रविवार, 22 दिसंबर 2013

   गांव में इस समय सिवान की हरियाली में  किसान के प्रतिस्पर्धियों ( नीलगायों, छुट्टा जानवरों ) के पीछे दौड़ लगाते चचा को  , रात भर खेत में  गेंहू की सिंचाई करके लौटे भइया को दुआर पर कंबल ओढ़े चाय सुड़कते देख कर किसान दिवस की बधाई देने जा रहा था कि प्रधान जी को मनरेगा का काम शुरू होने की हांक लगाते सुनकर ठिठक गया । पता चला फिर उसी चकरोड पर मिटटी फेंकी जायेगी जिसकी   मिट्टी पिछली बारिश में बह गई थी । प्रधान जी को मनरेगा में काम देने की मजबूरी है लेकिन काम की उपयोगिता नही है। सरकार ने मनरेगा का बजट २ लाख करोड़ रखा  है , इस योजना ने ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी सम्मानजनक ढंग से बढ़ाई है लेकिन सरकार तो बस 100 दिन की मजदूरी देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है बाकि दिवसों में सरकार की दर पर मजदूरी किसान दे रहे है।  जरा सोचिये सरकार इस योजना का बहुलांश औचित्यहीन  कार्यो पर खर्च कर रही है। अगर मनरेगा में जरा सा संशोधन करके इसको कृषि उत्पादन से जोड़ दिया जाय तो इससे किसानों को और ग्रामीण मजदूरों दोनों को राहत मिल सकती है बस इतना करना होगा कि किसान को इस योजना के अंतर्गत मजदूर उपलब्ध कराये जाय और किसान मजदूरी का आधा अंश ग्राम पंचायत के खाते में डाल दें। जो लोग मनरेगा की जमीनी हकीकत जानते हैं उनको भली भांति पता है कि काम देने कि मजबूरी में ग्राम पंचायते एक कार्य को कई बार करा रही हैं जिसके फलस्वरूप इसका बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च हो रहा है दूसरी तरफ किसान बढ़ी हुई लागत के कारण आर्थिक दुस्वारियां झेल रहें है।  इसलिए इस योजना को अगर किसान से जोड़ दिया जाय तो किसान को भी कुछ राहत मिल जायेगी और इसका बहुत अच्छा प्रभाव  कृषि उत्पादन पर भी पड़ेगा  जिससे  सरकार का भी मजदूरी का कुछ अंश बचेगा।किसान दिवस की शुभकामना के साथ  नक्कारखाने में अपनी तूती अदम साहब को याद करके बंद कर रहा हू -
 वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है 

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का 
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले 
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है 

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी 
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

इस समय कि राजनैतिक आपाधापी में विक्टर ह्यूगो के लेस मिजरेबल का छोटा सा अंश उद्धृत कर रहा हू।  यह महान लेखक 1840 के आसपास फ़्रांस के राजनैतिक ऊथल पुथल कि कितनी सटीक ब्याख्या कर रहा है, और समय कि धूल ने आजतक इसकी  प्रासंगिकता की चमक को जरा भी धुंधला नहीं किया  है।          
------ईश्वर अपनी इक्छा घटनाओं से व्यक्त करता है, रहष्यमय भाषा में लिखा एक अश्पस्पट पाठ। लोग उसका तत्काल अनुवाद करने लग जाते हैं। गलत शासन, पूर्व भ्रांतियों से भरपूर बहुत थोड़े लोग दैवी भाषा समझ पाते हैं। सबसे दूरदर्शी, सबसे गहरे लोग, धीरे धीरे समझ पाते हैं और जबतक उनका पाठ तैयार हो जरूरत ख़त्म हो चुकी होती है।  बीसों अनुवाद चौराहे पर खड़े हैं। हर से एक पार्टी जन्मती है ---जो अपने को ही मठ समझती है, हर गुट समझता है कि वही एकमात्र प्रकाशवान है। --------

