परधानी का गणित


परधानी का गणित बड़ा कठिन होता है। सदियों की बसावट मे किसको कौन सी बात चुभी है, कौन किस पुश्त की अदावत सहेजे हुए है, वोट मांगने और देने मे पता चल जाता है। पूरा गांव किंग मेकर होता है और सभी खुद लड़ रहे होते हैं । दो चीजे प्रभावी भूमिका अदा करती है, लालच और नफरत । गांव के गणितज्ञ प्रत्येक वोट या परिवार पर बारी-बारी से इन दोनो सूत्रों का प्रयोग करते हैं । दुश्मनी कोई भी हो सकती है, बाप-दादों के जमाने की या हाल की । सभी प्रत्याशी समान भाव से इसको भंजाते हैं। जाति और खानदान शादी-विवाह के अलावा इस चुनाव मे सबसे प्रभावी भूमिका में होते हैं । यह ऐसा उत्सव होता है, जिसमे इष्र्यालु पड़ोसी के पक्ष की पराजय का जश्न होता है, पुश्तों के अपमान का प्रतीकात्मक बदला होता है । महंतो के मठ मे अगले कुछ साल के लिए भर्ती हो रहे नए चेलो का प्रवेश समारोह होता है और कुछ पुरा छात्रों का मिलन समारोह होता है। गणितज्ञों को यह भी पता होता है कि इससे बदलेगा कुछ नही बस कउड़ा और चट्टियों पर बैठने वाले चेहरे अपनी जगह बदल लेंगे । पंचायत की सीमित भूमिका सरकारी इमदाद को गरीबो मे न्यायपूर्ण बटवारे भर की होती है लेकिन इससे खेलते हैं प्रायः गांव के दबंग और अमीर लोग। सब इसको इसी तरह खेलते हैं चाहे रोजही पर मजूरी करने वाला हो या ए0सी0बोगी मे टिकट बुक कराकर वोट देने पहुंचा परदेशी ।

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