शनिवार, 24 जनवरी 2026

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगातार इकठ्ठी हुई मलाइयों से घी निकाला जाता है। यह घी एक स्थिर भौतिक परिस्थितियों या वातावरण से निर्मित होती है, यदि दूध को इतना स्थायित्व न मिले वो लगातार हिलता डुलता रहे तो दही या मलाई नहीं बन सकती है और घी जो उसका अगला श्रेष्ठ उत्पाद है उसे नहीं निकाला जा सकता है। इसी तरह से हमनें अतीत में अपने जीवन का अर्थ और स्थायित्व निरन्तरता से परिपूर्ण धार्मिक या वैचारिक कहानियों के जरिए पाया, जो हमारेे दैनिक कार्यो को बड़े ब्रह्मांडीय उद्देश्यों से जोड़ती थीं। खेती का काम करना प्रकृति की निरन्तरता में हिस्सा लेकर ईश्वरीय व्यवस्था से जुड़ना था। अपने देश, धर्म, जाति के लिए लड़ना सिर्फ संगठित हिंसा नहीं अपितु उन पवित्र मूल्यों तथा पैतृक परंपरा की रक्षा करना था, जिससे कि भविष्य की पीढ़ियाँ देश, धर्म, जाति मूल्यों के अनुसार जी सकें। बच्चे पैदा करना सिर्फ जैविक प्रजनन नहीं वंश परम्परा के पवित्रता की निरंतरता सुनिश्चित करना था। इन मूल्यों को गढ़ने वाली धार्मिक कहानियाँ इसलिए काम करती थीं क्योंकि वे हर व्यक्तिगत कार्य को, चाहे वह कितना भी मामूली क्यों न हो, जैसे दिन विशेष को कोई कोई कार्य करना या नहीं करना, पशु विशेष से नफरत या प्यार करना, बाल या दाढ़ी कैसे रखना है, शौच या स्नान की क्या विधि है आदि आदि से हमारे अस्तित्व को अंतिम अर्थ और भाग्य के बारे में एक बड़ी परिकल्पना से जोड़ती थीं। आधुनिक ज्ञानोदय ने इन धार्मिक कहानियों को दूसरी उतनी ही बड़ी कहानियों से बदलने की कोशिश की। जैसे वैज्ञानिक प्रगति आखिरकार ब्रह्मांड के सभी रहस्यों को उजागर करेगी और सभी मानवीय समस्याओं को हल करेगी। सामाजिक न्याय आखिरकार एक पूरी तरह से समान समाज बनाएगा जहाँ सभी अनावश्यक दुख खत्म हो जाएंगे। आर्थिक विकास आखिरकार पूरी मानवता के लिए भौतिक समृद्धि लाएगा। इनमें से प्रत्येक कहानी ने वादा किया कि व्यक्तिगत कार्य मानवीय स्थिति में प्रगतिशील सुधारों में योगदान देंगे जो आखिरकार किसी न किसी रूप में सांसारिक स्वर्ग में बदल जाएंगे। लेकिन ये कहानियाँ अपने पूर्ववर्ती धार्मिक कहानियों की तुलना में कहीं अधिक अस्थाई साबित हो रही हैं। वैज्ञानिक उत्तर नए और जटिल प्रश्न उत्पन्न कर रहा है। सामाजिक न्याय की खोज में दिखाई पड़ रहा है कि अलग-अलग समूहों के पास न्याय की अलग-अलग परिभाषाएँ हैं। असमानता के कुछ प्रकारों को खत्म करने के प्रयास में अक्सर असमानता के नए रूप पैदा हो रहे हैं। समानता को अधिकतम करने के लिए डिजाइन की गई प्रणालियाँ अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नियंत्रित करती हैं। भौतिक जीवन स्थितियों में मात्र सुधार अधिक खुशी या संतुष्टि नहीं दे रहा है। अधिक उन्नत समाज ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जो सरल समाजों में नहीं पायी जाती हैं। इसी दौर में हमने यह भी पाया कि एक सीमित ग्रह पर अधिकतम उपभोग का अनंत आर्थिक विकास का मॉडल विनाशकारी पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा रहा है। कई तकनीकी आविष्कार जितनी तेजी से पुरानी समस्याओं को हल करते हैं, उतनी ही तेजी से नई समस्याएं भी पैदा कर रहे हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था जहां ज्यादातर नौकरियां अस्थाई और आखिरकार ऑटोमेटेड हो रही हैं, में पेशेवर करियर में स्थायित्व या संतुष्टि का विचार भ्रामक होता जा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए लगातार प्रदर्शित व्यक्तिगत पहचान नाटकीय हो गयी है। सदियों से मौजूद पेशे देखते देखते गायब हो रहे हैं। अपनी दुनियां में सदियों से जी रहे भिन्न भिन्न भौगोलिक समुदाय आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता की आंधी में उखड़ते जा रहे है। इन बदलावों से उत्पन्न अस्तित्वगत संकट लोगों को अधिकतम उपभोग, लगातार मनोरंजन या चरमपंथी विचारों की तरफ ढकेल रहे हैं। त्रासदी यह है कि परिवर्तन की आंधी से लगातार कंपित होते हमारे चित्त को वह स्थायित्व नहीं मिल पा रहा है, जिससे नवीन जीवन मूल्यों का घी निकाल सके। यानी बदलाव की गति हमारी वैचारिक अनुकूलन की गति से ज्यादा तीव्र होती जा रही है।

लोलुपता का रसायन

घर, आंगन ही हममें से अधिकांश लोगों की सम्पूर्ण दुनिया होती है। गांव, कस्बा, शहर, चुनाव क्षेत्र, अपना धर्म, अपने राजनैतिक दल में 90 प्रतिशत लोग घूमते रहते हैं। अपना देश, पड़ोसी देश, दबंग देश और दादा देश के इर्दगिर्द 99 प्रतिशत लोग चुक जाते। जैसा मुझको इण्टरनेट के अंतरजाल पर दिखता है। बच जाता है नदी, पहाड़, जंगल, वायुमण्डल, मानवेतर जीवन तो, इस दुनिया को भी अपनी दुनिया में समेटने वाले लोग अल्पतम होते हैं। यदि मानवेतर जीवन और शेष जगत को हम मनुष्यों के बारे में अपनी बात कहनें का अवसर मिलता तो शायद एक ही पंक्ति में बात खत्म हो जाती कि यह प्रजाति आवश्यकता और लोलुपता के आत्महंता युद्ध में इस पूरे ग्रह के लिए खतरा बन चुकी है। आवश्यकता पूर्ति इसका जैविक और प्रकृतिक गुण था, जिसमें इसने विकास क्रम में अर्जित उपभोग और लोलुपता का रसायन मिला दिया है। उपभोग और लोलुपता के रसायन ने इस प्रजाति की आंखों पर एक पारदर्शी चश्मा पहना दिया है, जिसे उतार कर आवश्यकता का मौलिक रुप खोजने के लिए बड़ी-बड़ी राजसत्ताओं और उनकी फौजों, धार्मिक धन्धेबाजों, मीडिया हाउसों, औद्योगिक समूहों के हितों और उनके गठजोड़ को पार पाना सदैव दुष्कर रहा है। अब तो इण्टरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्लेटफार्म पर बड़े-बड़े शो रुम हैं, जिसमें अपने घर-आंगन की आवश्यकताओं से जूझते लोग अपनी प्रारंभिक रुचियों (धर्म, जाति, रंग, देश) के अनुसार घुसते हैं और एक खास चश्मा पहन कर निकलते हैं। यह चश्मा इतना प्रभावी और गाढ़ा होता है कि इसको पहचानना मुश्किल होता है और हटाना तो दुष्करतम। लोलुपता के इसी रसायन ने एक बिल्डर को दुनिया के दादा देश का मुखिया बनाया है, जो इस पूरे ग्रह को ही कालोनाइजर की तरह देखता है। देशनुमा प्लाटों पर अपना खंूटा गाड़ते मुखिया के पीछे वाह-वाह करता इन्टरनेट के बूते तैयार किया गया उसके देश का एक बड़ा जनसमूह। लेकिन हमारे आसपास भी यही हो रहा है। बड़़े खिलाड़ी पहाड़, जंगल, नदी, सार्वजनिक भूमि पर नजर लगाए हुए हैं और छोटे खिलाड़ी आर्थिक बदहाली झेल रहे किसान परिवारों पर। कभी कभी लगता है छुट्टा पशु, नीलगाय आदि इन खिलाड़ियों के ही प्रतिनिधि बनकर माहौल रच रहे हैं।

पत्नी और बेटी का मातृत्व

पत्नी के मां होने और बेटी के मां होने में पुरुष अलग-अलग मनःस्थितियों से गुजरता है। जब पत्नी मां बनती है तो पुरुष के जीवन में आने वाली स्त्री के छोटे से लाइफ स्पैन के सापेक्ष बदलाव होता है और यह बदलाव पुरुष को बहुत चकित नहीं करते बल्कि प्रत्याशित लगता है। आधी रात में रोता हुआ शिशु प्रायः पत्नी की समस्या होती है और पुरुष करवट बदल कर सो जाता है लेकिन बेटी जब अपने शिशु के लिए रात-रात भर नींद खराब करती है अपने सारे खेलकूद धमा चाौकड़ी भूल कर एक नए मेहमान के इशारों पर जीना शुरु कर देती है तो पिता उसके परिवर्तनों से हतप्रभ होता है। बेटी के लिए विवाह जिम्मेदारियों का पहाड़ होता है और मातृत्व मजबूरियों का महासागर, बीच में सहज जीवन के लिए जिस समतल मैदान की जरुरत होती है, वो पिता का घर होता है बशर्ते उस मैदान में भी नागफनियां न उग आयीं हो। पिता अपनी बेटी के जीवन में आए नए मेहमान से खुश तो होता है लेकिन बेटी के मां बन जाने के कारण उसके शैशव, बचपन, किशोरावस्था की स्मृतियां पृष्ठभूमि में जाने लगती है, जिसे स्वीकार करनें में अपना प्रिय कुछ छूट जाने का भाव भी होता है। वो चकित रहता है बेटी के परिवर्तनों से जबकी उसकी पत्नी सहज रहती है, उसकी सहजता बेटी का आत्मविश्वास और नियति के प्रति स्वीकार भाव को बढ़ाती है। जीवन की दिशा विद्रोह, परिवर्तन, समर्पण की डोर से संचालित होती है, पुरुष के पास इनमें से चयन की विलासिता हो सकती है लेकिन मां के लिए जैविक मजबूरी।

