शनिवार, 24 जनवरी 2026
पिता-2
पिता समय के ताप में पिघल रहे हैं। पट्टीदारों से झगड़ा, भाइयों से मनमुटाव, लाभ शून्य खेती, बेटे का आंशिक रोजगार पिता की लटकती झुर्रियों, दांत छोड़ते मसूडा़े, धीरे-धीरे झुकते कंधो पर चिपक गए हैं।
पिता सड़क की जमीन के लिए भाईयों से लड़े थे, प्रधानी के चुनाव में एनमौके पर पैसा लेकर पाल्हा बदल दिए थे, गांव के झगड़े में न्याय-अन्याय की जगह बिरादरी चुने थे, गरीब रिश्तेदार की जरुरत पर मदद की जगह अमीर रिश्तेदार के तमाशे में नाचे थे। और इस तरह पिता ने अपने पीछे खड़ी छोटी सी दुनिया को अपने स्वार्थ के पंखों से सहेजा था।
मण्डी से लौटते पिता के साइकिल की हैण्डिल में लटकती जलेबी की पन्नी जब दुआर पर रुकती तो उसके सामने चहकती छोटे-छोटे भाई बहनों की खुशियों में पिता के चेहरे पर भोर से दोपहर तक की थकान नहीं मुस्कान होती थी, बिटिया की फरमाइशों को पूरा करने के लिए मां से लड़ जाने वाले वो शायद अंतिम पुरुष थे, बेटे की सरकारी नौकरी के लिए जान पहचान के सरकारी मुलाजिमों से चिरौरी करते पिता को देखकर बड़ा होते बेटे को पिता की उस तस्वीर में कुछ दरकता दिखाई पड़ता था, जो मामूली नाद, चरनी, परनाले के झगड़े में भाइयों-पट्टीदारों के सामने तनकर खड़े होने से बनी थी।
बेटी के गौने की बिदाई के लिए रात भर जाग कर मिठाई बनवाते पिता, बेटे की बोर्ड परीक्षा में सेन्टर तक आने-जाने का जुगाड़ करते पिता, यूरिया लेने के लिए सरकारी दुकान पर भोर से लाइन लगा कर खड़े पिता, अप्रैल मई की प्रचण्ड दोपहरी में भूंसा ढोते पिता, बांझ हो रही बछिया की दवा के लिए सरकारी मुलाजिमों की चिरौरी करते पिता, दबंग पड़ोसी से खेत की मेंड़ बचाते पिता, मेंड़ के भीतर खडे़ नील गायों, छुट्टा जानवरों को ललकारते पिता, मरने के बाद जो अपना हो गया था उसको सारी कड़ुवाहट के बावजूद श्मशान घाट पर छोड़ कर लौटे उदास पिता, हमारी एक छोटी सी दुनिया में सूरज की तरह थे, जिसमें अलग-अलग रंग समाए हुए थे और दिन के पहरों की तरह जीवन अलग-अलग पहरों में उनकी रंगत भिन्न होती थी।
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