शनिवार, 24 जनवरी 2026

पिता-1

कुहरा दलान पार करके कोठरी में घुसना चाह रहा है। बाहर लटकते बल्ब की रोशनी सफेद धंुध में एक बड़ा वृत्त बनने का विवश हो गयी है। भैंस अपने खूंटे पर चहल कदमी कर रही है, अब देर हुई तो रम्भाने की आवाज में उसके बच्चे का समवेत स्वर भी गूंजने लगेगा। जाड़े में 4 बजे लगता है एक पहर रात बाकी है, लेकिन भैंस की जीवन चर्या सालों साल से इसी समय शुरु हो जाती है, पिता आखिरी बार इसी को सानी पानी करके बिस्तर पकड़े थे और जबतक सचेत रहे भैंस, पड़िया, फसल, मुकदमा के इर्दगिर्द ही उनके सवाल थे, हास्पिटल का आई0सी0यू0 भी उनको गांव-सीवान से बाहर नहीं निकाल पाया। भैंस नाद लगी कि नहीं, खाने के बाद उसको हटाया कि नहीं, कितना लगी थी और इनका जबाब देते-देते भैंस का दैनिक जीवन और उसकी दिनचर्या कब साझा हो गयी, पता ही नहीं चला। सुबह जबतक चहल-पहल शुरु होती है, भैंस की दैनिक क्रिया का एक हिस्सा पूरा हो चुका रहता है, कभी-कभी भिन्सारे पिता के हाथ में लगा गोबर-सानी देखकर मन कुढ़ जाता था, जब भोर में रजाई की गर्माहट शबाब पर होती है तो पिता बांह पर से ताजे पानी को काछते हुए कउड़ा सजा रहे होते हैं। पिता का काम बीतने के बाद बड़ा सवाल भैंस और उससे जुड़ी दिनचर्या का था। इतने भोर में प्रतिदिन भैंस को चारा खिलाना, गोबर साफ करना, दूहना एक कठोर दिनचर्या बनने वाली थी, भैंस को निकालने का विचार भी आया लेकिन भैंस के दरवाजे पर से जाने का मतलब था, पिता का एक अंश चला जाना। भैंस के रहने का मतलब था आप कहीं भी रहोगे रात में घर लौटना ही होगा, भैंस एक बड़ी डोर है जो रात तक घर खींच लाएगी। पिता ने भी प्रस्थान बेला निकट जानकर उसे कई बार सुनाया था, भैंस चली जाएगी तो लौटेगी नही, जैसे बैल चले गए तो नही लौटे। भोर में लगी झपकी जब भैंस के रम्भानें से टूटी तो लगा पिता कुहरे में खड़े होकर सुर्ती ठोंकते हुए मुस्कराते हुए बोल रहे हैं, का हो उठा।

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