बाबा

सबसे अधिक वेइज्जती साइकिल और रेडियों का हुआ है। कइसे बाबा, लोग साईकिल से लोग बोरा ढोने लगे और रेडियों लेकर खेत के डांड़ पर घूमनें लगे। बाबा, बीसवीं सदी के पहली दहाई के पूर्वाद्ध में पैदा हुए थे और अपना यह दुःख आठवें दशक के आखिरी दौर में अपने नाती से बता रहे थे। हालाकि घर में उपलव्ध होते हुए भी कभी न वो साईकिल चलाए और न ही रेडियों सुने। लेकिन बीसवीं सदी के इन अत्यन्त उपयोगी आविष्कारों के प्रति सम्मान का भाव उनके जीवन के आखिरी दौर तक बना रहा। उनके जीवन मूल्य का बड़ा हिस्सा हजारों वर्षो के इस प्रकृति पूजक समाज में हर जीवनोपयोगी चीज के लिए श्रद्धा प्रगट करने वाली भावनाओं से बना था। दो-दो विश्वयुद्ध, गांधी, नेहरु, आजादी, विभाजन एटम बम जैसी घटनाओं की छाया भी उनके जीवन में नहीं थी, जबकि उनके बृहत्तर खानदान में दो-दो स्वतंत्रता संग्राम सैनानी थे। संकट मोचन में साप्ताहिक दर्शन और परम्पराओं के निर्वहन को ही अपनी उपलव्धि मानते थे। उनका जीवन अपने प्रतिष्ठित पिता की छाया में ही गुजर गया और उनसे अपने पिता की उदारता से उपजे संकटों के प्रति कभी कोई शिकायत नही सुनी। "यह लकड़ी मेरे लिए होनी चाहिए थी", अपने युवा पुत्र की असमय मृत्यु के श्राद्ध कर्म हेतु सूखने के लिए फैलाई गयी लकड़ियों को देखकर बुदबुदाए थे, फिर मुझसे बोले अगर मैने बेईमानी की होती तो आज खानदान, गांव इसको मेरा कर्मफल बताता। वो अपने नाम पर दर्ज खानदान की अधिकांश भूमि के ईमानदार वितरण की बात कह रहे थे, जब जवार के कई मानिन्दों ने उनको सुविधाजनक बेईमानी की सलाह दिया था। स्त्रियों, दलित और पिछड़े समाज में आ रहे बदलाव को आश्चर्यमिश्रित भाव से सुनते और उनकी पारम्परिक सोच अस्तब्यस्त हो जाती। मुसलमान उनके लिए सिर्फ अलग जाति थे, जैसे समाज की अन्य जातियां अपनी भिन्नताओं के साथ होती हैं। राम चरित मानस ही उनके जीवन के कलयुग की मार्गदर्शिका थी और घाघ की कहावतें उनके किसानी जीवन के साथ रची बसी थी। एक महान शहर की परिधि पर पूरा जीवन गुजार देने वाले बाबा परम्पराओं के गुबार में इस कदर घिरे थे कि उन तक इस महादेश की चेतना को झकझोर देने वाले ज्योतिपुन्जों की किरण भी नहीं पहुंच सकी।

पिता-3

एक सरकारी टेबुल होती है, जिसके दोनो तरफ खड़े लोग भी पिता ही होते हैं। इन टेबुलों पर उम्मीदों, मजबूरियों, बदहालियों की सजी फाइलों में सुविधाजनक धूर्ततापूर्ण टिप्पणियां दोनो तरफ खड़े पिताओं की जेब में एक अदृश्य सुरंग बनाती हैं। टेबुल के इस पार खड़े पिता के चेहरे की चमक और उस पार खड़े पिता की झुर्रियांे ने असमय बूढ़े हो रहे इस युवा लोकतंत्र को अपनी अपनी सुविधाओं के अनुसार गढ़ा है। टेबुल के इस पार का पिता टेबुल के उस पार खड़े पिता की जेब के रास्ते से सरकारी पार्टियों के प्रतिनिधियों, ठेकेदारों, दबंगों, तथाकथित समाजसेवियों की जेब तक का एक बाईपास रचता है। इन्ही बाइपासों के उद्घाटन समारोहों में उम्मीदों का लवंडा डांस होता है, लवंडा डांस एक कुंठित पुरुष प्रधान समाज के मनोरंजन के लिए स्त्रैण गुणों के विकृत प्रस्तुतिकरण को कहते है। लवंडा डांस के बाद टेबुल के उस पार के पिता के घर लौटने पर उसकी बहकी बहकी बातें घरवालों को अचरज में डालती हैं लेकिन उनकी फटी जेब देखकर सभी आश्वस्त हो जाते हैं कि दुनिया अभी यथावत है। टेबुल के इस पार का पिता इस लवंडा डांस की सफलता में अपने तनख्वाह, प्रमोशन, पोस्टिंग और इंक्रीमेण्ट की आश्वस्ति जेब में भर कर लौटता है। अपने युग के ये संज्ञाविहीन पिता आप्त वाक्यों की भूलभुलैया में मंजिलों के लिए राजमार्गो की तलाश में पगडंडियों पर भटकते राही हैं।

पिता-2

पिता समय के ताप में पिघल रहे हैं। पट्टीदारों से झगड़ा, भाइयों से मनमुटाव, लाभ शून्य खेती, बेटे का आंशिक रोजगार पिता की लटकती झुर्रियों, दांत छोड़ते मसूडा़े, धीरे-धीरे झुकते कंधो पर चिपक गए हैं। पिता सड़क की जमीन के लिए भाईयों से लड़े थे, प्रधानी के चुनाव में एनमौके पर पैसा लेकर पाल्हा बदल दिए थे, गांव के झगड़े में न्याय-अन्याय की जगह बिरादरी चुने थे, गरीब रिश्तेदार की जरुरत पर मदद की जगह अमीर रिश्तेदार के तमाशे में नाचे थे। और इस तरह पिता ने अपने पीछे खड़ी छोटी सी दुनिया को अपने स्वार्थ के पंखों से सहेजा था। मण्डी से लौटते पिता के साइकिल की हैण्डिल में लटकती जलेबी की पन्नी जब दुआर पर रुकती तो उसके सामने चहकती छोटे-छोटे भाई बहनों की खुशियों में पिता के चेहरे पर भोर से दोपहर तक की थकान नहीं मुस्कान होती थी, बिटिया की फरमाइशों को पूरा करने के लिए मां से लड़ जाने वाले वो शायद अंतिम पुरुष थे, बेटे की सरकारी नौकरी के लिए जान पहचान के सरकारी मुलाजिमों से चिरौरी करते पिता को देखकर बड़ा होते बेटे को पिता की उस तस्वीर में कुछ दरकता दिखाई पड़ता था, जो मामूली नाद, चरनी, परनाले के झगड़े में भाइयों-पट्टीदारों के सामने तनकर खड़े होने से बनी थी। बेटी के गौने की बिदाई के लिए रात भर जाग कर मिठाई बनवाते पिता, बेटे की बोर्ड परीक्षा में सेन्टर तक आने-जाने का जुगाड़ करते पिता, यूरिया लेने के लिए सरकारी दुकान पर भोर से लाइन लगा कर खड़े पिता, अप्रैल मई की प्रचण्ड दोपहरी में भूंसा ढोते पिता, बांझ हो रही बछिया की दवा के लिए सरकारी मुलाजिमों की चिरौरी करते पिता, दबंग पड़ोसी से खेत की मेंड़ बचाते पिता, मेंड़ के भीतर खडे़ नील गायों, छुट्टा जानवरों को ललकारते पिता, मरने के बाद जो अपना हो गया था उसको सारी कड़ुवाहट के बावजूद श्मशान घाट पर छोड़ कर लौटे उदास पिता, हमारी एक छोटी सी दुनिया में सूरज की तरह थे, जिसमें अलग-अलग रंग समाए हुए थे और दिन के पहरों की तरह जीवन अलग-अलग पहरों में उनकी रंगत भिन्न होती थी।

पिता-1

कुहरा दलान पार करके कोठरी में घुसना चाह रहा है। बाहर लटकते बल्ब की रोशनी सफेद धंुध में एक बड़ा वृत्त बनने का विवश हो गयी है। भैंस अपने खूंटे पर चहल कदमी कर रही है, अब देर हुई तो रम्भाने की आवाज में उसके बच्चे का समवेत स्वर भी गूंजने लगेगा। जाड़े में 4 बजे लगता है एक पहर रात बाकी है, लेकिन भैंस की जीवन चर्या सालों साल से इसी समय शुरु हो जाती है, पिता आखिरी बार इसी को सानी पानी करके बिस्तर पकड़े थे और जबतक सचेत रहे भैंस, पड़िया, फसल, मुकदमा के इर्दगिर्द ही उनके सवाल थे, हास्पिटल का आई0सी0यू0 भी उनको गांव-सीवान से बाहर नहीं निकाल पाया। भैंस नाद लगी कि नहीं, खाने के बाद उसको हटाया कि नहीं, कितना लगी थी और इनका जबाब देते-देते भैंस का दैनिक जीवन और उसकी दिनचर्या कब साझा हो गयी, पता ही नहीं चला। सुबह जबतक चहल-पहल शुरु होती है, भैंस की दैनिक क्रिया का एक हिस्सा पूरा हो चुका रहता है, कभी-कभी भिन्सारे पिता के हाथ में लगा गोबर-सानी देखकर मन कुढ़ जाता था, जब भोर में रजाई की गर्माहट शबाब पर होती है तो पिता बांह पर से ताजे पानी को काछते हुए कउड़ा सजा रहे होते हैं। पिता का काम बीतने के बाद बड़ा सवाल भैंस और उससे जुड़ी दिनचर्या का था। इतने भोर में प्रतिदिन भैंस को चारा खिलाना, गोबर साफ करना, दूहना एक कठोर दिनचर्या बनने वाली थी, भैंस को निकालने का विचार भी आया लेकिन भैंस के दरवाजे पर से जाने का मतलब था, पिता का एक अंश चला जाना। भैंस के रहने का मतलब था आप कहीं भी रहोगे रात में घर लौटना ही होगा, भैंस एक बड़ी डोर है जो रात तक घर खींच लाएगी। पिता ने भी प्रस्थान बेला निकट जानकर उसे कई बार सुनाया था, भैंस चली जाएगी तो लौटेगी नही, जैसे बैल चले गए तो नही लौटे। भोर में लगी झपकी जब भैंस के रम्भानें से टूटी तो लगा पिता कुहरे में खड़े होकर सुर्ती ठोंकते हुए मुस्कराते हुए बोल रहे हैं, का हो उठा।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

