शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

-किस्त-


दरकते ग्लेशियरों का शोर,
सुलगते जंगलों का धुआं,
हिलती जमीन के सातवें मालें पर,
दम घोंटता वातानुकूलित ड्राइंग रुम,
बेचैनी में बदलते चैनलों पर,
चिर युवा मादाओ की थिरकन,
और,
दवाइयों का गुच्छा निगलते-निगलते,
याद आया,
सुदूर देहात का कोई सहोदर,
जिसके साथ ठिठुरते पाले में,
साझा रजाई में,
ढिबरी की रोशनी में,
रटे आधुनिक ज्ञान केे मंत्रों से,
खुले थे परजीविता के द्वार।
लाल-हरी होती बत्तियों,
दौड़ते-ठिठकते चैराहों के बीच,
फुटपाथ पर बेहाल परिचित सा चेहरा,
आभासी नही वास्तविक दुनिया का,
कोई साझा मित्र था,
जिसे समान्तर निगाहों से निहारते,
बदलते रहे गियर,
क्योंकि इस थरथराती जमीन पर,
जिन्दगी बस क्रेडिट कार्ड है,
और सांसे ...........................,
इ0एम0आई0 की अगली किस्त ।

कन्फ्यूज

जिन्दगी के शुरुआती दौर में लगता है हम इस ब्रम्हांण्ड या ज्ञात विश्व के केन्द्र में हैं या उसके आस-पास हैं और यह समूची सृष्टि हमें निहार रही है । हमारी ये धारणा हमें बचपन और किशोरावस्था में मिलने वाले प्रेम से विकसित होती है । कुछ दशक बीतते-बीतते हमे आभास होने लगता है अपनी मिथ्या धारणा का और हम स्वीकार करने लगते हैं कि हम मात्र कुछ रसायनों के समुच्चय या भौतिक गुणों के संयोग मात्र हैं................इस अनन्त ब्रम्हाण्ड के दूर-दराज उपेक्षित कोनों मे पड़े कण मात्र । इस यथार्थ से अस्वीकार हमें प्रेमी बनाता है या आस्तिक, कन्फ्यूज हो रहा हूं।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

च ौथी स्टेज

 
डाक्टर की फुसफुसाहट
कमरे से बाहर तैर गयी,
च ौथी स्टेज है यह सुनते ही,
दुनिया पराई नजर आयी।
कर्ज कितना रह गया है,
बेटे की पढ़ाई का,
बेटी की शादी का,
बीमा जमा है या नही,
सोचते हुए यह भी लगा,
चलो यार बहुत जी लिए।
तभी दौड़ने लगा बचपन,
दादा की गोदी में,
कबड्डी मे, छुपम-छुपाई में,
अरे इतनी जल्दी सबकुछ खत्म।
अभी तो दो इन्क्रीमेन्ट और लगता,
प्रमोशन की सम्भावना दिख रही थी,
बेटे को भी आफर था अच्छी कम्पनी का,
शादी के लिए मालदार पार्टी मिली थी,
सबकुछ इतना ठीकठाक चल रहा था
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
बचपन का मित्र,
कितना जल्दी चला गया,
उसको तो कोई चेतावनी भी नही मिली,
ऐसे ही नेताओं,ठेकेदारों, पुलिस से लड़ते,
जाड़े की एक सुबह,
गन्ने के खेत के किनारे
छलनी पड़ा था,
और उसी रात उसने,
सरकारी कोटेदार के यहां बोटी तोड़ी थी ।
केंचुए की तरह जीते,
जोंक की तरह खून पीते,
लोमड़ी की तरह सम्भावना सूंघते,
वक्त कब गुजर गया,
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
कितनी बार बचा था,
ट्रªेन हादसे मे दूसरी बोगी में था,
बम फटने के पहले बाजार से निकल चुका था,
कितनी जाचों में बाल-बाल बचा था,
किसी जूलूस मे नही,
किसी नारे में नही,
चर्चित मंदिर में नियमित चढ़ावा,
कितना नियमित और पवित्र जीवन,
लेकिन अचानक च ौथी स्टेज।
पाश कालोनी के किसी बंगले में,
किसी शाम बत्तियां बुझी होंगी,
उदास बैठे होगें ड्राइवर,नौकर,
मृत्यु के कर्मकाण्ड,
कुछ लोग निभाएगें,
देर रात वाली ट्रेन से,
वापस लौट जाएगें,
जैसे उसने निभायी थी,
अनचाही औपचारिकता,
उसी तरह।

