च ौथी स्टेज

 
डाक्टर की फुसफुसाहट
कमरे से बाहर तैर गयी,
च ौथी स्टेज है यह सुनते ही,
दुनिया पराई नजर आयी।
कर्ज कितना रह गया है,
बेटे की पढ़ाई का,
बेटी की शादी का,
बीमा जमा है या नही,
सोचते हुए यह भी लगा,
चलो यार बहुत जी लिए।
तभी दौड़ने लगा बचपन,
दादा की गोदी में,
कबड्डी मे, छुपम-छुपाई में,
अरे इतनी जल्दी सबकुछ खत्म।
अभी तो दो इन्क्रीमेन्ट और लगता,
प्रमोशन की सम्भावना दिख रही थी,
बेटे को भी आफर था अच्छी कम्पनी का,
शादी के लिए मालदार पार्टी मिली थी,
सबकुछ इतना ठीकठाक चल रहा था
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
बचपन का मित्र,
कितना जल्दी चला गया,
उसको तो कोई चेतावनी भी नही मिली,
ऐसे ही नेताओं,ठेकेदारों, पुलिस से लड़ते,
जाड़े की एक सुबह,
गन्ने के खेत के किनारे
छलनी पड़ा था,
और उसी रात उसने,
सरकारी कोटेदार के यहां बोटी तोड़ी थी ।
केंचुए की तरह जीते,
जोंक की तरह खून पीते,
लोमड़ी की तरह सम्भावना सूंघते,
वक्त कब गुजर गया,
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
कितनी बार बचा था,
ट्रªेन हादसे मे दूसरी बोगी में था,
बम फटने के पहले बाजार से निकल चुका था,
कितनी जाचों में बाल-बाल बचा था,
किसी जूलूस मे नही,
किसी नारे में नही,
चर्चित मंदिर में नियमित चढ़ावा,
कितना नियमित और पवित्र जीवन,
लेकिन अचानक च ौथी स्टेज।
पाश कालोनी के किसी बंगले में,
किसी शाम बत्तियां बुझी होंगी,
उदास बैठे होगें ड्राइवर,नौकर,
मृत्यु के कर्मकाण्ड,
कुछ लोग निभाएगें,
देर रात वाली ट्रेन से,
वापस लौट जाएगें,
जैसे उसने निभायी थी,
अनचाही औपचारिकता,
उसी तरह।

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