2026 की चुनौतियां- युवाल नोवा हरारी

क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि शायद हम आम लोग दुनिया की हालत को लेकर सबसे ज़्यादा परेशान नहीं हैं? कि शायद जो लोग इतिहास के पैटर्न, सत्ता के तरीकों और इंसानियत की प्रवृत्तियों को सबसे अच्छी तरह समझते हैं, वे हमसे बहुत पहले ही अपनी सहनशीलता की सीमा तक पहुँच रहे हैं। इंसानी हालत पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने वाले ऑब्ज़र्वर के बीच एक परेशान करने वाली भावना बढ़ रही है। वर्ष 2026 दुनिया का अंत नहीं होगा, लेकिन यह वह साल हो सकता है जब समझदार लोग अतीत से सीखने और भविष्य का सामना समझदारी से करने से हमारे लगातार इनकार से अपना धैर्य खो देंगे। यह अब कोई साज़िश की थ्योरी या खाली डर फैलाना नहीं है। यह इस बात का एहसास है कि जो लोग सभ्यता के महान आंदोलनों को समझने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनकी सहनशीलता की एक सीमा होती है और इस सीमा का परीक्षण इंसानी इतिहास में पहले कभी नहीं हुए तरीकों से किया जा रहा है। जब हम हज़ारों सालों में इंसानी समझदारी के रास्ते को देखते हैं, तो हमें एक दिलचस्प और परेशान करने वाला पैटर्न मिलता है। हर बड़े सभ्यतागत संकट में, हमेशा ऐसी आवाज़ें रही हैं जिन्होंने खतरों के बारे में चेतावनी दी, ऐसे विचारक थे जिन्होंने घातक विरोधाभासों की पहचान की, ऐसे विद्वान थे जिन्होंने डरावनी सटीकता के साथ उन रास्तों का नक्शा बनाया जो पतन या बड़े बदलाव की ओर ले जाएंगे। ग्रीक दार्शनिकों से जिन्होंने शहर राज्यों के पतन की भविष्यवाणी की थी, उन चेतावनियों तक जिन्हें दो बड़े विश्व युद्धों की ओर ले जाने वाली स्थितियों के बारे में नज़रअंदाज़ किया गया था। इतिहास ऐसे पलों से भरा पड़ा है जब समझदारी ने साफ-साफ बात की लेकिन आबादी के ज़्यादातर लोगों और सत्ता में बैठे लोगों ने इसे जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया। हमारे युग को जो बात खास बनाती है, वह यह है कि इतिहास में पहली बार, हमारे पास इस समझदारी तक तुरंत और सार्वभौमिक पहुँच है। लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करने की हमारी क्षमता भी ज़्यादा परिष्कृत और कुशल हो गई है। 21वीं सदी ज्ञान का एक विरोधाभासी लोकतंत्रीकरण लेकर आई, जिसके साथ ही जानबूझकर अज्ञानता का भी उतना ही लोकतंत्रीकरण हुआ। पहले कभी इतने सारे समझदार लोगों के पास डेटा, ऐतिहासिक विश्लेषण और पूर्वानुमान उपकरणों तक इतनी पहुँच नहीं थी। और पहले कभी उनकी चेतावनियों को सूचना प्रणालियों द्वारा इतनी लगातार खारिज या विकृत नहीं किया गया, जो शिक्षा के बजाय मनोरंजन, सच्चाई के बजाय पुष्टि, और परिणाम के बजाय तात्कालिकता को प्राथमिकता देती हैं। जलवायु विद्वान दशकों से अपरिवर्तनीय परिवर्तनों के बारे में चेतावनी दे रहे हैं। इतिहासकार सर्जिकल सटीकता के साथ दिखाते हैं कि जब समाज विशिष्ट संकेतों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो वे कैसे ढह जाते हैं। राजनीतिक दार्शनिक ठीक-ठीक बताते हैं कि लोकतंत्र कैसे अधिनायकवाद में बदल जाते हैं। और सबसे समझदार टेक्नोलॉजिस्ट बताते हैं कि डिजिटल क्रांति हमें आज़ादी और पूरी गुलामी दोनों की ओर कैसे ले जा सकती है। ये सभी चेतावनियाँ सार्वजनिक हैं, पहुँच योग्य, वेरिफ़ाएबल, और बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं। और इन सभी को नियमित रूप से नज़रअंदाज़ किया जाता है या किसी अन्य राय के बराबर माना जाता है, ऐसे युग में जिसने सापेक्षवाद को ज्ञान के साथ भ्रमित कर दिया है। बुद्धिमानों का धैर्य हमेशा सीमित रहा है क्योंकि उनका स्वभाव परिणामों को समझने का है इससे पहले कि वे प्रकट हों। यह बौद्धिक पीड़ा का एक विशेष रूप है पूरे समाज ऐसी खाई की ओर बढ़ रहे हैं जो उन लोगों को स्पष्ट रूप से दिखाई देती है जिनके पास पर्याप्त विश्लेषणात्मक उपकरण हैं। कल्पना कीजिए एक महामारी विशेषज्ञ कैसा महसूस करता है जो वर्षों तक इसकी अनिवार्यता के बारे में चेतावनी देता है। एक वैश्विक महामारी को तब तक नज़रअंदाज़ किया जाता है जब तक त्रासदी सामने नहीं आती और फिर पर्याप्त काम न करने के लिए दोषी ठहराया जाता है। एक अर्थशास्त्री की निराशा पर विचार करें जो विस्तार से बताता है कि कुछ नीतियाँ अत्यधिक असमानता का कारण कैसे बनेंगी और सामाजिक अस्थिरता केवल इन नीतियों को लागू होते देखने के लिए लोकप्रिय तालियों के बीच। एक इतिहासकार की खामोश निराशा के बारे में सोचें जो ध्रुवीकरण और कट्टरता के सटीक पैटर्न को पहचानता है जो हमेशा हिंसक संघर्षों से पहले होता था, लेकिन जब वह कोशिश करता है तो उस पर निराशावादी होने का आरोप लगाया जाता है। वर्ष 2026 इस विश्लेषण के रूप में सामने आता है, यह भविष्यवाणी की तारीख नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक मील का पत्थर है जिसकी गणना और रुझानों का अभिसरण सबसे चौकस पर्यवेक्षक दशकों से ट्रैक कर रहे हैं। यह वह क्षण है जब पिछले 15 वर्षों में विकसित हो रहे कई संकट, एक साथ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पहुँच सकते हैं। जलवायु संकट अपरिवर्तनीयता की सीमा को पार कर रहा है, जिन्हें विज्ञान द्वारा स्पष्ट रूप से मैप किया गया है। लोकतांत्रिक संकट ध्रुवीकरण के स्तर पर पहुँच रहा है जो ऐतिहासिक रूप से संस्थागत टूट से पहले की स्थिति होती है। तकनीकी संकट शक्ति, एकाग्रता और सामाजिक हेरफेर के चरणों तक पहुँच रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रतिरोध को व्यावहारिक रूप से असंभव बना सकता है। आर्थिक संकट असमानता के ऐसे स्तरों पर पहुँच रहा है जो हमेशा सभी में दस्तावेजी इतिहास के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर सामाजिक उथल-पुथल हुई। विशिष्ट तारीख इस बात को पहचानने से कम महत्वपूर्ण है कि हम तेजी से एक ऐसे क्षण के करीब पहुँच रहे हैं जब कई प्रणालीगत दबाव इस तरह से मिलते हैं जो धीरे-धीरे और लोकतांत्रिक परिवर्तनों को असंभव कर सकते हैं, जिससे अचानक और संभावित रूप से हिंसक परिवर्तन होंगे । हमारे ऐतिहासिक क्षण को जो बात अलग बनाती है, वह यह है कि इसके विपरीत पिछले संकटों के लिए जहाँ बड़े पैमाने पर अज्ञानता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता था जानकारी तक पहुँच की कमी, वहीं अब हम जानकारी को अस्वीकार करने वाली अज्ञानता के दौर में जी रहे हैं। सोशल नेटवर्क ने जानकारी वाले इकोसिस्टम बनाए हैं जहाँ कोई भी ऐसी जानकारी पा सकता है जो उसके सच्चाई से दूर काल्पनिक विश्वासों की पुष्टि करती है। जबकि कमर्शियल एल्गोरिदम व्यवस्थित रूप से सबसे भड़काऊ और भावनात्मक जानकारी को उन जानकारियों की कीमत पर बढ़ाते हैं, जो सामूहिक फैसले लेने के लिए ज़्यादा सटीक और उपयोगी होती हैं। नतीजा यह है कि हम पहली बार इतिहास उस दौर में रह रहे हैं जहाँ इंसान द्वारा संकलित ज्ञान सचमुच किसी की भी उंगलियों पर है। लेकिन जहाँ ज्ञान तक पहुंच की इसी आसानी ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि सारा ज्ञान समान रूप से मान्य है और विशेषज्ञता सिर्फ़ राय का एक और रूप है। इस घटना ने हमारे युग के बुद्धिमान लोगों के लिए एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है। पहले उन्हें अपनी खोजों को बड़े दर्शकों तक न पहुँचा पाने की निराशा से निपटना पड़ता था। आज उन्हें यह विरोधाभास झेलना पड़ता है कि वे लाखों लोगों से तुरंत बात कर सकते हैं, लेकिन यथास्थितिवादियों (जो कि निःसंदेह बहुसंख्यक हैं) द्वारा बड़े पैमाने पर संचार संचार की इसी सुलभता के कारण उनके विचारों के प्रति ज़्यादा विरोध पैदा किया जाता है। उनका संदेश जितना ज़्यादा स्पष्ट और सुलभ होता है, उतना ही उस पर हमला किया जाता है, उसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है, या उन सामाजिक प्रणालियों द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है जो ऐसी जानकारी का विरोध करने के लिए विकसित हुई हैं जो मौजूदा सत्ता संरचनाओं को चुनौती देती है या जो व्यक्तियों से महत्वपूर्ण व्यवहारिक बदलावों की मांग करती है। जिस तकनीक ने ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाने का वादा किया था, उसने ज्ञान को अस्वीकार करने की क्षमता को भी लोकतांत्रिक बना दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल वैज्ञानिक खोजों को तेज़ करने और औद्योगिक पैमाने पर विश्वसनीय गलत सूचना बनाने दोनों के लिए किया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म सीखने में रुचि रखने वाले लोगों को दुनिया के सबसे अच्छे शिक्षकों से जोड़ सकते हैं, लेकिन वे व्यक्तियों को तेज़ी से बढ़ते चरम पुष्टि बुलबुले में अलग-थलग करके उन्हें कट्टरपंथी भी बना सकते हैं। वही इंटरनेट जो दुनिया में कहीं भी किसी भी युवा को बेहतरीन यूनिवर्सिटी