शनिवार, 24 जनवरी 2026

पत्नी और बेटी का मातृत्व

पत्नी के मां होने और बेटी के मां होने में पुरुष अलग-अलग मनःस्थितियों से गुजरता है। जब पत्नी मां बनती है तो पुरुष के जीवन में आने वाली स्त्री के छोटे से लाइफ स्पैन के सापेक्ष बदलाव होता है और यह बदलाव पुरुष को बहुत चकित नहीं करते बल्कि प्रत्याशित लगता है। आधी रात में रोता हुआ शिशु प्रायः पत्नी की समस्या होती है और पुरुष करवट बदल कर सो जाता है लेकिन बेटी जब अपने शिशु के लिए रात-रात भर नींद खराब करती है अपने सारे खेलकूद धमा चाौकड़ी भूल कर एक नए मेहमान के इशारों पर जीना शुरु कर देती है तो पिता उसके परिवर्तनों से हतप्रभ होता है। बेटी के लिए विवाह जिम्मेदारियों का पहाड़ होता है और मातृत्व मजबूरियों का महासागर, बीच में सहज जीवन के लिए जिस समतल मैदान की जरुरत होती है, वो पिता का घर होता है बशर्ते उस मैदान में भी नागफनियां न उग आयीं हो। पिता अपनी बेटी के जीवन में आए नए मेहमान से खुश तो होता है लेकिन बेटी के मां बन जाने के कारण उसके शैशव, बचपन, किशोरावस्था की स्मृतियां पृष्ठभूमि में जाने लगती है, जिसे स्वीकार करनें में अपना प्रिय कुछ छूट जाने का भाव भी होता है। वो चकित रहता है बेटी के परिवर्तनों से जबकी उसकी पत्नी सहज रहती है, उसकी सहजता बेटी का आत्मविश्वास और नियति के प्रति स्वीकार भाव को बढ़ाती है। जीवन की दिशा विद्रोह, परिवर्तन, समर्पण की डोर से संचालित होती है, पुरुष के पास इनमें से चयन की विलासिता हो सकती है लेकिन मां के लिए जैविक मजबूरी।

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