छठ


भारतीय उप महाद्वीप की मानव समूह की बसावटों मे खान-पान की भिन्नता पर गौर किया जाय तो उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो से शुरु होकर बिहार-बंगाल तक भोजन में चावल की प्रमुख भूमिका का क्षेत्र शुरु होता है और यहीं से स्त्री प्रभावी समाज के लक्षण भी दिखाई देने लगते है । इसी क्षेत्र के हिन्दी पट्टी मे बनारस के गंगा नदी के पश्चिमी भाग के देहातों में तालाबों के किनारे इस त्योहार के ढोल नब्बे के दशक के दूसरे अद्र्धाश्ंा मे बजते सुनाई पड़ते हैं, जब पश्चिमी बिहार के समीपवर्ती जिलों की बेटियां अपनी परम्पराओं साधिकार मनाने निकलतीं है और पुरुष सहयोगी की भूमिका मे उनके पीछे-पीछे चलते हैं । हम खुश हो सकते हैं कि इस त्योहार को मनाने के लिए स्त्री आंगन की दहलीज लांघती है और पुरुष सहयोगी भूमिका मे होता है । इस त्योहार को दलित भागीदारी कितनी है मुझे नही पता क्योंकि इसके बारे में जानने का प्रयास मैने नही किया, लेकिन इस त्योहार के कर्मकाण्ड मे स्त्री सशक्तीकरण देखने वाले लोगों के साथ मेरी असहमति है कि दलित और पिछड़े समाज की समाज की स्त्रियां अधिक स्वावलम्बी रही हैं और उनके लिए इस त्योहार मे सम्मिलित होना इसके बाजारु स्वभाव को इन्ज्वाय करना मात्र है। ढोल की थाप पर थिरकती स्त्री के आनन्द को महसूस कीजिए, आप एक समाजवादी परिवार द्वारा सोना-चांदी ओढ़कर परोसे जा रहे बाजार के कसैलेपन से मुक्त हो जाएगें ।

-श्रद्धांजलि-


हाईस्कूल मे पढ़ने के लिए जाते समय कस्बे के साप्ताहिक बाजार के लिए छोड़े गए मैदान को पार करना पड़ता था। कस्बे में दो साप्ताहिक बाजार लगते थे, जिनके लिए दो अलग-अलग मैदान थे और वे बाजार के दिन के अलावा खाली रहते थे । एक मैदान को मंगल की बाजार कहा जाता था और दूसरे मैदान को शुक्र का बाजार कहा जाता था । हम विद्यार्थियों का झुण्ड मंगल की बाजार को धूल उड़ाते हुए पार करके एक गली में घुसता था । गली एक मिर्जा साहब के मकान को पार करके समकोंण पर मुड़ती थी, मिर्जा साहब कस्बे के एक अन्य इण्टर कालेज के वाइस प्रिन्सीपल थे और उस समय के सहपाठियों से मिली जानकारियों के अनुसार उनका परिवार कस्बे का पढ़ा लिखा परिवार था। बिना बरामदे वाले पक्के मकान के मुख्य दरवाजे पर लटका पर्दा मकान के लोगों को बाहरी दुनिया से एकान्त प्रदान करता था । उस मकान के ठीक सामने वाले रास्ते के उस पार की दीवार पर गेरु से एक नारा लिखा होता था ‘ हम हैं हिन्दू साठ करोड़, ताला देगें तोड़ मरोड़‘। यह नारा उस मकान के आंगन से निकलने वालो को बाहर की तल्ख हो रही दुनिया का एहसास कराता होगा और लगातार घूरता रहता होगा, अब ये महसूस करता हूं।
अस्सी का दशक था, हम प्रतिदिन स्कूल जाते हुए इस नारे को पढ़ते और कभी कभी उसका समवेत उच्चारण करते, बिना ये महसूस किए कि ये समवेत स्वर जो मात्र खिलवाड़ होता था, उस मकान के भीतर रहने वाले परिवार जनों को कितना खौफजदा करता होगा । लेकिन हमारे लिए ये मात्र खेल होता था । दुनियां के बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समाज के रिश्तों को केर-बेर के रिश्तो मे बदलने वाले शिल्पकारों की बढ़ती संख्या मे अशोक सिंघल जी का जाना एक जैविक क्षति है । मैं यही कामना करता हूं कि हिन्दू विश्वासों के आधार पर उनका अगला जन्म मानव योनि कें किसी अल्पसंख्यक समुदाय में हो ।