और लाइब्रेरी तक पहुँचने की इजाज़त देता है, वही साज़िश की थ्योरी को इंसानियत के इतिहास की किसी भी महामारी से ज़्यादा तेज़ी से फैलने की भी इजाज़त देता है। इस संदर्भ में, समझदार लोगों के सब्र का इम्तिहान बिल्कुल नए तरीकों से लिया जा रहा है। यह सिर्फ़ उन एडवांस्ड विचारों की पारंपरिक निराशा नहीं है जिन्हें समाज द्वारा स्वीकार किए जाने में समय लगता है। यह पूरी सोसाइटी को देखने के बारे में है, जो उस तरह की एनालिटिकल सोच और लॉन्ग-टर्म प्लानिंग का एक्टिव विरोध कर रही है जो जटिल और आपस में जुड़ी चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटने के लिए ज़रूरी हैं। यह ऐसे पॉलिटिकल लीडरशिप के उदय को देखने के बारे में है जो न सिर्फ़ सबूतों को नज़रअंदाज़ करते हैं बल्कि अपने प्लेटफॉर्म पूरी तरह से सबूतों और खास ज्ञान को खारिज करने पर बनाते हैं। यह एजुकेशनल सिस्टम को जानबूझकर कमज़ोर होते देखने के बारे में है ताकि ज़्यादा क्रिटिकल सोचने वालों के बजाय आसानी से हेरफेर किए जाने वाले नागरिक पैदा हों। यहीं हमारे युग की सबसे गहरी विडंबनाओं में से एक है। हमें चुनौतियों से निपटने के लिए ज्ञान की इतनी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी, जो इंसानियत के इतिहास में सच में अभूतपूर्व हैं। और हमारी संस्कृति कभी भी इस विचार के प्रति इतनी विरोधी नहीं रही कि कुछ लोग खास मुद्दों के बारे में दूसरों से ज़्यादा जान सकते हैं। हम ग्लोबल क्लाइमेट चेंज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी समस्याओं का सामना करते हैं जो इंसान की बुनियादी क्षमताओं से आगे निकल सकती है, जेनेटिक हेरफेर जो इंसान की प्रकृति को बदल सकता है, और ऐसे हथियार जो सचमुच सभ्यता को खत्म कर सकते हैं। लेकिन हमने ऐसे सोशल सिस्टम बनाए हैं जो इन विषयों पर किसी की भी राय को उस व्यक्ति के एनालिसिस के बराबर मानते हैं जिसने इन पर स्टडी करने में दशकों लगाए हैं। समझदार लोगों का बढ़ता हुआ सब्र खत्म होना सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण तरीकों से दिखता है। हम देखते हैं कि बड़ी संख्या में एकेडमिक लोग यूनिवर्सिटी में पारंपरिक करियर छोड़कर नए प्लेटफॉर्म के ज़रिए सीधे आम लोगों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हम देखते हैं कि जो वैज्ञानिक पारंपरिक रूप से राजनीतिक रूप से तटस्थ रहते थे, वे खुले तौर पर एक्टिविस्ट बन रहे हैं जब उन्हें लगता है कि उनकी तकनीकी चेतावनियों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। हम देखते हैं कि दार्शनिक और इतिहासकार ऐसी जल्दबाजी में लिख रहे हैं जो उनके विषयों में आम नहीं थी, जैसे कि वे समय के साथ दौड़ लगा रहे हों ताकि ज़रूरी बातों को बता सकें जब तक उन्हें लागू करने में बहुत देर न हो जाए। यह बेचैनी बौद्धिक घमंड से नहीं आती, बल्कि यह पहचानने से आती है कि धीरे-धीरे और लोकतांत्रिक बदलावों के लिए अवसर के कुछ दरवाज़े तेज़ी से बंद हो रहे हैं। जब जलवायु वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे पास अपनी ऊर्जा प्रणालियों में बड़े बदलाव करने के लिए एक दशक है या ग्रह पर अपरिवर्तनीय बदलावों का सामना करना पड़ेगा, तो वे डर नहीं फैला रहे हैं। वे दशकों के कठोर शोध पर आधारित निष्कर्ष बता रहे हैं। जब इतिहासकार देखते हैं कि समकालीन लोकतंत्रों में राजनीतिक ध्रुवीकरण के पैटर्न ठीक उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो अतीत में लोकतांत्रिक पतन से पहले थे, वे निराशावादी नहीं हो रहे हैं। वे अपने विषय के उपकरणों का उपयोग करके उन रुझानों की पहचान कर रहे हैं जिन्हें समाज को समझने की ज़रूरत है ताकि उन्हें बदला जा सके। मूल समस्या यह है कि हमारी अटेंशन इकॉनमी व्यवस्थित रूप से उन लोगों को पुरस्कृत करती है जो आरामदायक सरलीकरण पेश करते हैं, बजाय उनके जो ज़रूरी जटिलताएं पेश करते हैं। लोगों को यह बताकर फॉलोअर्स हासिल करना आसान है कि उनकी सहज प्रवृत्ति सही है, बजाय इसके कि यह समझाया जाए कि वास्तविकता जितनी दिखती है उससे कहीं ज़्यादा जटिल है। मौजूदा पूर्वाग्रहों की पुष्टि करना ज़्यादा फायदेमंद है, बजाय इसके कि उन्हें ऐसे सबूतों से चुनौती दी जाए जो असुविधाजनक हो सकते हैं। जटिल समस्याओं के सरल समाधान का वादा करना राजनीतिक रूप से ज़्यादा फायदेमंद है, बजाय इसके कि यह समझाया जाए कि जटिल समस्याओं के लिए परिष्कृत समाधानों की आवश्यकता क्यों होती है जो शुरू में दर्दनाक या असुविधाजनक हो सकते हैं। जब हम उस पॉइंट पर पहुँचते हैं जहाँ विशेषज्ञता को शक की नज़र से देखा जाता है और जहाँ अपनी खुद की रिसर्च करना सालों की फॉर्मल ट्रेनिंग और पीयर रिव्यू के बराबर माना जाता है, तो हम ऐसी स्थितियाँ बनाते जा रहे हैं जहाँ इंसानियत की सामूहिक समझ को अब इंसानियत की सामूहिक चुनौतियों पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सकता। यह कोई एब्स्ट्रैक्ट या एकेडमिक समस्या नहीं है। यह पूरी सभ्यता की परियोजना के लिए एक अस्तित्वगत खतरा है क्योंकि जटिल सभ्यताएँ मौलिक रूप से विशेष ज्ञान को जमा करने, संरक्षित करने और लागू करने की क्षमता पर निर्भर करती हैं उन समस्याओं को हल करने के लिए जो किसी भी व्यक्ति की अकेले हल करने की क्षमता से परे हैं। इसलिए 2026 किसी खास भविष्यवाणी से ज़्यादा इस बात की पहचान है कि हम तेज़ी से एक ऐसे पल के करीब पहुँच रहे हैं जब ज़रअंदाज़ किए गए संकटों का जमावड़ा हमारी सामूहिक क्षमता पर हावी हो सकता है लोकतांत्रिक और धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देने के लिए। यह तब होता है जब उन लोगों का धैर्य खत्म हो सकता है, जिन्होंने इस पैटर्न को समझने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। ज़रूरी नहीं कि वे मदद करने की कोशिश करना छोड़ दें, बल्कि इसलिए कि खिड़कियाँ ऐसे समाधानों के अवसर जो स्वतंत्रता और स्थिरता दोनों को बनाए रखें, शायद बंद हो गए हों। यहाँ हम एक परेशान करने वाले सवाल पर आते हैं जिस पर शायद ही कभी खुले तौर पर चर्चा होती है। क्या होगा अगर हमारे युग के बुद्धिमान लोग यह तय करें कि जिस तरह से हम लोकतंत्र का पालन करते हैं, वह सभ्यता के अस्तित्व के साथ असंगत हो गया है? क्या होगा अगर वे इस नतीजे पर पहुँचें कि जो सिस्टम वैज्ञानिक सच्चाइयों को राजनीतिक राय का मामला मानते हैं, वे ऐसे सिस्टम हैं जो अस्तित्व के खतरों से ठीक से निपट नहीं सकते। यह सत्तावाद का समर्थन नहीं है, बल्कि यह पहचान है कि सिस्टम के दबाव ऐसे विकल्प चुनने पर मजबूर कर सकते हैं जिन्हें कोई नहीं चुनना चाहता। ऐतिहासिक रूप से, जब समाजों ने अस्तित्व के खतरों का सामना किया है, तो स्वतंत्रता और अस्तित्व के बीच, धीमी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और त्वरित और समन्वित कार्रवाई की जरूरतों के बीच हमेशा तनाव रहा है। हमारे युग में अंतर यह है कि खतरे एक साथ अधिक जटिल, अधिक आपस में जुड़े हुए, और मानवता ने अब तक जो कुछ भी सामना किया है, उससे कहीं अधिक जरूरी हैं। जबकि हमारे सामूहिक निर्णय लेने वाले सिस्टम जटिल जानकारी को संसाधित करने और भावना के बजाय सबूतों के आधार पर कार्य करने में कम सक्षम हो गए हैं। बुद्धिमानों का अधैर्य कई तरह से प्रकट हो सकता है। कुछ लोग सार्वजनिक बहस से पूरी तरह से पीछे हट सकते हैं, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि उनकी ऊर्जा एक ऐसी सभ्यता को बचाने की कोशिश करने के बजाय छोटे समूहों को यह सिखाने में बेहतर ढंग से लगाई जा सकती है कि आगे क्या होने वाला है, जो खुद को बचाना नहीं चाहती। अन्य लोग इतने गहरे सिस्टमगत परिवर्तनों का बचाव करने की दिशा में कट्टरपंथी हो सकते हैं कि वे इस बारे में मौलिक मान्यताओं को चुनौती दें कि हमारे समाज को कैसे काम करना चाहिए। फिर भी अन्य लोग समानांतर विकल्प, समुदाय और संस्थान बनाने के लिए खुद को समर्पित कर सकते हैं जो व्यापक समाजों के सिद्धांतों से अलग सिद्धांतों पर काम करते हैं। इनमें से कोई भी ऑप्शन उन लोगों के लिए खास आकर्षक नहीं है जो ज्ञान और लोकतंत्र, दोनों को महत्व देते हैं सच्चाई और आज़ादी दोनों को। लेकिन सच्चाई यह है कि जो सिस्टम अपने कामकाज में समझदारी को शामिल नहीं कर पाते, वे हमेशा तक टिक नहीं पाते, जब उन्हें ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिनके लिए ठीक उसी समझदारी की ज़रूरत होती है उनसे निपटने के लिए। यह हमें हमारे दौर की दुविधा को केंद्र में लाता है। दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यों को कैसे बचाया जाए जहां इंसानियत के भविष्य के लिए सबसे ज़रूरी फैसलों के लिए खास ज्ञान के ऐसे स्तर की ज़रूरत होती है जो ज़्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर है और जहां हावी कम्युनिकेशन सिस्टम उस ज्ञान के सही ट्रांसमिशन के