कन्फ्यूज
जिन्दगी के शुरुआती दौर में लगता है हम इस ब्रम्हांण्ड या ज्ञात विश्व के केन्द्र में हैं या उसके आस-पास हैं और यह समूची सृष्टि हमें निहार रही है । हमारी ये धारणा हमें बचपन और किशोरावस्था में मिलने वाले प्रेम से विकसित होती है । कुछ दशक बीतते-बीतते हमे आभास होने लगता है अपनी मिथ्या धारणा का और हम स्वीकार करने लगते हैं कि हम मात्र कुछ रसायनों के समुच्चय या भौतिक गुणों के संयोग मात्र हैं................इस अनन्त ब्रम्हाण्ड के दूर-दराज उपेक्षित कोनों मे पड़े कण मात्र । इस यथार्थ से अस्वीकार हमें प्रेमी बनाता है या आस्तिक, कन्फ्यूज हो रहा हूं।

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