-सम्भावना-
एक नेता कम ठेकेदार और नौकरशाह कम धनपशु के समधी बनने से गांव के दक्खिन अंलग को छू कर गुजरती कच्ची सड़क कोलतार से खिल उठी ।
छोटे-मोटे खेतिहर, मजूर सड़क के किनारे अपने-अपने हक-हिस्से का बखरा-बटवारा करके नाद, कोहा, गाय, बकरी, मुर्गा-मुर्गी लेकर आ बसे ।
शहर और कस्बे को जोड़ती नयी बनी सड़क ने दूर दराज के गांव के खेतिहर समाज मे कई तरह से हस्तक्षेप कर दिया ।
मसलन महिलाओं का कुछ समय खेती-बारी, गाय-गोरु के काम से खाली होकर, सास-जेठान के तानो से उबकर एकान्त ओढ़कर किसिम-किसिम की सवारियों और आते जाते लोगों को निहारते वक्त कट जाता था।
बुर्जुगों के लिए सड़क टी0वी0 स्क्रीन थी, जिस पर पल-पल बदलती छवियांे को निहारते समय बीत जाता था।
नई नेवलियों के लिए सुबह-शाम की शौच के लिए आबादी से कुछ दूरी पर स्थित पटरियां हंसी-ठिठोली का स्थान बन गयी थी ।
छोटे बच्चो के लिए खाली सड़क गाहे-बगाहे क्रिकेट की पिच हो जाती थी ।
गांव के किशोर आबादी से कुछ आगे पुलिया पर बैठ कर फिल्मी हीरो-हिरोइनों, द्विअर्थी गीतों और क्रिकेट मैचों पर एक दूसरे के अज्ञान की खिल्ली उड़ाते।
महानगरों मे खट रही जवानियों के पसीने से इन किशोरो के हाथ मे सेकेण्ड हैण्ड मोबाइले आ गयी थी, जिसपर सुलभ अश्लील फिल्मों ने नारी देह का मूर्तन कर दिया था।
मोबाइल और टी0वी0 स्क्रीनो पर तैरते अथाह सम्पन्नताओ मे डूबे जीवन की छवियों ने इन किशोरो को अपनी वास्तविक दुनिया से निराश कर दिया था ।
ऐसी ही एक थकी हुई रात के अंधेरे मे दो हेडलाइटें आपसे में चीख कर टकरा गयी ।
एकाएक पसरे सन्नाटे को कुछ चीखों, खूंटे पर बंधे पगुरी करते जानवरों और दरबो मे बन्द मुर्गे-मुर्गियों ने तोड़ा और फिर सभी दौड़ पड़े।
कुछ ने लथपथ शरीरो मे जिन्दगी की उम्मीद टटोली और कुछ ने मोबाइल, पर्स और नगदी टटोली ।



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