शनिवार, 24 जनवरी 2026

लोलुपता का रसायन

घर, आंगन ही हममें से अधिकांश लोगों की सम्पूर्ण दुनिया होती है। गांव, कस्बा, शहर, चुनाव क्षेत्र, अपना धर्म, अपने राजनैतिक दल में 90 प्रतिशत लोग घूमते रहते हैं। अपना देश, पड़ोसी देश, दबंग देश और दादा देश के इर्दगिर्द 99 प्रतिशत लोग चुक जाते। जैसा मुझको इण्टरनेट के अंतरजाल पर दिखता है। बच जाता है नदी, पहाड़, जंगल, वायुमण्डल, मानवेतर जीवन तो, इस दुनिया को भी अपनी दुनिया में समेटने वाले लोग अल्पतम होते हैं। यदि मानवेतर जीवन और शेष जगत को हम मनुष्यों के बारे में अपनी बात कहनें का अवसर मिलता तो शायद एक ही पंक्ति में बात खत्म हो जाती कि यह प्रजाति आवश्यकता और लोलुपता के आत्महंता युद्ध में इस पूरे ग्रह के लिए खतरा बन चुकी है। आवश्यकता पूर्ति इसका जैविक और प्रकृतिक गुण था, जिसमें इसने विकास क्रम में अर्जित उपभोग और लोलुपता का रसायन मिला दिया है। उपभोग और लोलुपता के रसायन ने इस प्रजाति की आंखों पर एक पारदर्शी चश्मा पहना दिया है, जिसे उतार कर आवश्यकता का मौलिक रुप खोजने के लिए बड़ी-बड़ी राजसत्ताओं और उनकी फौजों, धार्मिक धन्धेबाजों, मीडिया हाउसों, औद्योगिक समूहों के हितों और उनके गठजोड़ को पार पाना सदैव दुष्कर रहा है। अब तो इण्टरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्लेटफार्म पर बड़े-बड़े शो रुम हैं, जिसमें अपने घर-आंगन की आवश्यकताओं से जूझते लोग अपनी प्रारंभिक रुचियों (धर्म, जाति, रंग, देश) के अनुसार घुसते हैं और एक खास चश्मा पहन कर निकलते हैं। यह चश्मा इतना प्रभावी और गाढ़ा होता है कि इसको पहचानना मुश्किल होता है और हटाना तो दुष्करतम। लोलुपता के इसी रसायन ने एक बिल्डर को दुनिया के दादा देश का मुखिया बनाया है, जो इस पूरे ग्रह को ही कालोनाइजर की तरह देखता है। देशनुमा प्लाटों पर अपना खंूटा गाड़ते मुखिया के पीछे वाह-वाह करता इन्टरनेट के बूते तैयार किया गया उसके देश का एक बड़ा जनसमूह। लेकिन हमारे आसपास भी यही हो रहा है। बड़़े खिलाड़ी पहाड़, जंगल, नदी, सार्वजनिक भूमि पर नजर लगाए हुए हैं और छोटे खिलाड़ी आर्थिक बदहाली झेल रहे किसान परिवारों पर। कभी कभी लगता है छुट्टा पशु, नीलगाय आदि इन खिलाड़ियों के ही प्रतिनिधि बनकर माहौल रच रहे हैं।

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