-श्रद्धांजलि-


हाईस्कूल मे पढ़ने के लिए जाते समय कस्बे के साप्ताहिक बाजार के लिए छोड़े गए मैदान को पार करना पड़ता था। कस्बे में दो साप्ताहिक बाजार लगते थे, जिनके लिए दो अलग-अलग मैदान थे और वे बाजार के दिन के अलावा खाली रहते थे । एक मैदान को मंगल की बाजार कहा जाता था और दूसरे मैदान को शुक्र का बाजार कहा जाता था । हम विद्यार्थियों का झुण्ड मंगल की बाजार को धूल उड़ाते हुए पार करके एक गली में घुसता था । गली एक मिर्जा साहब के मकान को पार करके समकोंण पर मुड़ती थी, मिर्जा साहब कस्बे के एक अन्य इण्टर कालेज के वाइस प्रिन्सीपल थे और उस समय के सहपाठियों से मिली जानकारियों के अनुसार उनका परिवार कस्बे का पढ़ा लिखा परिवार था। बिना बरामदे वाले पक्के मकान के मुख्य दरवाजे पर लटका पर्दा मकान के लोगों को बाहरी दुनिया से एकान्त प्रदान करता था । उस मकान के ठीक सामने वाले रास्ते के उस पार की दीवार पर गेरु से एक नारा लिखा होता था ‘ हम हैं हिन्दू साठ करोड़, ताला देगें तोड़ मरोड़‘। यह नारा उस मकान के आंगन से निकलने वालो को बाहर की तल्ख हो रही दुनिया का एहसास कराता होगा और लगातार घूरता रहता होगा, अब ये महसूस करता हूं।
अस्सी का दशक था, हम प्रतिदिन स्कूल जाते हुए इस नारे को पढ़ते और कभी कभी उसका समवेत उच्चारण करते, बिना ये महसूस किए कि ये समवेत स्वर जो मात्र खिलवाड़ होता था, उस मकान के भीतर रहने वाले परिवार जनों को कितना खौफजदा करता होगा । लेकिन हमारे लिए ये मात्र खेल होता था । दुनियां के बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समाज के रिश्तों को केर-बेर के रिश्तो मे बदलने वाले शिल्पकारों की बढ़ती संख्या मे अशोक सिंघल जी का जाना एक जैविक क्षति है । मैं यही कामना करता हूं कि हिन्दू विश्वासों के आधार पर उनका अगला जन्म मानव योनि कें किसी अल्पसंख्यक समुदाय में हो ।

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