरों का शोर,
सुलगते जंगलों का धुआं,
हिलती जमीन के सातवें मालें पर,
दम घोंटता वातानुकूलित ड्राइंग रुम,
बेचैनी में बदलते चैनलों पर,
चिर युवा मादाओ की थिरकन,
और,
दवाइयों का गुच्छा निगलते-निगलते,
याद आया,
सुदूर देहात का कोई सहोदर,
जिसके साथ ठिठुरते पाले में,
साझा रजाई में,
ढिबरी की रोशनी में,
रटे आधुनिक ज्ञान केे मंत्रों से,
खुले थे परजीविता के द्वार।
लाल-हरी होती बत्तियों,
दौड़ते-ठिठकते चैराहों के बीच,
फुटपाथ पर बेहाल परिचित सा चेहरा,
आभासी नही वास्तविक दुनिया का,
कोई साझा मित्र था,
जिसे समान्तर निगाहों से निहारते,
बदलते रहे गियर,
क्योंकि इस थरथराती जमीन पर,
जिन्दगी बस क्रेडिट कार्ड है,
और सांसे ...........................,
इ0एम0आई0 की अगली किस्त ।

कन्फ्यूज

जिन्दगी के शुरुआती दौर में लगता है हम इस ब्रम्हांण्ड या ज्ञात विश्व के केन्द्र में हैं या उसके आस-पास हैं और यह समूची सृष्टि हमें निहार रही है । हमारी ये धारणा हमें बचपन और किशोरावस्था में मिलने वाले प्रेम से विकसित होती है । कुछ दशक बीतते-बीतते हमे आभास होने लगता है अपनी मिथ्या धारणा का और हम स्वीकार करने लगते हैं कि हम मात्र कुछ रसायनों के समुच्चय या भौतिक गुणों के संयोग मात्र हैं................इस अनन्त ब्रम्हाण्ड के दूर-दराज उपेक्षित कोनों मे पड़े कण मात्र । इस यथार्थ से अस्वीकार हमें प्रेमी बनाता है या आस्तिक, कन्फ्यूज हो रहा हूं।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

च ौथी स्टेज

 
डाक्टर की फुसफुसाहट
कमरे से बाहर तैर गयी,
च ौथी स्टेज है यह सुनते ही,
दुनिया पराई नजर आयी।
कर्ज कितना रह गया है,
बेटे की पढ़ाई का,
बेटी की शादी का,
बीमा जमा है या नही,
सोचते हुए यह भी लगा,
चलो यार बहुत जी लिए।
तभी दौड़ने लगा बचपन,
दादा की गोदी में,
कबड्डी मे, छुपम-छुपाई में,
अरे इतनी जल्दी सबकुछ खत्म।
अभी तो दो इन्क्रीमेन्ट और लगता,
प्रमोशन की सम्भावना दिख रही थी,
बेटे को भी आफर था अच्छी कम्पनी का,
शादी के लिए मालदार पार्टी मिली थी,
सबकुछ इतना ठीकठाक चल रहा था
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
बचपन का मित्र,
कितना जल्दी चला गया,
उसको तो कोई चेतावनी भी नही मिली,
ऐसे ही नेताओं,ठेकेदारों, पुलिस से लड़ते,
जाड़े की एक सुबह,
गन्ने के खेत के किनारे
छलनी पड़ा था,
और उसी रात उसने,
सरकारी कोटेदार के यहां बोटी तोड़ी थी ।
केंचुए की तरह जीते,
जोंक की तरह खून पीते,
लोमड़ी की तरह सम्भावना सूंघते,
वक्त कब गुजर गया,
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
कितनी बार बचा था,
ट्रªेन हादसे मे दूसरी बोगी में था,
बम फटने के पहले बाजार से निकल चुका था,
कितनी जाचों में बाल-बाल बचा था,
किसी जूलूस मे नही,
किसी नारे में नही,
चर्चित मंदिर में नियमित चढ़ावा,
कितना नियमित और पवित्र जीवन,
लेकिन अचानक च ौथी स्टेज।
पाश कालोनी के किसी बंगले में,
किसी शाम बत्तियां बुझी होंगी,
उदास बैठे होगें ड्राइवर,नौकर,
मृत्यु के कर्मकाण्ड,
कुछ लोग निभाएगें,
देर रात वाली ट्रेन से,
वापस लौट जाएगें,
जैसे उसने निभायी थी,
अनचाही औपचारिकता,
उसी तरह।