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम ।
पिछले वर्ष के अंत में इसी कविता को उद्धृत करते हुए मै काफी निराश था।  आज निराश नहीं हू लेकिन  बहुत से अम्बेडकरवादी मित्रों , मार्क्सवादी मित्रों की तरह मै भी आशंकित अवश्य हू कि विभिन्न  ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राजनैतिक लाइन स्पष्ट किये बिना " आप " कहां तक जा पायेगा। दरअसल दुनिया के जिस खित्ते में हम रहते है उसके आसपास एकाध को छोड़कर बाकी जगहो पर बर्बर सत्तातंत्र है उनको आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे दिल्ली की सुल्तान सहजता से एक आम आदमी की जीत को स्वीकार करके पद त्याग रही है, कैसे जनता एक आम आदमी को स्वीकार कर ले रही है जिसके पास न अथाह पूंजी है न लुटेरों का गिरोह।
       जिनको जनतंत्र में यकीन है उनको दिल्ली के परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और जनतंत्र को सैल्यूट करना चाहिए, लेकिन इस जनतंत्र पर सवार होकर दिल्ली की बादशाहत के लिए एक मध्युगीन योद्धा के काफिले की धमक भी सुनाई दे रही है,उसका क्या होगा ?
              इस सवाल को भी जनतंत्र के उसूलों से ही हल करना पड़ेगा।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गेंहू

  यह तो नही कहूंगा कि उस दौर में होश सम्भाला था, जब गेंहू " खास " हुआ करता   था, लेकिन  जब गेंहू   खास हुआ करता  था, उस दौर के लोगो  की गोंद  में पला और गेंहू के "आम " होने की कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ हू । मेरे इलाके के भूगोल में सिंचाई का पानी हमेशा से दुर्लभ रहा है , चाहे वो ढेंकुल या रहट का जमाना रहा हो या आज के ट्यूबवेल का  जमाना रहा  हो।  गेंहू को जौ के मुकाबले  पानी जादा  पसन्द है । एक-दो ट्यूबवेल जरुर सरकार ने लगवा दिए थे लेकिन ढेकुल,रहट ,दोन  आदि ही गेंहू पैदा करने के लिए सिंचाई का मुख्य श्रोत था ।  सिंचाई के अभाव में सूखती  गेंहू की  फसल  के मोह में कितनी बार लाठियां चली और रिश्ते बने बिगड़े।  जिनके पास सिंचाई का साधन हो गया उनकी ठाकुर सुहाती करने वालों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा इसी में बीतता था । 
  आजादी के बिहान से  गेंहू का प्रताप बढ़ना शुरू हुआ और धीरे - धीरे   जौ के दिन पूरे हुए। तब मेहमानों के आने पर बच्चों में खुशियाँ तैर जाती थी कि" आज गेंहू के आटे से बनी रोटी या पूड़ी मिलेगी "। सरकारी लोंगो की सिफारिश पर गेंहू उगाने का प्रयास प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही  शुरू हुआ।  किसानों के  किसी भी नई चीज के प्रति संदेह के सदियों पुराने रोग ने इस फसल के प्रचलित  होने में कुछ समय जरुर लिया लेकिन गेंहू से बनी  रोटी और  अन्य ब्यंजनों  ने शीघ्र ही सबको अपना मुरीद बना लिया। 
  गेंहू किसान की बहुत कठिन परीक्षा लेता रहा है । जब शहरी समाज आराम से रजाई में सोता है तो बिजली विभाग की मेहरबानी से  किसान गेंहू की प्यास बुझाने के लिए  दिसम्बर, जनवरी के जाड़े की ठिठुरती रातों में खेत के मेड़ पर खड़े रहते है कि कही पानी मेड़ तोड़कर कही और न निकल जाय, क्योंकि पानी तो अपने स्वभाव से लाचार होता है उसको क्या मतलब कि कोई उसकी अगवानी में खड़े खड़े ठिठुर रहा है, उसको जब जिधर मौका मिलेगा बह निकलेगा। जब ये फसल पक कर तैयार होती है तब चिलचिलाती धूप में उसकी कटाई और दंवाई का अनुभव जिनको नही है वो इस कार्य की कठिनाई को समझ ही नहीं सकता। पकी फसल से दाना निकालने की तकनीक के विकास ने इसके कठोर परिश्रम को कम कर दिया है नहीं तो लगभग पूरी गर्मी और बरसात की पहली फुहारों तक किसान भूसा और दाना में ही उलझे रहते थे। वस्तुतः गेंहू जेठ की दोपहरी में किसान के बदन पर चुहचुहाता पसीना है । गेंहू किसान की बहुत कठोर परीक्षा लेता है तब कही जाकर उसके ब्यंजनों की  खुशबू से हमारी रसोइ महकती है ।
  