-मच्छर-


बहुत सी चिन्ताए हैं, 
जो जागती रातों मे,
मच्छरों से जादा भनभनाती हैं।
मसलन..........
बकरी बच्चा कब देगी,
बोया आलू उगेगा कि नही,
खाद असली है कि नकली,
लंगड़ी गाय अब लगेगी कि नही,
बिजली फिर कब आएगी,
नील गाय से चैती बचेगी कि नही,
प्रधान मंत्री जी देश कब आएगें,
मिट्टी का तेल कब बटेंगा,
छोटका फिर दारु पीकर पिटेगा,
आत्महत्या पर कितना मिलता होगा (मुआवजा),
बिजली वाले छापा तो नही मारेगें,
ठेकेदरवा कब्भौं फंसेगा कि नही,
बड़की माई की तेरही में कितने खाएगें,
छोटकी के तिलक में कितने जने जाएगें,
इलेक्शन फिर कब आएगें,
अबकी गेंहू बोएं कि बारुद।

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

-खुशी-


  अलसाई दुपहरिया में कचहरी की भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो गयी थी। खेल-मदारी वाले, दांत उखाड़ने वाले, खटमल-चूहा मारने वाले, किस्मत बांचने वाले भी हट बढ़ गए थे । चैकी पर लाई-चना-गुड़ आते ही लोग चबाना शुरु किए । मनसायन के लिए रोज की तरह एक रिटायर दीवान और दो-तीन अभ्यस्त मुकदमेबाज काम नही रहने पर भी दुपहरिया काट रहे थे। तभी एक लौंडा वकील मुस्कराते हुए बोला.....दीवान जी कुछ सुनाइये, आपके मुंह से बड़ा अच्छा लगता है। चैकी पर बैठे मुहर्रिर और मुवक्किलों ने भी दीवान को उकसाया। ठोंगा की तरफ हांथ बढ़ाते हुए दीवान जी मुस्कराए....हंसमुख स्वभाव के दीवान अपने सिपाही जीवन के किस्से इतने मनोरंजक ढंग सुनाते कि सुनने वालों का अच्छा-खासा टाइमपास हो जाता था, दीवान के लिए वर्दी पहन कर छोटी-मोटी छिनैती, बदजुबानी कभी अपराध नही लगा, उनके लिए यह सदियों की सबल-निर्बल के आपसी व्यवहार की परम्परा का हिस्सा मात्र था, जिसके वे आस्थावान वाहक थे ,उनके चरित्र का यही इकहरापन उनकी लोकप्रियता का कारण था ।
      दीवान शुरु हो गए......पंन्द्रह-बीस साल पहले की बात है, मंदिर-मस्जिद का बड़ा टेंशन चल रहा था । जल्दी छुट्टी मिलती नही थी, थाने से  । तनखाह, उपर झापर से जो कुछ बीने बटोरे थे, एक दिन पहले ही पड़ोसी गांव के एक परिचित सिपाही से  घर भेजवा दिए थे, तबतक  अगले दिन बाऊ के बीमार होने के बहाने पर छुट्टी मिल गयी । भइया तुरन्ते बस पकड़े तिजहरियां तक कैण्ट, दो घण्टा मे सिपाह फिर आगे की जीप पकड़ कर कस्बे तक पहुंचे तो कौनांे साधन नही दिखाई दिया। पैदले चल दिए कि घंटा भर मे तो पहुंचे जाएगें । बच्चों के लिए मिठाई लेने के लिए जेब मे हांथ डाले तो मुश्किल से दस-बारह रुपिया ही था। बजार मे वर्दी के जोर से मिठाई लेने मे कुछ संकोच लग रहा था । पैदल आगे बढ़े बाजार पीछे छूट चुका था, सड़क पर बनी पुलिया पर बैठकर सोचने लगे कि का करे  ।
