भारतीय उप महाद्वीप की मानव समूह की बसावटों मे खान-पान की भिन्नता पर गौर किया जाय तो उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो से शुरु होकर बिहार-बंगाल तक भोजन में चावल की प्रमुख भूमिका का क्षेत्र शुरु होता है और यहीं से स्त्री प्रभावी समाज के लक्षण भी दिखाई देने लगते है । इसी क्षेत्र के हिन्दी पट्टी मे बनारस के गंगा नदी के पश्चिमी भाग के देहातों में तालाबों के किनारे इस त्योहार के ढोल नब्बे के दशक के दूसरे अद्र्धाश्ंा मे बजते सुनाई पड़ते हैं, जब पश्चिमी बिहार के समीपवर्ती जिलों की बेटियां अपनी परम्पराओं साधिकार मनाने निकलतीं है और पुरुष सहयोगी की भूमिका मे उनके पीछे-पीछे चलते हैं । हम खुश हो सकते हैं कि इस त्योहार को मनाने के लिए स्त्री आंगन की दहलीज लांघती है और पुरुष सहयोगी भूमिका मे होता है । इस त्योहार को दलित भागीदारी कितनी है मुझे नही पता क्योंकि इसके बारे में जानने का प्रयास मैने नही किया, लेकिन इस त्योहार के कर्मकाण्ड मे स्त्री सशक्तीकरण देखने वाले लोगों के साथ मेरी असहमति है कि दलित और पिछड़े समाज की समाज की स्त्रियां अधिक स्वावलम्बी रही हैं और उनके लिए इस त्योहार मे सम्मिलित होना इसके बाजारु स्वभाव को इन्ज्वाय करना मात्र है। ढोल की थाप पर थिरकती स्त्री के आनन्द को महसूस कीजिए, आप एक समाजवादी परिवार द्वारा सोना-चांदी ओढ़कर परोसे जा रहे बाजार के कसैलेपन से मुक्त हो जाएगें ।
शनिवार, 28 नवंबर 2015
छठ
भारतीय उप महाद्वीप की मानव समूह की बसावटों मे खान-पान की भिन्नता पर गौर किया जाय तो उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो से शुरु होकर बिहार-बंगाल तक भोजन में चावल की प्रमुख भूमिका का क्षेत्र शुरु होता है और यहीं से स्त्री प्रभावी समाज के लक्षण भी दिखाई देने लगते है । इसी क्षेत्र के हिन्दी पट्टी मे बनारस के गंगा नदी के पश्चिमी भाग के देहातों में तालाबों के किनारे इस त्योहार के ढोल नब्बे के दशक के दूसरे अद्र्धाश्ंा मे बजते सुनाई पड़ते हैं, जब पश्चिमी बिहार के समीपवर्ती जिलों की बेटियां अपनी परम्पराओं साधिकार मनाने निकलतीं है और पुरुष सहयोगी की भूमिका मे उनके पीछे-पीछे चलते हैं । हम खुश हो सकते हैं कि इस त्योहार को मनाने के लिए स्त्री आंगन की दहलीज लांघती है और पुरुष सहयोगी भूमिका मे होता है । इस त्योहार को दलित भागीदारी कितनी है मुझे नही पता क्योंकि इसके बारे में जानने का प्रयास मैने नही किया, लेकिन इस त्योहार के कर्मकाण्ड मे स्त्री सशक्तीकरण देखने वाले लोगों के साथ मेरी असहमति है कि दलित और पिछड़े समाज की समाज की स्त्रियां अधिक स्वावलम्बी रही हैं और उनके लिए इस त्योहार मे सम्मिलित होना इसके बाजारु स्वभाव को इन्ज्वाय करना मात्र है। ढोल की थाप पर थिरकती स्त्री के आनन्द को महसूस कीजिए, आप एक समाजवादी परिवार द्वारा सोना-चांदी ओढ़कर परोसे जा रहे बाजार के कसैलेपन से मुक्त हो जाएगें ।
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