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

१२ नवम्बर की शाम को प्रोफ़ेसर लालबहादुर वर्मा से  आदमी के बायोलॉजिकल मैन से कल्चरल मैन के रूप में विकसित होने की अवधारणा को सुना । आज सुबह  सोच रहा था कि कल्चरल मैन सम्भवतः  प्रकृत का बाई प्रोडक्ट है और ये बाई प्रोडक्ट इस स्थिित में आ रहा है की प्रकृत को अपना प्रोडक्ट बना ले । यह मनुष्य के लिए समग्रता में शुभ   होगा या अशुभ  होगा यह तो  भविष्य बतायेगा लेकिन  शुभ  की  कामना ।  

-चश्मा-

 लोरियों नें सपने पिरोना बन्द किया,
तो दादी ने डराना शुरू किया ,
चुड़ैलों से,प्रेतों से, विधर्मियों से........
रुआँसी माँ ,
मेरी शरारतों को ,
निम्नजातीय गुण होनें का,
उलाहना देने लगी ,
चाचियों ने ,
पड़ोसियों द्वारा पुरखों की जमीन,
हड़प लेने की कहानी सुनाई ,
दादा के पास स्वधर्म श्रेस्ठता का बखान था,
पिता के पास अन्य जातियों की बुराइयों का विश्वकोष,
चाचा से जाना एटम बम के बिना,
कितने कमजोर थे हम,
विद्यालय ने उपनाम से,
मेरी योग्यता का मूल्यांकन किया,
और इस तरह से बना,
दुनिया को देखने का मेरा चश्मा । 
मेरा प्यार अपने घर, जाति तथा धर्म  की,
चहारदीवारी में ही अट जाता है,
शेष के लिए बस अपनी जरूरत भर,
बट जाता है । 
कमजोर विजातीय को ,
अपनी श्रेस्ठता के डंक से तिलमिला देता हू,
और कभी किसी अकेले को ,
चलती ट्रेन में फेकने  का मजा लेता हू ।
लेकिन ……
ऐसा भी हो सकता था ,
दादी बताती,
कैसे सुनसान रास्ते पर दादा को,
रहजनों से एक विधर्मी ने बचाया था।
माँ बताती मेरे जन्मोपरांत,
पड़ोसियों ने महीनों तक,
अपनी गाय का दूध पिलाया था।
दादा बताते,
हम श्रेस्ठ हैं लेकिन सर्वश्रेस्ठ नहीं।
पिता के पास,
अन्य जातियों की योग्यता का ज्ञान होता,
और चाचा बताते कि एटम बम से जरूरी ,
बिजली का वो तार है,
जो वर्षो से खम्भे पर नही लगा है।
तब मेरे चश्मे का नंबर दूसरा होता ,
तब शायद मानवता के आंसुओ का ,
खारापन कुछ कम होता।
दरअसल बाग में,
फूल भी थे और कांटे भी ,
मगर मालियों ने,
मेरे जेहन को कांटो से,
ज्यादा पिरोया था। 