छठ


भारतीय उप महाद्वीप की मानव समूह की बसावटों मे खान-पान की भिन्नता पर गौर किया जाय तो उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो से शुरु होकर बिहार-बंगाल तक भोजन में चावल की प्रमुख भूमिका का क्षेत्र शुरु होता है और यहीं से स्त्री प्रभावी समाज के लक्षण भी दिखाई देने लगते है । इसी क्षेत्र के हिन्दी पट्टी मे बनारस के गंगा नदी के पश्चिमी भाग के देहातों में तालाबों के किनारे इस त्योहार के ढोल नब्बे के दशक के दूसरे अद्र्धाश्ंा मे बजते सुनाई पड़ते हैं, जब पश्चिमी बिहार के समीपवर्ती जिलों की बेटियां अपनी परम्पराओं साधिकार मनाने निकलतीं है और पुरुष सहयोगी की भूमिका मे उनके पीछे-पीछे चलते हैं । हम खुश हो सकते हैं कि इस त्योहार को मनाने के लिए स्त्री आंगन की दहलीज लांघती है और पुरुष सहयोगी भूमिका मे होता है । इस त्योहार को दलित भागीदारी कितनी है मुझे नही पता क्योंकि इसके बारे में जानने का प्रयास मैने नही किया, लेकिन इस त्योहार के कर्मकाण्ड मे स्त्री सशक्तीकरण देखने वाले लोगों के साथ मेरी असहमति है कि दलित और पिछड़े समाज की समाज की स्त्रियां अधिक स्वावलम्बी रही हैं और उनके लिए इस त्योहार मे सम्मिलित होना इसके बाजारु स्वभाव को इन्ज्वाय करना मात्र है। ढोल की थाप पर थिरकती स्त्री के आनन्द को महसूस कीजिए, आप एक समाजवादी परिवार द्वारा सोना-चांदी ओढ़कर परोसे जा रहे बाजार के कसैलेपन से मुक्त हो जाएगें ।

-श्रद्धांजलि-


हाईस्कूल मे पढ़ने के लिए जाते समय कस्बे के साप्ताहिक बाजार के लिए छोड़े गए मैदान को पार करना पड़ता था। कस्बे में दो साप्ताहिक बाजार लगते थे, जिनके लिए दो अलग-अलग मैदान थे और वे बाजार के दिन के अलावा खाली रहते थे । एक मैदान को मंगल की बाजार कहा जाता था और दूसरे मैदान को शुक्र का बाजार कहा जाता था । हम विद्यार्थियों का झुण्ड मंगल की बाजार को धूल उड़ाते हुए पार करके एक गली में घुसता था । गली एक मिर्जा साहब के मकान को पार करके समकोंण पर मुड़ती थी, मिर्जा साहब कस्बे के एक अन्य इण्टर कालेज के वाइस प्रिन्सीपल थे और उस समय के सहपाठियों से मिली जानकारियों के अनुसार उनका परिवार कस्बे का पढ़ा लिखा परिवार था। बिना बरामदे वाले पक्के मकान के मुख्य दरवाजे पर लटका पर्दा मकान के लोगों को बाहरी दुनिया से एकान्त प्रदान करता था । उस मकान के ठीक सामने वाले रास्ते के उस पार की दीवार पर गेरु से एक नारा लिखा होता था ‘ हम हैं हिन्दू साठ करोड़, ताला देगें तोड़ मरोड़‘। यह नारा उस मकान के आंगन से निकलने वालो को बाहर की तल्ख हो रही दुनिया का एहसास कराता होगा और लगातार घूरता रहता होगा, अब ये महसूस करता हूं।
अस्सी का दशक था, हम प्रतिदिन स्कूल जाते हुए इस नारे को पढ़ते और कभी कभी उसका समवेत उच्चारण करते, बिना ये महसूस किए कि ये समवेत स्वर जो मात्र खिलवाड़ होता था, उस मकान के भीतर रहने वाले परिवार जनों को कितना खौफजदा करता होगा । लेकिन हमारे लिए ये मात्र खेल होता था । दुनियां के बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समाज के रिश्तों को केर-बेर के रिश्तो मे बदलने वाले शिल्पकारों की बढ़ती संख्या मे अशोक सिंघल जी का जाना एक जैविक क्षति है । मैं यही कामना करता हूं कि हिन्दू विश्वासों के आधार पर उनका अगला जन्म मानव योनि कें किसी अल्पसंख्यक समुदाय में हो ।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...