शनिवार, 24 जनवरी 2026
बाबा
सबसे अधिक वेइज्जती साइकिल और रेडियों का हुआ है।
कइसे बाबा,
लोग साईकिल से लोग बोरा ढोने लगे और रेडियों लेकर खेत के डांड़ पर घूमनें लगे।
बाबा, बीसवीं सदी के पहली दहाई के पूर्वाद्ध में पैदा हुए थे और अपना यह दुःख आठवें दशक के आखिरी दौर में अपने नाती से बता रहे थे। हालाकि घर में उपलव्ध होते हुए भी कभी न वो साईकिल चलाए और न ही रेडियों सुने। लेकिन बीसवीं सदी के इन अत्यन्त उपयोगी आविष्कारों के प्रति सम्मान का भाव उनके जीवन के आखिरी दौर तक बना रहा। उनके जीवन मूल्य का बड़ा हिस्सा हजारों वर्षो के इस प्रकृति पूजक समाज में हर जीवनोपयोगी चीज के लिए श्रद्धा प्रगट करने वाली भावनाओं से बना था।
दो-दो विश्वयुद्ध, गांधी, नेहरु, आजादी, विभाजन एटम बम जैसी घटनाओं की छाया भी उनके जीवन में नहीं थी, जबकि उनके बृहत्तर खानदान में दो-दो स्वतंत्रता संग्राम सैनानी थे। संकट मोचन में साप्ताहिक दर्शन और परम्पराओं के निर्वहन को ही अपनी उपलव्धि मानते थे। उनका जीवन अपने प्रतिष्ठित पिता की छाया में ही गुजर गया और उनसे अपने पिता की उदारता से उपजे संकटों के प्रति कभी कोई शिकायत नही सुनी।
"यह लकड़ी मेरे लिए होनी चाहिए थी", अपने युवा पुत्र की असमय मृत्यु के श्राद्ध कर्म हेतु सूखने के लिए फैलाई गयी लकड़ियों को देखकर बुदबुदाए थे, फिर मुझसे बोले अगर मैने बेईमानी की होती तो आज खानदान, गांव इसको मेरा कर्मफल बताता। वो अपने नाम पर दर्ज खानदान की अधिकांश भूमि के ईमानदार वितरण की बात कह रहे थे, जब जवार के कई मानिन्दों ने उनको सुविधाजनक बेईमानी की सलाह दिया था।
स्त्रियों, दलित और पिछड़े समाज में आ रहे बदलाव को आश्चर्यमिश्रित भाव से सुनते और उनकी पारम्परिक सोच अस्तब्यस्त हो जाती। मुसलमान उनके लिए सिर्फ अलग जाति थे, जैसे समाज की अन्य जातियां अपनी भिन्नताओं के साथ होती हैं। राम चरित मानस ही उनके जीवन के कलयुग की मार्गदर्शिका थी और घाघ की कहावतें उनके किसानी जीवन के साथ रची बसी थी।
एक महान शहर की परिधि पर पूरा जीवन गुजार देने वाले बाबा परम्पराओं के गुबार में इस कदर घिरे थे कि उन तक इस महादेश की चेतना को झकझोर देने वाले ज्योतिपुन्जों की किरण भी नहीं पहुंच सकी।
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