-खुशी-


  अलसाई दुपहरिया में कचहरी की भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो गयी थी। खेल-मदारी वाले, दांत उखाड़ने वाले, खटमल-चूहा मारने वाले, किस्मत बांचने वाले भी हट बढ़ गए थे । चैकी पर लाई-चना-गुड़ आते ही लोग चबाना शुरु किए । मनसायन के लिए रोज की तरह एक रिटायर दीवान और दो-तीन अभ्यस्त मुकदमेबाज काम नही रहने पर भी दुपहरिया काट रहे थे। तभी एक लौंडा वकील मुस्कराते हुए बोला.....दीवान जी कुछ सुनाइये, आपके मुंह से बड़ा अच्छा लगता है। चैकी पर बैठे मुहर्रिर और मुवक्किलों ने भी दीवान को उकसाया। ठोंगा की तरफ हांथ बढ़ाते हुए दीवान जी मुस्कराए....हंसमुख स्वभाव के दीवान अपने सिपाही जीवन के किस्से इतने मनोरंजक ढंग सुनाते कि सुनने वालों का अच्छा-खासा टाइमपास हो जाता था, दीवान के लिए वर्दी पहन कर छोटी-मोटी छिनैती, बदजुबानी कभी अपराध नही लगा, उनके लिए यह सदियों की सबल-निर्बल के आपसी व्यवहार की परम्परा का हिस्सा मात्र था, जिसके वे आस्थावान वाहक थे ,उनके चरित्र का यही इकहरापन उनकी लोकप्रियता का कारण था ।
      दीवान शुरु हो गए......पंन्द्रह-बीस साल पहले की बात है, मंदिर-मस्जिद का बड़ा टेंशन चल रहा था । जल्दी छुट्टी मिलती नही थी, थाने से  । तनखाह, उपर झापर से जो कुछ बीने बटोरे थे, एक दिन पहले ही पड़ोसी गांव के एक परिचित सिपाही से  घर भेजवा दिए थे, तबतक  अगले दिन बाऊ के बीमार होने के बहाने पर छुट्टी मिल गयी । भइया तुरन्ते बस पकड़े तिजहरियां तक कैण्ट, दो घण्टा मे सिपाह फिर आगे की जीप पकड़ कर कस्बे तक पहुंचे तो कौनांे साधन नही दिखाई दिया। पैदले चल दिए कि घंटा भर मे तो पहुंचे जाएगें । बच्चों के लिए मिठाई लेने के लिए जेब मे हांथ डाले तो मुश्किल से दस-बारह रुपिया ही था। बजार मे वर्दी के जोर से मिठाई लेने मे कुछ संकोच लग रहा था । पैदल आगे बढ़े बाजार पीछे छूट चुका था, सड़क पर बनी पुलिया पर बैठकर सोचने लगे कि का करे  ।
   अंधियार होने लगा था, तब्बे एक ऊंट पर लकड़ी लादे ऊंटहारा चला आ रहा था। दिमाग काम कर गया । पुलिया से थोड़ी दूर था, तभी मैने ललकारा, कहां आ रहे हो बे । ऊंटहारा चिहुंका गांव जा रहे हैं साहेब, वो वर्दी देखकर डर गया अउर मै समझ गया कि काम बन गया । साले..........एक तो 10 मन का ऊंट और उसपर समुच्चा पेंड़ लादकर मचक-मचक कर चले आ रहे हो, देखते नही पुलिया कमजोर है । दूसरे रास्ते से जाओ । ऊंटहरवा समझ गया कि वो परेशानी मे पड़ जाएगा, पुलिया के अलावा दूर-दूर तक उस पार जाने का रास्ता नही था । पच्चीसे रुपया था उसके जेब मे और उस जमाने मे इहे बहुत था बाल बच्चों की  मिठाई के लिए ।

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