-किस्त-
दरकते ग्लेशियरों का शोर,
सुलगते जंगलों का धुआं,
हिलती जमीन के सातवें मालें पर,
दम घोंटता वातानुकूलित ड्राइंग रुम,
बेचैनी में बदलते चैनलों पर,
चिर युवा मादाओ की थिरकन,
और,
दवाइयों का गुच्छा निगलते-निगलते,
याद आया,
सुदूर देहात का कोई सहोदर,
जिसके साथ ठिठुरते पाले में,
साझा रजाई में,
ढिबरी की रोशनी में,
रटे आधुनिक ज्ञान केे मंत्रों से,
खुले थे परजीविता के द्वार।
लाल-हरी होती बत्तियों,
दौड़ते-ठिठकते चैराहों के बीच,
फुटपाथ पर बेहाल परिचित सा चेहरा,
आभासी नही वास्तविक दुनिया का,
कोई साझा मित्र था,
जिसे समान्तर निगाहों से निहारते,
बदलते रहे गियर,
क्योंकि इस थरथराती जमीन पर,
जिन्दगी बस क्रेडिट कार्ड है,
और सांसे ...........................,
इ0एम0आई0 की अगली किस्त ।

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