सोमवार, 25 नवंबर 2013

  कोरौत घाट और  पिसौर घाट पर बन रहे पुल तमाम राजनैतिक आग्रहों और दुराग्रहों के बीच दशकों से झूल रहें है । हमारे क्षेत्र से वरुणा नदी पार करके वाराणसी शहर से जौनपुर या लखनऊ   जाने  वाले रास्तों पर पहुचना या वाया शिवपुर कचहरी जाना सदैव दुष्कर रहा है ।  मामाजी स्व ० मारकंडे सिंह ( bhu छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ) ने  अस्सी के दशक में कई मीटिंगे करके इस  मुद्दे को ज्वलंत बनाने का प्रयास किया था । उनके तब के साथियों में से अब कुछ बड़े नेता हो गये होंगे, लेकिन पुल अभी भी विक्रम का बैताल ही बना हुआ है । जो सत्ता में नही रहता है उसको हमारे क्षेत्र के इस पुल की याद आ जाती है । मित्र अनिल सिंह और कुछ साथियों  ने भी पिछले वर्षों अख़बार के माध्यम से इन पुलों को पूरा करने के लिय़े जनजागरण का बहुत प्रयास किया, जनता तो जगी लेकिन ब्यवस्था अपने  हुकमरानो के नफे नुकसान का आंकलन करके सोती ही रही ।  इससे जुड़ी एक घटना साझा करना चाहता हू ।
 हमारे गांव के  कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय  अक्सर रात हो जाती थी ।  एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और  नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार  जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई ।  अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया  ।  बदन के कपड़े उतार  कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों  जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था  कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान  बचाने का संघर्ष था लेकिन  सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की  लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है ।   मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले   बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर   लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो  रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको  देखकर  घबड़ा गये तुरंत अपना शाल  और  साईकिल दिए घर जाने के लिए  ।
    ये दोनों घाट ऐसी कितनी ही ज्ञात अज्ञात  घटनाओं और दुर्घटनाओं  के साक्षी रहें हैं, लेकिन  इन घाटो पर बनने वाले  पुल किसी बड़े राजनैतिक नफे नुकसान से नही जुड़े है ।  इन पुलो के चालू हो जाने पर जौनपुर से इलाहाबाद का अधिकतर ट्रैफिक  कैंट स्टेशन पर जाम नही लगाएगा और काफी समय और  ईंधन भी  बचाएगा ।इन पुलों के बनने में जो थोड़ी  बहुत तेजी दिखाई दे रही है। वो वाराणसी महानगर की जरुरतो की वजह से है हमारे गांव गिरांव की जरूरतों  के कारण नहीं हैं । 

रविवार, 17 नवंबर 2013

अख़बार के छठे या ऐसे ही किसी पन्ने पर तीन या चार लाइनों में छोटी सी खबर छपी थी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी नही रहे ।  हालांकि रात में ही पता चल गया था लेकिन सुबह उनके बारे में कुछ विशेष जानने की अपेक्षा थी, अख़बार के माध्यम से । कैसे हुआ , क्या हुआ था , परिवार में और कौन कौन है लेकिन कुछ नही छपा था । मैंने उनको १०-१५ साल पहले जाना था जूठन के माध्यम से । उनकी मध्यवय में लिखी गई आत्मकथा, पुरे भंगी समाज का आख्यान है । अपने इर्द गिर्द के इस समाज को, इसकी सहनशीलता को , इसकी बहादुरी को और अपनी चेतना में बसे सवर्ण को  मैं वाल्मीकि जी के माध्यम से ही जान पाया ।इस आत्मकथा का शीर्षक स्व ० राजेन्द्र यादव जी ने ही वाल्मीकि जी को सुझाया था, लगता है हंस अपने समूह के साथ ही  प्रयाण करते है ।   

बुधवार, 1 मई 2013

- गिद्ध-


अर्द्ध निर्मित पलस्तर विहीन,
मकान के सामने,
लाल,नीली,पीली बत्तियो वाले,
कैमरा चमकाते गिद्धों को,
देखते ही,
टोला जुट जाता है ।
घर के भीतर से,
निकलती घुटी-घुटी चीख,
खेलते हुए,
धूल-धूसरित बच्चों को,
स्तब्ध कर देती है।
छिलंगी दार खटिया में पड़ा,
कथरी में लिपटा झुर्रीदार चेहरा,
चश्मा पोछतें हुए  नवागन्तुको  को,
पहचानने  की कोशिश करता है,
फिर सिरहाने से,
भूमि नीलामी की पर्ची दिखाकर,
बिलखने लगता है ।
गिद्ध ........पर्ची लेकर,
भीड़ में इस हादसे की ,
अगली संभावना निहारते है ।
जब वो फिर पंख फड फड़ाते हुए,
इस  महाश्मसान के,
आसमान में चक्कर लगायेंगे,
आपस में खूब चीखेंगे-चिल्लाएंगे ।
कल की संभावना से पुलकित,
बहुत उदास दिख रहें है, गिद्ध ।


