शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

-मुकाम-


कपड़ो से ठुंसे वार्डरोब,
पक्कवानों से भरा रसोंईघर,
आलीशान बैठक खाना,
शानदार पूजा घर,
देखते ही,
आधुनिक गुफा मानवों
की मेरी तलाश को
मुकाम मिल जाता है।
किसी अस्त ब्यस्त मकान मे,
बिखरी किताबे,
उनके बीच छिपा चश्मा,
सूखकर लुढ़के हुए प्याले,
बताते है यहां,
इस ज्ञात ब्रम्हाण्ड मे,
चेतन होने की विशिष्टिता को महसूस करते,
खिड़की से झांकते बच्चों की,
खिलंदड़ी हंसी को ठहाकों से,
गुंजायमान करते,
छोटी-छोटी गुत्थियों को,
सुलझाने मे,
बड़ी-बड़ी खुशियां तलाशते,
किसी आधुनिक मनुष्य का डेरा है,
जहां
न क्षुद्रताओं का वृत्त है,
न धूर्तताओं का घेरा है।

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