शनिवार, 24 जनवरी 2026
जेन जी के द्वन्द
सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगातार इकठ्ठी हुई मलाइयों से घी निकाला जाता है। यह घी एक स्थिर भौतिक परिस्थितियों या वातावरण से निर्मित होती है, यदि दूध को इतना स्थायित्व न मिले वो लगातार हिलता डुलता रहे तो दही या मलाई नहीं बन सकती है और घी जो उसका अगला श्रेष्ठ उत्पाद है उसे नहीं निकाला जा सकता है।
इसी तरह से हमनें अतीत में अपने जीवन का अर्थ और स्थायित्व निरन्तरता से परिपूर्ण धार्मिक या वैचारिक कहानियों के जरिए पाया, जो हमारेे दैनिक कार्यो को बड़े ब्रह्मांडीय उद्देश्यों से जोड़ती थीं। खेती का काम करना प्रकृति की निरन्तरता में हिस्सा लेकर ईश्वरीय व्यवस्था से जुड़ना था। अपने देश, धर्म, जाति के लिए लड़ना सिर्फ संगठित हिंसा नहीं अपितु उन पवित्र मूल्यों तथा पैतृक परंपरा की रक्षा करना था, जिससे कि भविष्य की पीढ़ियाँ देश, धर्म, जाति मूल्यों के अनुसार जी सकें। बच्चे पैदा करना सिर्फ जैविक प्रजनन नहीं वंश परम्परा के पवित्रता की निरंतरता सुनिश्चित करना था।
इन मूल्यों को गढ़ने वाली धार्मिक कहानियाँ इसलिए काम करती थीं क्योंकि वे हर व्यक्तिगत कार्य को, चाहे वह कितना भी मामूली क्यों न हो, जैसे दिन विशेष को कोई कोई कार्य करना या नहीं करना, पशु विशेष से नफरत या प्यार करना, बाल या दाढ़ी कैसे रखना है, शौच या स्नान की क्या विधि है आदि आदि से हमारे अस्तित्व को अंतिम अर्थ और भाग्य के बारे में एक बड़ी परिकल्पना से जोड़ती थीं।
आधुनिक ज्ञानोदय ने इन धार्मिक कहानियों को दूसरी उतनी ही बड़ी कहानियों से बदलने की कोशिश की। जैसे वैज्ञानिक प्रगति आखिरकार ब्रह्मांड के सभी रहस्यों को उजागर करेगी और सभी मानवीय समस्याओं को हल करेगी। सामाजिक न्याय आखिरकार एक पूरी तरह से समान समाज बनाएगा जहाँ सभी अनावश्यक दुख खत्म हो जाएंगे। आर्थिक विकास आखिरकार पूरी मानवता के लिए भौतिक समृद्धि लाएगा। इनमें से प्रत्येक कहानी ने वादा किया कि व्यक्तिगत कार्य मानवीय स्थिति में प्रगतिशील सुधारों में योगदान देंगे जो आखिरकार किसी न किसी रूप में सांसारिक स्वर्ग में बदल जाएंगे। लेकिन ये कहानियाँ अपने पूर्ववर्ती धार्मिक कहानियों की तुलना में कहीं अधिक अस्थाई साबित हो रही हैं।
वैज्ञानिक उत्तर नए और जटिल प्रश्न उत्पन्न कर रहा है। सामाजिक न्याय की खोज में दिखाई पड़ रहा है कि अलग-अलग समूहों के पास न्याय की अलग-अलग परिभाषाएँ हैं। असमानता के कुछ प्रकारों को खत्म करने के प्रयास में अक्सर असमानता के नए रूप पैदा हो रहे हैं। समानता को अधिकतम करने के लिए डिजाइन की गई प्रणालियाँ अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नियंत्रित करती हैं। भौतिक जीवन स्थितियों में मात्र सुधार अधिक खुशी या संतुष्टि नहीं दे रहा है। अधिक उन्नत समाज ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जो सरल समाजों में नहीं पायी जाती हैं।
इसी दौर में हमने यह भी पाया कि एक सीमित ग्रह पर अधिकतम उपभोग का अनंत आर्थिक विकास का मॉडल विनाशकारी पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा रहा है। कई तकनीकी आविष्कार जितनी तेजी से पुरानी समस्याओं को हल करते हैं, उतनी ही तेजी से नई समस्याएं भी पैदा कर रहे हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था जहां ज्यादातर नौकरियां अस्थाई और आखिरकार ऑटोमेटेड हो रही हैं, में पेशेवर करियर में स्थायित्व या संतुष्टि का विचार भ्रामक होता जा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए लगातार प्रदर्शित व्यक्तिगत पहचान नाटकीय हो गयी है। सदियों से मौजूद पेशे देखते देखते गायब हो रहे हैं। अपनी दुनियां में सदियों से जी रहे भिन्न भिन्न भौगोलिक समुदाय आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता की आंधी में उखड़ते जा रहे है। इन बदलावों से उत्पन्न अस्तित्वगत संकट लोगों को अधिकतम उपभोग, लगातार मनोरंजन या चरमपंथी विचारों की तरफ ढकेल रहे हैं।
त्रासदी यह है कि परिवर्तन की आंधी से लगातार कंपित होते हमारे चित्त को वह स्थायित्व नहीं मिल पा रहा है, जिससे नवीन जीवन मूल्यों का घी निकाल सके। यानी बदलाव की गति हमारी वैचारिक अनुकूलन की गति से ज्यादा तीव्र होती जा रही है।
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