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

छिम्मी

   सत्तर के दशक में हमारे गावं में बोनबिला प्रजाति की मटर किसानों ने बोना शुरू किया, इसके बाद में बोनबिला  से कम समय में तैयार होने वाली प्रजाति अर्किल प्रचलन में आयी  । तब से मटर की फली (छिम्मी ) बेचने की  खेती हमारे क्षेत्र के किसानो को नकदी रुपया देखने का बहुत बड़ा श्रोत रही है । हर साल जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंत तक आसपास के गावं के किसान भोर में लगभग 3  से 4 बजे सायकिल, सगड़ी या ट्रैक्टर ट्राली से मटर (जिसका उच्चारण मंटर प्रचलित है ) चन्दुआ सट्टी (बोलचाल की भाषा में चनुआ सट्टी प्रचलित है ) में बेचने के लिए ले जाते है । जाड़े की भोर में बोरा भरने और सिलने में उंगलिया ठन्ड के मारे काठ हो जाती है, लेकिन इन कठुयाई उंगलियों से  सायकिल या सगड़ी खीचना अगली चुनौती हुआ करती है । वाराणसी शहर के पूरब तरफ जी ० टी ० रोड और वरुणा नदी के बीच स्थित ग्रामीण क्षेत्र  सघन आबादी वाला छोटी काश्त के खेतिहरों और बुनकरों का इलाका है । चनुआ सट्टी से वापस लौटते किसानों के चेहरे पर अक्सर बाजार के उतार चढ़ाव का बयान रहता है । अस्सी के दशक के अंत में जी ० टी ० रोड पर स्थित राजा तालाब सब्जी मंडी का विकास हुआ, लेकिन मेरे क्षेत्र के गावों में चनुआ सट्टी ही लोकप्रिय रही, क्योकि इस मंडी में सुबह 8 बजे तक खरीद फरोख्त का सारा कारोबार सम्पन्न हो जाता है और किसान वापस अपने घर पहुच कर दोपहर से खेतीबारी का काम संभाल लेते है । बीच में कईबार इस मंडी को हटाये जाने की ख़बरें आती  रहती है, क्योकि शहरी बाबू वर्ग की आखों में यह मंडी खटकती रहती है, फिर भी इसका आजतक बनें रहना मेरे क्षेत्र के किसानों को काफी राहत देता है ।
      मटर की खेती के साथ ही नगदी फसलों की तरफ लोगों का रुझान हुआ और अस्सी के दशक से ही मिर्च, बैगन आदि सब्जियों की ब्यावसायिक खेती भी होनें लगी । इन फसलों से बस इतना होता है कि लोग नगदी देख लेते थे । हर साल नाते रिश्ते में पड़ने वाली शादियों के नेवता आदि की रस्म निपटा लेते थे और तीन चार साल की फसलों की कमायी जुटाकर बेटे-बेटी की शादी की रस्म निपटा लेते थे । अस्सी के दशक तक बच्चे प्रायः घर में ही पैदा होते थे और अंग्रेजी स्कूलों का चलन प्रारम्भिक दौर में था । गावं में खाने की थाली के नीचे टेवकन लगाने की परम्परा अपने आखिरी दौर में थी और कही-कही खड़ाऊ प्रयोग में दिख जाता था लेकिन पीढ़ा अभी भी प्रांसगिक बना हुआ था । टेवकन लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा होता है जो खाने की थाली के नीचे उस ओर लगाया जाता है जिधर ठोस खाद्य  पदार्थ जैसे चावल,रोटी,सूखी सब्जी,प्याज आदि रखे जाते है जिससे दाल नीचे की ओर रहे और उसको इक्षानुसार  ही मिलाया जा सके ।
  मटर में फली आने पर कौवा, मैना,गेदुर,मोर आदि पक्षियों से फली को बचाने के लिये खेत को लगातार दिन भर अगोरना पड़ता है,लेकिन इधर हाल के बरसों में इस खेती को नील गायो और संकर नस्ल के छुट्टा बछड़ो से बचाने के लिए जाड़ो की रातों में भी किसानों को लगातार रखवाली करनी पड़ती है । अब हमारे गावं में मटर जैसी फसलों की खेती कृषी श्रम परम्परा से जुडे लोग ही कर पाते है क्योकि यह खेती लगभग दो महीनों तक किसानो को अपने चौतरफा शत्रुओ का बंधक बना देती है । इसके बाद बाजार से मिलने वाली निराशा बचे-खुचे हौसले को तोड़ देती है लेकिन विकल्प का अभाव और समय का मरहम इन जख्मो को भरते हुए अगले सितम्बर अक्टूबर तक किसानो को उसी चक्रब्यूह में पहुंचा देता है और फिर शुरू हो जाता है कौवा, मैना,गेदुर,मोर, नील गायो,छुट्टा जर्सी बछड़ो  और चनुआ सट्टी का खेल ।
  मित्रों जाड़े में छिम्मी खाते समय उसकी मिठास में मेरे क्षेत्र के किसानों की मेहनत को भी याद कर लीजियेगा , जिससे यह मिठास थोड़ी नमकीन हो जाएगी ।