प्रति सक्रिय रूप से दुश्मन हैं। ऐसे माहौल में व्यक्तिगत आज़ादी कैसे बनाए रखी जाए जहां कुछ व्यक्तिगत चुनाव, जब लाखों लोगों द्वारा किए जाते हैं, तो पूरी सभ्यता की स्थिरता को खतरे में डाल सकते हैं। ये सिर्फ सैद्धांतिक सवाल नहीं हैं। ये व्यावहारिक दुविधाएं हैं जिनका हम अभी सामना कर रहे हैं जब कुछ दर्जन इंजीनियरों द्वारा विकसित एल्गोरिदम अरबों लोगों की मान्यताओं को इस तरह से प्रभावित कर सकते हैं कि ये इंजीनियर खुद भी इसे पूरी तरह से नहीं समझते हैं। किस तरह का शासन सिस्टम उस शक्ति को ठीक से संभाल सकता है? जलवायु परिवर्तन के लिए बड़े आर्थिक बदलावों की ज़रूरत होगी, जो मानव जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित करेंगे। लेकिन इन बदलावों को स्वेच्छा से लागू करना ज़्यादातर लोकतंत्रों में राजनीतिक रूप से असंभव लगता है, सत्तावादी शासन सिस्टम थोपने या अराजक पतन के अलावा क्या विकल्प मौजूद हैं? पारंपरिक ज्ञान हमेशा सिखाता रहा है कि शिक्षा ही इन दुविधाओं का जवाब है। अगर लोग समस्याओं को बेहतर समझेंगे, तो वे बेहतर चुनाव करेंगे। लेकिन क्या होता है जब शिक्षा प्रणालियां खुद ही ऐसे हितों के कब्जे में आ जाती हैं जो अज्ञानता बनाए रखने से फायदा उठाते हैं? क्या होता है जब शिक्षा खुद एक राजनीतिक युद्ध का मैदान बन जाती है, जहां बच्चों को आलोचनात्मक रूप से सोचना सिखाना उन समूहों द्वारा ब्रेनवॉशिंग माना जाता है जो चाहते हैं कि वे बिना सवाल किए आज्ञा मानना सीखें। हम उस मोड़ पर पहुँच गए हैं जहाँ समझदार लोगों के सब्र का इम्तिहान न सिर्फ़ हमारे सामने आने वाली समस्याओं की मुश्किलों से हो रहा है बल्कि उन सांस्कृतिक और संस्थागत साधनों के लगातार खराब होने से भी हो रहा है, जिनका इस्तेमाल हम परंपरागत रूप से समस्याओं को मिलकर हल करने के लिए करते आए हैं। काम करने वाली संस्थाओं के साथ किसी मुश्किल चुनौती का सामना करना एक बात है। एक ही समय में कई अस्तित्व संबंधी चुनौतियों का सामना करना बिल्कुल अलग बात है, बल्कि इन समस्याओं का सामना करने वाली संस्थाओं को उन्हें जानबूझकर खराब किया जा रहा है। शायद इस बढ़ती बेसब्री का सबसे साफ़ संकेत उन लोगों की लेखनी और भाषणों के लहजे में बदलाव है, जिन्होंने अपना जीवन मानव समाजों का अध्ययन करने के लिए समर्पित कर दिया है। एक बढ़ती हुई बेचैनी है, एक बेबाकी है जो कभी-कभी निराशा की हद तक पहुँच जाती है, ऐसी असुविधाजनक सच्चाइयों को कहने की इच्छा है जिन्हें पहले ज़्यादा कूटनीतिक तरीकों से बताया जाता था। जब सम्मानित इतिहासकार ऐसी किताबें लिखना शुरू करते हैं जिनके शीर्षकों में पतन और अंत जैसे शब्द शामिल होते हैं। जब जलवायु वैज्ञानिक विज्ञान की सावधानी भरी भाषा में आपातकाल और तबाही जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना। जब राजनीतिक दार्शनिक खुले तौर पर यह सवाल उठाने लगते हैं कि क्या लोकतंत्र लंबे समय तक जीवित रहने के साथ मेल खाता है, तो हम सिर्फ़ अकादमिक फैशन में बदलाव से कहीं ज़्यादा कुछ देख रहे हैं। इस बात के सबूत देख रहे हैं कि जो लोग हमारी सामूहिक स्थिति का आकलन करने के लिए सबसे ज़्यादा योग्य हैं, वे खतरनाक नतीजों पर पहुँच रहे हैं। हमारे युग का मुख्य विरोधाभास यह है कि हमें सामूहिक समझ की इतनी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी और हमें इसे हासिल करने और लागू करने में इतनी मुश्किल कभी नहीं हुई। हमारे पास उन ज़्यादातर समस्याओं को हल करने के लिए ज़रूरी तकनीकी ज्ञान है जिनका हम सामना करते हैं। हम जानते हैं कि टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली कैसे बनाई जाती है। हम जानते हैं कि ज़्यादा न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्थाएँ कैसे बनाई जाती हैं। हम जानते हैं कि लोगों को आलोचनात्मक रूप से सोचने के लिए कैसे शिक्षित किया जाता है। हम जानते हैं कि ऐसी तकनीकें कैसे डिज़ाइन की जाती हैं जो अच्छे विकल्प चुनने की मानवीय क्षमता को कम करने के बजाय बढ़ाती हैं। हम जानते हैं कि ऐसे संस्थान कैसे बनाए जाते हैं जो एक साथ लोकतांत्रिक और प्रभावी हों। जो चीज़ हमारी क्षमताओं से परे लगती है, वह है इस ज्ञान को सामूहिक रूप से लागू करना, उन प्रणालीगत प्रतिरोधों के सामने जो उन ताकतों से ज़्यादा शक्तिशाली हो गए हैं जो परंपरागत रूप से सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देती हैं। मुझे एक पल के लिए रुककर आपसे सीधे पूछना है। जब आप अपने आस-पास की दुनिया को देखते हैं, तो क्या आपको भी वही बढ़ता हुआ तनाव महसूस होता है कि हमें क्या करने की ज़रूरत है और हम सामूहिक रूप से क्या करने में सक्षम लगते हैं? क्या आप इस खास निराशा को पहचानते हैं कि ज़रूरी समस्याओं के स्पष्ट समाधान दिख रहे हैं, लेकिन यह भी दिख रहा है कि इन समाधानों को उन ताकतों द्वारा व्यवस्थित रूप से कैसे रोका या विकृत किया जा रहा है जो समस्याओं को बनाए रखने से फ़ायदा उठाती हैं? हममें से कई लोग इस चिंता को चुपचाप सहते हैं, यह सोचते हुए कि क्या हम ही चीज़ों को ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय तरीके से देख रहे हैं या हम सच में एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण में जी रहे हैं जो अपनी जटिलता और तात्कालिकता में अनोखा है। अगर यह तनाव आपके अनुभव से मेल खाता है, तो कमेंट्स में शेयर करें। मैं इस अर्जेंसी को समझता हूँ जब आपका नज़रिया दूसरों की मदद कर सकता है इस सोच में कि उन्हें कम अकेलापन महसूस हो कि कुछ बुनियादी बदलाव करने की ज़रूरत है कि हम सामूहिक फैसले कैसे लेते हैं और इन बदलावों के लिए समय शायद उतना सीमित हो जितना हम मानना नहीं चाहते। हमारी मौजूदा स्थिति पर समझदार लोगों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होगी। कुछ लोग क्लासिकल पढ़ाने और लिखने की परंपरा में बने रहेंगे, यह भरोसा करते हुए कि ज़रूरी सच आखिरकार व्यावहारिक इस्तेमाल तक पहुँच ही जाते हैं। दूसरे लोग शायद ज़्यादा सीधे एक्टिविज़्म के तरीके अपनाएँ, अपनी पहचान और ज्ञान का इस्तेमाल करके राजनीति को उन तरीकों से प्रभावित करें जिनसे वे पारंपरिक रूप से बचते थे। कुछ और लोग शायद छोटे पैमाने पर वैकल्पिक मॉडल बनाने पर ध्यान दें, यह दिखाते हुए कि समाज को व्यवस्थित करने के अलग-अलग तरीके न केवल संभव हैं बल्कि मौजूदा मॉडल से बेहतर भी हैं। लेकिन एक सबसे परेशान करने वाली संभावना यह भी है कि हमारे दौर के समझदार लोगों का एक बड़ा हिस्सा शायद मौजूदा समाजों में सुधार करने या उन्हें बचाने के प्रोजेक्ट से ही पीछे हट जाए। निराशा या स्वार्थ की वजह से नहीं, बल्कि इस ठंडे विश्लेषण से कि उनकी सीमित ऊर्जा को दूसरे प्रोजेक्ट्स में बेहतर तरीके से लगाया जा सकता है। यह एक मौलिक ऐतिहासिक बदलाव होगा क्योंकि परंपरागत रूप से किसी समाज के सबसे काबिल बुद्धिजीवी अपनी ऊर्जा का कम से कम कुछ हिस्सा उस समाज को बेहतर बनाने में लगाते हैं। अगर यह रिश्ता टूट जाता है, तो लोकतांत्रिक समाज की आत्म-सुधार और अनुकूलन की क्षमता के लिए इसके परिणाम गहरे और संभावित रूप से अपरिवर्तनीय होंगे । इस विश्लेषण में साल 2026 दुनिया के अंत से ज़्यादा लोकतांत्रिक समाज की क्षमता के बारे में आशावाद के एक खास दौर के अंत को दिखाता है कि वह उन चुनौतियों से निपटने के लिए तेज़ी से अनुकूलन कर सके जिनके लिए तकनीकी विशेषज्ञता और वैश्विक समन्वय दोनों की ज़रूरत है। ज़रूरी नहीं कि ऐसा इसलिए हो क्योंकि ये चुनौतियाँ हल करना असंभव हैं, बल्कि इसलिए कि इन्हें हल करने में राजनीतिक और सांस्कृतिक बाधाएँ मौजूदा संस्थागत ढाँचों के भीतर पार करना मुश्किल हो गई हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें निराशा या हार मान लेनी चाहिए। इसका मतलब है कि हमें उन बदलावों की गंभीरता के बारे में ईमानदार रहना होगा जो ज़रूरी हो सकते हैं और उन्हें धीरे-धीरे और सबकी सहमति से लागू करने के लिए कितना कम समय बचा है। इसका मतलब है यह पहचानना कि जिन मूल्यों को हम सबसे ज़्यादा संजोते हैं, उन्हें बनाए रखने के लिए उन संरचनाओं और प्रक्रियाओं में गहरे बदलावों की ज़रूरत हो सकती है जिनके माध्यम से हम उन्हें साकार करने की कोशिश करते हैं। इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सबकों में से एक यह है कि सभ्यताएँ इसलिए नहीं मरतीं क्योंकि उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिन्हें हल करना असंभव है। वे इसलिए मरती हैं क्योंकि वे उन समाधानों को लागू करने की क्षमता खो देती हैं जो उनके पास पहले से हैं। हमारा युग शायद इस क्षमता की एक निर्णायक परीक्षा के करीब पहुँच रहा है। सवाल यह नहीं है कि क्या हमारे पास एक स्थायी और समृद्ध भविष्य बनाने के लिए ज़रूरी तकनीकी ज्ञान है। सवाल यह है कि क्या हमारे पास ज़रूरी सामूहिक बुद्धिमत्ता है ।

