मुक्त मन

 सूचना मिलनें में विलम्ब के कारण सैमुअल मोर्स अपनी 25 वर्ष की युवा पत्नी की कब्र ही देख पाए और इस विवशता से एक संकल्प पैदा हुआ कि सूचना के समयान्तराल को न्यूनतम कैसे किया जाय और उनके इस भावनात्मक दुख ने एक तर्क प्रणाली विकसित किया जो मोर्स कोड के रुप जाना जाता है और पत्नी की मृत्यु के 18 साल बाद अमरीकी सीनेट ने इस प्रणाली के व्यावहारिक प्रयोग की वित्तीय स्वीकृत सन् 1844 में दी और सूचनाओं की विद्युत गति ने जन सामान्य की सुविधा के साथ ही राजसत्ताओं को नए किस्म का हथियार थमा दिया। हां मोर्स मूलतः चित्रकार थे

1844 के बाद से सूचनाओं के प्रेषण में इतने बहुआयामी बदलाव हो चुके हैं कि मोर्स कोड भी आज घोड़ा-गाड़ी दौर की तकनीक से ज्यादा नही लगती। आज सूचनाओं के तरंग प्रवाह में हम खुद को एक स्क्रीन के रुप में बदल रहे हैं, जिसपर हमारी छवियां निरंतर प्रसारित हो रही हैं। यह स्क्रीन या पारदर्शिता सर्वसत्तावाद का नया चेहरा है, जो व्यक्ति को स्वयं को स्वेच्छा से निरंतर उजागर करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
सोशल मीडिया व्यक्ति की अपनी प्रवित्तियों को लाइकेबुल या सर्वस्वीकार्य बनाने की प्रवृत्तियों के अधीन करता जा रहा हैं और इस तरह से हम बहुमत के प्रवाह में बहने के लिए दिशा नियंत्रित तैराक बन गए हैं। जबकि बर्चुवल विश्व में बहुमत भी कल्पित होनें की सम्भावना से भरा हुआ है।
हमारी सहज प्रतीत होने वाली प्रवित्तियों पर कारपोरेट और पूंजी के नियंत्रण की अदृश्य जंजीर हमारी प्रवृत्तियों को जाने-अनजाने एक निर्धारित दिशा दे रही है, जो हमें स्वाभाविक प्रतीत होता है। यह पारर्शिता स्वतंत्रता नहीं अपितु एकरुपता पैदा कर रही है, क्योंकि जब हर कोई हर किसी को देख रहा है तो हर कोई लाइकेबुल बनना चाह रहा है और उसकी स्वीकार्यता की भूख ने उसकी मौलिकता और विभिन्नता को आत्मनियंत्रण के पारदर्शी फिल्टर में गुम कर दिया हैं।
यह जाने या अनजाने निगरानी की लोकतांत्रिक प्रणाली है, जिसकी अदृश्य कांचनुमा जेल में हम स्वयं खुशी-खुशी कैद होने के लिए प्रस्तुत हैं। पूंजी और सत्ता के लिए यह सबसे अनुकूल जेल है क्योंकि हमारे मस्तिष्क का वो हिस्सा जो भावनाओं के लिए जिम्मेदार है उस हिस्से से अधिक प्रभावी है जो तर्क के लिए जिम्मेदार हैं और भावनाएं ही हमारी सुख-दुख का कारण बनती हैं तो कोई तर्क दुख का कारण बने तो हमारा दिमाग उसके विकल्प तत्काल ढूढ़ने लगता है और कोई तर्क सुख का कारण बनता है तो हम उसे तत्काल स्वीकार कर लेते हैं। इसी भावनात्मक दोहन का उपयोग करके सूचना तरंगों पर विकसित विज्ञापन उद्योग टिका हुआ है।
सूचनाओं के इस लोकतंत्र में हम भावनात्मक सुखों में विभोर होने के लिए उसके स्वीकार्य तर्क प्रणाली में इतने डूबते जा रहे हैं कि या तो उस परिधि के बाहर देखनें की क्षमता सीमित होती जा रही है अथवा हम अपनी मनोभूमि के अनुरुप कोई तर्क प्रणाली स्वीकार करके खुद को संतुष्ट कर ले रहे हैं।
तो इस वर्चुवल विश्व में स्वामी दयानन्द सरस्वती या कबीर होना अधिक चुनौती पूर्ण है, जबकि राजनैतिक सत्ताएं अपने-अपने भूगोल में लाल, हरा, केसरिया विचारों के एकाधिकार को संरक्षित और सुरक्षित रखनें में अधिक सक्षम हो गयी हैं।
त्रासदी यह है कि सत्ताएं व्यक्ति को अधिकतम पारदर्शी बनने के लिए प्रेरित कर रही है लेकिन अपने शीर्ष के गोपन को अधिकतम सुरक्षित रखनें की प्रविधियों का निरन्तर विकास कर रही है। तभी तो अधिकतम लोकतंत्र का दावा करने वाली महाशक्ति सूचनाओं को विद्युत गति से प्रवाहित होने का प्राविधान करने के लगभग 166 वर्ष बाद अपने ही सत्तातंत्र के शीर्ष रहस्यों की सूचना को उजागर करने वाले पत्रकार को गिरफ्तार करने का रेड कार्नर नोटिस जारी कर देती है। लेकिन परिवर्तन अटल नियम है सत्ताएं अपने अंतविरोध के कारण ढहती भी रही हैं।

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