   अंधियार होने लगा था, तब्बे एक ऊंट पर लकड़ी लादे ऊंटहारा चला आ रहा था। दिमाग काम कर गया । पुलिया से थोड़ी दूर था, तभी मैने ललकारा, कहां आ रहे हो बे । ऊंटहारा चिहुंका गांव जा रहे हैं साहेब, वो वर्दी देखकर डर गया अउर मै समझ गया कि काम बन गया । साले..........एक तो 10 मन का ऊंट और उसपर समुच्चा पेंड़ लादकर मचक-मचक कर चले आ रहे हो, देखते नही पुलिया कमजोर है । दूसरे रास्ते से जाओ । ऊंटहरवा समझ गया कि वो परेशानी मे पड़ जाएगा, पुलिया के अलावा दूर-दूर तक उस पार जाने का रास्ता नही था । पच्चीसे रुपया था उसके जेब मे और उस जमाने मे इहे बहुत था बाल बच्चों की  मिठाई के लिए ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

-बीज गणित-

पच्चीस सालोें की,
लम्बी मेज के उसपार,
हिचकिचाता खड़ा था।
सीधे चलने की जिद मे,
वो अब भी अड़ा था ।
उसके माथे पर झुर्रियंों की मुस्कान थी,
अपने मुखौटे पर मेन्स पार्लर की दुकान थी।
कालेज में हमने साथ साथ पढ़ा था,
पर जिन्दगी के बीजगणित ने,
अलग-अलग गढ़ा था ।
इन्कमटैक्स मेरे लिए बवालेजान था,
उस पर मुफलिसी का पेंशन ही एहसान था।
दुनियादारी की समझ से,
मेरा पेट निकल आया था ।
सीधे चलने की जिद मे,
वो हल्का सा झुक आया था ।

-पिन्टुआ-


पिन्टुआ तो बस भौकाल बनाने के लिए चुनाव लड़ रहा था, उसको जीविको पार्जन के लिए खुद काम करने की जरुरत नही थी । दादा ने परदेश मे मेहनत से धंधा चमकाया और अपने बाल बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, बाप ने सरकारी नौकरी मे अथाह सम्पदा कूटी, एक चचा ने चिट-फंड और चार सौ बीसी से काफी माल बनाया था। अब पिन्टुआ को उस सम्पदा से जवार मे प्रतिष्ठा खरीदनी थी, गांव मे तो डंका बज ही रहा था । केतना मिनहत करत बा बचवा पिन्टुआ के घर की बुर्जुग महिलाएं तरस खाती, उनको पिन्टुआ कभी काम करते नही दिखा था, अब खलिहरों और लम्पटों की भीड़-भाड़ मे चैबीसों घण्टे की व्यस्तता से उनका दुलार उमड़ पड़ता है, पिन्टुआ पर । वो मना रहीं थीं, जल्दी वोट पड़ जात दिन रात के चाय-पान, आवा-जाही से मुक्ति मिलत । उनको लगता इतनी भाग दौड़, इतनी सिफारिस, इतनी मरनी- करनी,शादी-बियाह का नेवता करने के बाद पिन्टुआ को चुनाव जीतना ही चाहिए । चुनाव जीतकर पिन्टुआ का करेगा, उनको पता नही था, लेकिन अगर कोई टोला महल्ला मे पिन्टुआ की जीत पर शंका जताता तो वो उसका मुंह नोचने पर उतारु हो जातीं।
   लेकिन........अफसोस पिन्टुआ हार गया, महीनों सियापा रहा एतना सियापा जेतना छोटकी बिटियवा के ससुराल मे जला कर मार डालने पर नहीं हुआ था । असल मे पट्टीदरवा सब खेल करके दक्खिन टोला का ओट बिगाड़ दिए । उ सब पिन्टुआ के भौकाल से दुखी  थे, इसका पता पिन्टुआ को चुनाव बाद चला ।

