शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

डर

बहुत डरते हैं बड़े बाबू।
सुबह के अखबार मे बलात्कार की खबरें पढ़कर डर जाते हैं कहीं उनकी कालेज जाती बेटियों के साथ ऐसा न हो ।
सड़क दुर्घटना में इकठ्ठी भीड़ के बगल से डरते हुए निकल जाते हैं कहीं इसमे कोई अपना न हो ।
बीमार परिचित के हास्पिटल के बिल को देखकर डरते हैं कि इतना बिल उनके नाम पर होगा तो किससे-किससे उधार मांगेगे ।
किसी छात्र, नौजवान की आत्महत्या की खबर पढ़कर डर जाते हैं क्योंकि बड़का आजकल बहुत गुम-सुम रहता है।
शादी के पण्डाल की भब्यता देखकर डरते हैं कि बेटियों के लिए इतना जोगाड़ कहां से करेगें ।
साहब का चेम्बर खोलते हुए डरते हैं, कही साहब को पुराना हिसाब याद आ गया ता कौन सा नया बहाना बनाएगें ।
अपने टेबुल के सामने खड़े आसामी की तरफ जानबूझकर निगाह नही उठाते हैं कहीं जान-पहचान का हवाला न देने लगे ।
बस इसी तरह अपने डर से डरते हुए ठहाका लगाते हैं ।
सामने वाली कुर्सी की बिरादरी पर बना मुहावरा मन में दुहराते हैं ।
टेबुल पर फैले कागज को गरियाते हैं ।
लेबरो की बढ़ती मजूरी और साग-तरकारी की मंहगाई का किस्सा सुनाते हैं ।
और डरते हुए पान की दुकान पर निकल जाते हैं, बड़े बाबू ।

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