मुक्त मन

 सूचना मिलनें में विलम्ब के कारण सैमुअल मोर्स अपनी 25 वर्ष की युवा पत्नी की कब्र ही देख पाए और इस विवशता से एक संकल्प पैदा हुआ कि सूचना के समयान्तराल को न्यूनतम कैसे किया जाय और उनके इस भावनात्मक दुख ने एक तर्क प्रणाली विकसित किया जो मोर्स कोड के रुप जाना जाता है और पत्नी की मृत्यु के 18 साल बाद अमरीकी सीनेट ने इस प्रणाली के व्यावहारिक प्रयोग की वित्तीय स्वीकृत सन् 1844 में दी और सूचनाओं की विद्युत गति ने जन सामान्य की सुविधा के साथ ही राजसत्ताओं को नए किस्म का हथियार थमा दिया। हां मोर्स मूलतः चित्रकार थे

1844 के बाद से सूचनाओं के प्रेषण में इतने बहुआयामी बदलाव हो चुके हैं कि मोर्स कोड भी आज घोड़ा-गाड़ी दौर की तकनीक से ज्यादा नही लगती। आज सूचनाओं के तरंग प्रवाह में हम खुद को एक स्क्रीन के रुप में बदल रहे हैं, जिसपर हमारी छवियां निरंतर प्रसारित हो रही हैं। यह स्क्रीन या पारदर्शिता सर्वसत्तावाद का नया चेहरा है, जो व्यक्ति को स्वयं को स्वेच्छा से निरंतर उजागर करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
सोशल मीडिया व्यक्ति की अपनी प्रवित्तियों को लाइकेबुल या सर्वस्वीकार्य बनाने की प्रवृत्तियों के अधीन करता जा रहा हैं और इस तरह से हम बहुमत के प्रवाह में बहने के लिए दिशा नियंत्रित तैराक बन गए हैं। जबकि बर्चुवल विश्व में बहुमत भी कल्पित होनें की सम्भावना से भरा हुआ है।
हमारी सहज प्रतीत होने वाली प्रवित्तियों पर कारपोरेट और पूंजी के नियंत्रण की अदृश्य जंजीर हमारी प्रवृत्तियों को जाने-अनजाने एक निर्धारित दिशा दे रही है, जो हमें स्वाभाविक प्रतीत होता है। यह पारर्शिता स्वतंत्रता नहीं अपितु एकरुपता पैदा कर रही है, क्योंकि जब हर कोई हर किसी को देख रहा है तो हर कोई लाइकेबुल बनना चाह रहा है और उसकी स्वीकार्यता की भूख ने उसकी मौलिकता और विभिन्नता को आत्मनियंत्रण के पारदर्शी फिल्टर में गुम कर दिया हैं।
यह जाने या अनजाने निगरानी की लोकतांत्रिक प्रणाली है, जिसकी अदृश्य कांचनुमा जेल में हम स्वयं खुशी-खुशी कैद होने के लिए प्रस्तुत हैं। पूंजी और सत्ता के लिए यह सबसे अनुकूल जेल है क्योंकि हमारे मस्तिष्क का वो हिस्सा जो भावनाओं के लिए जिम्मेदार है उस हिस्से से अधिक प्रभावी है जो तर्क के लिए जिम्मेदार हैं और भावनाएं ही हमारी सुख-दुख का कारण बनती हैं तो कोई तर्क दुख का कारण बने तो हमारा दिमाग उसके विकल्प तत्काल ढूढ़ने लगता है और कोई तर्क सुख का कारण बनता है तो हम उसे तत्काल स्वीकार कर लेते हैं। इसी भावनात्मक दोहन का उपयोग करके सूचना तरंगों पर विकसित विज्ञापन उद्योग टिका हुआ है।
सूचनाओं के इस लोकतंत्र में हम भावनात्मक सुखों में विभोर होने के लिए उसके स्वीकार्य तर्क प्रणाली में इतने डूबते जा रहे हैं कि या तो उस परिधि के बाहर देखनें की क्षमता सीमित होती जा रही है अथवा हम अपनी मनोभूमि के अनुरुप कोई तर्क प्रणाली स्वीकार करके खुद को संतुष्ट कर ले रहे हैं।
तो इस वर्चुवल विश्व में स्वामी दयानन्द सरस्वती या कबीर होना अधिक चुनौती पूर्ण है, जबकि राजनैतिक सत्ताएं अपने-अपने भूगोल में लाल, हरा, केसरिया विचारों के एकाधिकार को संरक्षित और सुरक्षित रखनें में अधिक सक्षम हो गयी हैं।
त्रासदी यह है कि सत्ताएं व्यक्ति को अधिकतम पारदर्शी बनने के लिए प्रेरित कर रही है लेकिन अपने शीर्ष के गोपन को अधिकतम सुरक्षित रखनें की प्रविधियों का निरन्तर विकास कर रही है। तभी तो अधिकतम लोकतंत्र का दावा करने वाली महाशक्ति सूचनाओं को विद्युत गति से प्रवाहित होने का प्राविधान करने के लगभग 166 वर्ष बाद अपने ही सत्तातंत्र के शीर्ष रहस्यों की सूचना को उजागर करने वाले पत्रकार को गिरफ्तार करने का रेड कार्नर नोटिस जारी कर देती है। लेकिन परिवर्तन अटल नियम है सत्ताएं अपने अंतविरोध के कारण ढहती भी रही हैं।

शनिवार, 22 मार्च 2025

कृत्रिम बुद्धि से कुछ जिज्ञासाएं-2

 ग्राेक‚ डीपसीक‚ चैट–जीपीटी से मेरी जिज्ञासा– 

सभ्यता के आरंभ से विश्व के प्रमुख दार्शनिकों के बारे मेंउनके दर्शन तथा उनका देशकाल पर पड़े प्रभाव के बारे में बताइए।