शुक्रवार, 22 मार्च 2013

-उदासी -


ड्राईंग रूम बहुत उदास था,
इसलिए नही कि ,
श्रीलंकाई तमिलों की क्षत -विक्षत लाशों ने,
क्रूरता कि पराकास्ठा दिखलाई थी।
इसलिए नही कि,
शर्मिला इरोम का अनशन,
अभी भी जारी रहने कि खबर आई थी ।
इसलिए नही कि,
सीरिया में फटते बमों ने,
छोटे -छोटे बच्चो की नीद उड़ाई थी ।
इसलिए नही कि,
एक गरीब रिश्तेदार का कैंसर,
लाइलाज होने की खबर आई थी ।
बस इसलिए कि,
नायक और खलनायक के बीच झूलता,
हमारी लम्पट संस्कृति का प्रतिनिधि,
बेचारा बन गया था ।
बस इसलिए कि,
वो कैसे उस जेल में जियेगा,
जो उसके लिए,
केवल ड्रामा  का हिस्सा होता ।
बस इसलिए कि,
वो भोलेपन में स्क्रीन की दुनिया से बाहर,
वास्तविक दुनिया के खलनायको में चला गया था ।
बस इसलिए कि,
लाखों वसूल कर सलाह देने वाले वकीलों ने भी,
मुफ्त में बताया था कि वो बच नही सकता ।





सोमवार, 18 मार्च 2013

रैबीज

शीला की जवानी ,
और ,
मुन्नी की बदनामी से ,
पैदा रैबीज ने ,
गावों से महानगरों तक ,
पागल कुत्तों की फौज ,
खड़ी कर दी है ,
लेकिन ,
संसद रैबीज को नही ,
कुत्तों को खोज रही है .

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

कैप्टेन लक्ष्मी सहगल


वर्मा के जंगलो में,
मलेरिया बुखार से,
सफेद हो गये,
पपडीदार  होठों,
और,
बारुद से पथराये सपनों ने,
जिन्दगी भर,
युद्धरत रहने का संकल्प दिया होगा ।
लेकिन ..................
इस बिकाऊ वक्त में ,
जब भडुए और ढिढोरची ही,
नायकत्व के प्रतिमान हों।
तुम्हारे लिए नया,
विशेसण  गढ़ने में ,
लगने वाले वक्त तक,
स्थगित रहें ...................
विसर्जन समारोह,
लम्बित रहें ..........
श्रधान्जली सभाये ।
(कैप्टेन लक्ष्मी सहगल  के निधन पर उनकी स्मृति में ) 

बुधवार, 16 जनवरी 2013

सौन्दर्यबोध


चेचकरू चेहरे , तिरछी निगाहों,
और आबनूसी रंग के साथ,
कुदरत ने,
लड़खड़ाते कदमों की नेमत बख्शी,
जो मेरे प्रथम रुदन से ही,
स्वजनों की हिकारत का,
उपहार देती रही ।
इस नेमत ने,
मेरे उस स्नेह कवच को,
अक्सर तार तार किया,
जो हर सजीव को,
गर्भ से बाहर,
अनायास मिलती है ।
सौन्दर्यबोध के,
जिस गुण ने,
हमारी चेतना को,
शेष से विशेष बनाया,
उसी के वमन में,
आकंठ डूबा रहा,
मै जीवनभर ।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...