-पंचायत चुनाव-

शहराते देहात की दीवारों पर उगे पोस्टर दशहरा, दीवाली की तरह चुनावी त्योहार के आने की खबर दे रहे हैं । जी हां पंचायत के चुनाव आ गए हैं उत्तम प्रदेश में । गांवों की दीवाल  करबद्ध सुर्दशन युवकों और दुल्हनों की तस्वीरों की दीवाली मना रही है। पोस्टर देखकर चचा चिंहुकते है ‘‘अरे फलनवो भी खड़ा हो गयल, बाह ‘‘।
बड़ी-बड़ी गाडि़यों मे गरदन मे सोने की सीकड़ लटकाए, धूपी चश्मा पहने उम्मीदवार और उनके पीछे लटकन बने गांवो के खलिहर किशोर, बेरोजगार युवा निचाट दुपहरिया मे एकाएक बंसखट पर बैठे किसी अधेड़ के दरवाजे पर कूद पड़ते हैं, पालागी चचा, तोहार आर्शिवाद चांही । अरे बचवा इधर सब तोहरे इलाका हौ, चिन्ता क कौनो बात नाही हौ । अधेड़ चचा भी शातिर है अलसायी दुपहरिया मे उनको किसी तरह टरकाना चाहता है, नेताजी और उनके लटकन इधर-उधर देख रहे हैं दुआर से कोई और रास्ता फूटता हो तो आगे हांथ-गोड़ जोड़ा जाय । तबतक कारखास चचा को नेता जी के बारे मे बता देता है, किस गांव के है, समाज मे कितना काम करते है, कौन-कौन बिरादरी का वोट पक्का है और घाघ चचा भी आश्वस्त करते हैं कि उनको चिन्ता करने की जरुरत  नही है, इधर के मुहल्ले का वोट एक मुश्त नेताजी को ही जा रहा है। चचा चाह रहे हैं तबतक घर मे से आवाज आती है, बिजली आ गइल बा..........जा जल्दी से ट्यूबवेल चलवा....वा, चचा का धान झुरा रहा है  । चचा गमछा कंधे पर रखते खड़े होते है और नेता जी समझ जाते है कि किसी और दरवाजे की तरफ बढ़ा जाय । क्योंकि अब छेक कर बतियाने पर चचवा खेती-किसानी- बिजली-पानी की बात बतियाने लगेगा, जिसका उसके पास कोई जबाब नही है। 

- गोश्त -


गोश्त दिखा उनको,
सपनों मे, कल्पनाओं मे, तस्वीरों में,
देवता ने उंगली दिखाई,
शिकार की तरफ,
वो टूट पड़े,
इंसानी जिस्म पर,
वो शाकाहारी थे,
वो मांसाहारी थे,
नहीं, 
वो सिर्फ आदमखोर थे,
जिनके देवता की प्यास,
अतृप्त है अबतक, 
इंसानी खून से।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...