ग्रोक

सभ्यता के आरंभ से लेकर अब तक विश्व में कई महान दार्शनिक हुए हैं, जिन्होंने अपने विचारों से मानव समाज, नैतिकता, विज्ञान, और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। नीचे कुछ प्रमुख दार्शनिकों, उनके दर्शन, और उनके देशकाल पर प्रभाव का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:

 

### 1. **सुकरात (Socrates) - यूनान (469-399 ईसा पूर्व)**

- **दर्शन:** सुकरात ने "सुकराती पद्धति" विकसित की, जिसमें प्रश्न-उत्तर के माध्यम से सत्य की खोज की जाती थी। उनका मुख्य ध्यान नैतिकता और आत्म-ज्ञान पर था ("अपने आप को जानो")।

- **प्रभाव:** यूनान में बौद्धिक जागृति को बढ़ावा दिया। उनके विचारों ने प्लेटो और अरस्तू जैसे शिष्यों के माध्यम से पश्चिमी दर्शन की नींव रखी। उनकी मृत्यु (विषपान द्वारा) ने लोकतंत्र और स्वतंत्र चिंतन पर बहस छेड़ दी।

 

### 2. **कन्फ्यूशियस (Confucius) - चीन (551-479 ईसा पूर्व)**

- **दर्शन:** कन्फ्यूशियस ने नैतिकता, पारिवारिक सम्मान, और सामाजिक सद्भाव पर आधारित दर्शन दिया, जिसे कन्फ्यूशियनिज़्म कहते हैं। "स्वर्णिम नियम" (जो तुम्हें पसंद न हो, वह दूसरों के साथ मत करो) उनका प्रसिद्ध सिद्धांत है।

- **प्रभाव:** चीन और पूर्वी एशिया में सामाजिक व्यवस्था, शिक्षा, और शासन प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी शिक्षाओं ने चीनी सभ्यता को सदियों तक प्रभावित किया।

 

### 3. **प्लेटो (Plato) - यूनान (428/427-348/347 ईसा पूर्व)**

- **दर्शन:** प्लेटो ने "आदर्शवाद" की नींव रखी और "रिपब्लिक" में एक आदर्श राज्य की संकल्पना की। उनका मानना था कि वास्तविकता "रूपों" (Forms) के एक अमूर्त संसार में निहित है।

- **प्रभाव:** पश्चिमी दर्शन और राजनीतिक सिद्धांत पर उनका प्रभाव अपार है। उनकी अकादमी ने यूरोप में शिक्षा और चिंतन की परंपरा शुरू की।

### 4. **अरस्तू (Aristotle) - यूनान (384-322 ईसा पूर्व)**

- **दर्शन:** अरस्तू ने तर्क, विज्ञान, नैतिकता, और मेटाफिजिक्स पर कार्य किया। उनका "मध्यम मार्ग" (Golden Mean) और कारण-कार्य सिद्धांत प्रसिद्ध है।

- **प्रभाव:** उनके विचारों ने मध्यकालीन यूरोप, इस्लामी दर्शन, और आधुनिक विज्ञान को प्रभावित किया। अरस्तू की रचनाएँ पश्चिमी शिक्षा का आधार बनीं।

 

### 5. **गौतम बुद्ध (Gautama Buddha) - भारत (563-483 ईसा पूर्व)**

- **दर्शन:** बुद्ध ने "चार आर्य सत्य" और "अष्टांगिक मार्ग" के माध्यम से दुख से मुक्ति का मार्ग दिखाया। उनका दर्शन अहिंसा, करुणा, और ध्यान पर केंद्रित था।

- **प्रभाव:** बौद्ध धर्म के रूप में भारत से लेकर एशिया के विभिन्न हिस्सों में फैला। इसने कला, संस्कृति, और शासन पर प्रभाव डाला।

 

### 6. **इब्न सिना (Avicenna) - फारस (980-1037 ईस्वी)**

- **दर्शन:** इस्लामी स्वर्ण युग के इस दार्शनिक ने अरस्तू के विचारों को इस्लामी दर्शन के साथ जोड़ा। उनकी पुस्तक "कैनन ऑफ मेडिसिन" चिकित्सा और तर्क पर आधारित थी।

- **प्रभाव:** मध्यकालीन यूरोप और इस्लामी दुनिया में विज्ञान और दर्शन पर प्रभाव पड़ा। उनकी रचनाएँ पुनर्जनन काल तक पढ़ी गईं।

 

### 7. **रेने देकार्त (René Descartes) - फ्रांस (1596-1650)**

- **दर्शन:** "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" (Cogito, ergo sum) उनका प्रसिद्ध कथन है। उन्होंने तर्क और संदेह को दर्शन का आधार बनाया।

- **प्रभाव:** आधुनिक दर्शन और विज्ञान की नींव रखी। उनके विचारों ने यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति को बढ़ावा दिया।

 

### 8. **इम्मानुएल कांट (Immanuel Kant) - जर्मनी (1724-1804)**

- **दर्शन:** कांट ने "निरपेक्ष आज्ञाकारी" (Categorical Imperative) और ज्ञान के स्रोतों (अनुभव और तर्क) पर कार्य किया। उनका मानना था कि मानव अनुभव वास्तविकता को आकार देता है।

- **प्रभाव:** आधुनिक दर्शन, नैतिकता, और विज्ञान पर उनका प्रभाव गहरा है। जर्मन आदर्शवाद की नींव रखी।

 

### 9. **कार्ल मार्क्स (Karl Marx) - जर्मनी (1818-1883)**

- **दर्शन:** मार्क्स ने साम्यवाद का सिद्धांत दिया, जिसमें वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद की आलोचना थी। "दास कैपिटल" उनकी प्रमुख रचना है।

- **प्रभाव:** 20वीं सदी में रूस, चीन, और अन्य देशों में क्रांतियों को प्रेरित किया। सामाजिक और आर्थिक विचारधारा पर उनका प्रभाव आज भी दिखता है।

 

### निष्कर्ष

इन दार्शनिकों ने अपने समय और स्थान के संदर्भ में मानव चिंतन को नई दिशा दी। प्राचीन यूनान से लेकर आधुनिक यूरोप तक, भारत से चीन तक, इनके विचारों ने सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। क्या आप किसी विशेष दार्शनिक या उनके विचारों के बारे में और विस्तार से जानना चाहेंगे?

 

 

डीपसीक

सभ्यता के आरंभ से लेकर आज तक विश्व ने कई महान दार्शनिकों को देखा है, जिन्होंने मानव जीवन, समाज, नैतिकता, और ब्रह्मांड के बारे में गहन विचार किया है। यहाँ कुछ प्रमुख दार्शनिकों, उनके दर्शन, और उनके देशकाल पर पड़े प्रभाव के बारे में विवरण दिया गया है:

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### **1. सुकरात (469–399 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन यूनान (एथेंस)

   - **दर्शन**: सुकरात ने नैतिकता और ज्ञान पर जोर दिया। उनका मुख्य सिद्धांत "स्वयं को जानो" था।

   - **प्रभाव**: उनके प्रश्नोत्तर पद्धति (Socratic Method) ने पश्चिमी दर्शन की नींव रखी। उनके विचारों ने प्लेटो और अरस्तू जैसे दार्शनिकों को प्रभावित किया।

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### **2. प्लेटो (427–347 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन यूनान (एथेंस)

   - **दर्शन**: प्लेटो ने "आदर्श राज्य" की अवधारणा प्रस्तुत की और "फॉर्म्स" (Forms) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

   - **प्रभाव**: उनके दर्शन ने पश्चिमी दर्शन, राजनीति, और शिक्षा को गहराई से प्रभावित किया। उनकी पुस्तक "द रिपब्लिक" आज भी राजनीतिक दर्शन का मूल ग्रंथ मानी जाती है।

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### **3. अरस्तू (384–322 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन यूनान (मकदूनिया)

   - **दर्शन**: अरस्तू ने तर्कशास्त्र, नैतिकता, और प्राकृतिक विज्ञान पर काम किया। उनका मुख्य सिद्धांत "सुनहरा माध्यम" (Golden Mean) था।

   - **प्रभाव**: उनके कार्यों ने मध्ययुगीन यूरोपीय दर्शन और विज्ञान को प्रभावित किया। उन्हें "पश्चिमी दर्शन का पिता" माना जाता है।

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### **4. कन्फ्यूशियस (551–479 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन चीन

   - **दर्शन**: कन्फ्यूशियस ने नैतिकता, परिवार, और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया। उनका मुख्य सिद्धांत "सुनहरा नियम" (Golden Rule) था।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने चीनी समाज, शिक्षा, और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। कन्फ्यूशियसवाद आज भी चीन और पूर्वी एशिया में प्रभावशाली है।

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### **5. लाओत्से (6वीं शताब्दी ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन चीन

   - **दर्शन**: लाओत्से ने "ताओवाद" (Taoism) की स्थापना की, जो प्रकृति और सादगी पर आधारित है।

   - **प्रभाव**: ताओवाद ने चीनी संस्कृति, धर्म, और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया।

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### **6. गौतम बुद्ध (563–483 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन भारत

   - **दर्शन**: बुद्ध ने "चार आर्य सत्य" और "अष्टांगिक मार्ग" का प्रतिपादन किया, जो दुख और मोक्ष से संबंधित हैं।

   - **प्रभाव**: बौद्ध धर्म ने एशिया और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित किया। यह शांति और करुणा का संदेश देता है।

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### **7. महावीर (599–527 ईसा पूर्व)**

   - **देश**: प्राचीन भारत

   - **दर्शन**: महावीर ने जैन धर्म की स्थापना की, जो अहिंसा, सत्य, और आत्म-नियंत्रण पर आधारित है।

   - **प्रभाव**: जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति और दर्शन को प्रभावित किया।

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### **8. थॉमस एक्विनास (1225–1274)**

   - **देश**: इटली

   - **दर्शन**: एक्विनास ने ईसाई धर्म और अरस्तू के दर्शन को मिलाकर "थॉमिस्म" (Thomism) की स्थापना की।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने मध्ययुगीन यूरोपीय दर्शन और धर्मशास्त्र को प्रभावित किया।

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### **9. रेने डेकार्ट (1596–1650)**

   - **देश**: फ्रांस

   - **दर्शन**: डेकार्ट ने "कार्टेशियन द्वैतवाद" (Cartesian Dualism) का प्रतिपादन किया और "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" (Cogito, ergo sum) का सिद्धांत दिया।

   - **प्रभाव**: उन्हें "आधुनिक दर्शन का पिता" माना जाता है। उनके विचारों ने विज्ञान और दर्शन को प्रभावित किया।

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### **10. इमैनुएल कांट (1724–1804)**

   - **देश**: जर्मनी

   - **दर्शन**: कांट ने "आलोचनात्मक दर्शन" (Critical Philosophy) का प्रतिपादन किया और "नैतिकता का सिद्धांत" (Categorical Imperative) दिया।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने आधुनिक नैतिकता और राजनीतिक दर्शन को प्रभावित किया।

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### **11. कार्ल मार्क्स (1818–1883)**

   - **देश**: जर्मनी

   - **दर्शन**: मार्क्स ने "मार्क्सवाद" की स्थापना की, जो वर्ग संघर्ष और साम्यवाद पर आधारित है।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने 20वीं शताब्दी की राजनीति और अर्थशास्त्र को गहराई से प्रभावित किया।

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### **12. फ्रेडरिक नीत्शे (1844–1900)**

   - **देश**: जर्मनी

   - **दर्शन**: नीत्शे ने "अच्छे और बुरे" की अवधारणा को चुनौती दी और "सुपरमैन" (Übermensch) का सिद्धांत दिया।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने अस्तित्ववाद और आधुनिक दर्शन को प्रभावित किया।

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### **13. महात्मा गांधी (1869–1948)**

   - **देश**: भारत

   - **दर्शन**: गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने भारत की स्वतंत्रता और दुनिया भर में नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रेरित किया।

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### **14. जीन-पॉल सार्त्र (1905–1980)**

   - **देश**: फ्रांस

   - **दर्शन**: सार्त्र ने "अस्तित्ववाद" (Existentialism) का प्रतिपादन किया, जो स्वतंत्रता और जिम्मेदारी पर आधारित है।

   - **प्रभाव**: उनके विचारों ने 20वीं शताब्दी के साहित्य और दर्शन को प्रभावित किया।

 

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### **निष्कर्ष**

ये दार्शनिक और उनके विचार मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनके दर्शन ने न केवल उनके समय को प्रभावित किया, बल्कि आज भी उनके विचार प्रासंगिक हैं और समाज, राजनीति, और नैतिकता को आकार दे रहे हैं।

  

चैट–जीपीटी


विश्व के प्रमुख दार्शनिकों, उनके विचारों और उनके देशकाल पर पड़े प्रभाव की एक विस्तृत सूची नीचे दी गई है। 

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## **प्राचीन काल (600 BCE – 500 CE)** 

### **1. कन्फ्यूशियस (Confucius) – (551 BCE - 479 BCE, चीन)** 

- **दर्शन**: नैतिकता, सदाचार, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक समरसता पर बल। 

- **प्रभाव**: चीन, कोरिया, जापान और वियतनाम की सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना पर गहरा प्रभाव। 

### **2. बुद्ध (Gautama Buddha) – (563 BCE - 483 BCE, भारत/नेपाल)** 

- **दर्शन**: दुख, तृष्णा और निर्वाण पर केंद्रित; मध्यम मार्ग और अहिंसा का प्रचार। 

- **प्रभाव**: एशिया के कई देशों में बौद्ध धर्म का प्रसार। 

### **3. सुकरात (Socrates) – (469 BCE - 399 BCE, ग्रीस)** 

- **दर्शन**: संवाद और प्रश्नोत्तर पद्धति (सोक्रेटिक मेथड); आत्मज्ञान और नैतिकता पर बल। 

- **प्रभाव**: पश्चिमी दर्शन के विकास में अहम भूमिका। 

### **4. प्लेटो (Plato) – (427 BCE - 347 BCE, ग्रीस)** 

- **दर्शन**: आदर्श राज्य, न्याय और रूपों के सिद्धांत पर बल। 

- **प्रभाव**: यूरोपीय राजनीतिक विचारों और शिक्षा प्रणाली पर गहरा प्रभाव। 

### **5. अरस्तू (Aristotle) – (384 BCE - 322 BCE, ग्रीस)** 

- **दर्शन**: तर्कशास्त्र, जीवविज्ञान, राजनीति, नीतिशास्त्र और काव्यशास्त्र पर कार्य। 

- **प्रभाव**: विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में ग्रीक, रोमन और इस्लामिक जगत को प्रभावित किया। 

### **6. ज़रथुस्त्र (Zoroaster) – (628 BCE - 551 BCE, ईरान/फारस)** 

- **दर्शन**: द्वैतवाद अच्छाई (अहुरा मज़्दा) और बुराई (अंग्रह मैन्यु) की लड़ाई। 

- **प्रभाव**: पारसी धर्म की स्थापना; ईरान और मध्य एशिया पर प्रभाव। 

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## **मध्यकाल (500 CE – 1600 CE)** 

### **7. सेंट ऑगस्टीन (Saint Augustine) – (354 CE - 430 CE, रोमन साम्राज्य)** 

- **दर्शन**: ईसाई धर्म के दार्शनिक आधारों को विकसित किया। 

- **प्रभाव**: रोमन कैथोलिक चर्च और मध्ययुगीन यूरोप की धार्मिक सोच को आकार दिया। 

### **8. अद्वैत वेदांत के शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) – (788 CE - 820 CE, भारत)** 

- **दर्शन**: अद्वैत वेदांत ब्रह्म और आत्मा की एकता पर बल। 

- **प्रभाव**: भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा पर अमिट छाप। 

### **9. अविसेन्ना (Ibn Sina) – (980 CE - 1037 CE, फारस/इस्लामी दुनिया)** 

- **दर्शन**: चिकित्सा, गणित, और दर्शन में योगदान; इस्लामिक और पश्चिमी यूरोपीय पुनर्जागरण पर प्रभाव। 

### **10. इब्न रश्द (Averroes) – (1126 CE - 1198 CE, स्पेन)** 

- **दर्शन**: अरस्तू के विचारों की पुनर्व्याख्या; इस्लाम और पश्चिमी मध्ययुगीन दर्शन पर प्रभाव। 

### **11. माक्र्वेली (Niccolò Machiavelli) – (1469 CE - 1527 CE, इटली)** 

- **दर्शन**: यथार्थवादी राजनीति – "राजा को नैतिकता से अधिक शक्ति पर ध्यान देना चाहिए"। 

- **प्रभाव**: आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों और कूटनीति पर प्रभाव। 

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## **आधुनिक काल (1600 CE – 1900 CE)** 

### **12. रेने डिकार्ट (René Descartes) – (1596 CE - 1650 CE, फ्रांस)** 

- **दर्शन**: युक्तिवाद (Rationalism) – "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ"। 

- **प्रभाव**: आधुनिक पश्चिमी तर्कशास्त्र और गणित में क्रांति। 

### **13. जॉन लोके (John Locke) – (1632 CE - 1704 CE, इंग्लैंड)** 

- **दर्शन**: उदारवाद, प्राकृतिक अधिकार, और सरकार की सीमाएं। 

- **प्रभाव**: लोकतंत्र, मानवाधिकार, और अमेरिकी संविधान। 

### **14. इमैनुएल कांट (Immanuel Kant) – (1724 CE - 1804 CE, जर्मनी)** 

- **दर्शन**: नैतिकता, तर्कशास्त्र, और ज्ञानमीमांसा पर जोर। 

- **प्रभाव**: आधुनिक पश्चिमी नैतिकता और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया। 

### **15. कार्ल मार्क्स (Karl Marx) – (1818 CE - 1883 CE, जर्मनी)** 

- **दर्शन**: साम्यवाद, वर्ग संघर्ष, और ऐतिहासिक भौतिकवाद। 

- **प्रभाव**: समाजवाद और श्रमिक आंदोलन, सोवियत संघ और चीन की राजनीतिक विचारधारा। 

### **16. फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) – (1844 CE - 1900 CE, जर्मनी)** 

- **दर्शन**: "ईश्वर मर चुका है", नैतिक सापेक्षता, और अति-मानव की अवधारणा। 

- **प्रभाव**: अस्तित्ववाद और उत्तर-आधुनिकता पर गहरा प्रभाव। 

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## **आधुनिकतम काल (1900 CE – वर्तमान)** 

### **17. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) – (1869 CE - 1948 CE, भारत)** 

- **दर्शन**: अहिंसा, सत्याग्रह, और स्वराज। 

- **प्रभाव**: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और वैश्विक अहिंसात्मक आंदोलनों पर प्रभाव। 

### **18. जीन-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) – (1905 CE - 1980 CE, फ्रांस)** 

- **दर्शन**: अस्तित्ववाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी पर बल। 

- **प्रभाव**: आधुनिक दर्शन, साहित्य, और राजनीति में प्रभाव। 

### **19. माइकल फूको (Michel Foucault) – (1926 CE - 1984 CE, फ्रांस)** 

- **दर्शन**: सत्ता, ज्ञान, और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका की आलोचना। 

- **प्रभाव**: समाजशास्त्र, इतिहास, और राजनीतिक सिद्धांत। 

### **20. नोआम चॉम्स्की (Noam Chomsky) – (1928 CE - वर्तमान, अमेरिका)** 

- **दर्शन**: भाषा विज्ञान, मीडिया अध्ययन, और राजनीति पर क्रांतिकारी विचार। 

- **प्रभाव**: संचार, राजनीति, और मनोविज्ञान में गहरा प्रभाव। 

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### **निष्कर्ष** 

इन प्रमुख दार्शनिकों ने **राजनीति, धर्म, नैतिकता, समाज, और विज्ञान** को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित किया। उनकी विचारधाराएँ **आधुनिक सभ्यता, विज्ञान, तकनीक, सामाजिक संरचना और शासन प्रणाली** को दिशा देती रही हैं। उनके योगदान आज भी विचार-विमर्श और शोध के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।


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