-पिन्टुआ-


पिन्टुआ तो बस भौकाल बनाने के लिए चुनाव लड़ रहा था, उसको जीविको पार्जन के लिए खुद काम करने की जरुरत नही थी । दादा ने परदेश मे मेहनत से धंधा चमकाया और अपने बाल बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, बाप ने सरकारी नौकरी मे अथाह सम्पदा कूटी, एक चचा ने चिट-फंड और चार सौ बीसी से काफी माल बनाया था। अब पिन्टुआ को उस सम्पदा से जवार मे प्रतिष्ठा खरीदनी थी, गांव मे तो डंका बज ही रहा था । केतना मिनहत करत बा बचवा पिन्टुआ के घर की बुर्जुग महिलाएं तरस खाती, उनको पिन्टुआ कभी काम करते नही दिखा था, अब खलिहरों और लम्पटों की भीड़-भाड़ मे चैबीसों घण्टे की व्यस्तता से उनका दुलार उमड़ पड़ता है, पिन्टुआ पर । वो मना रहीं थीं, जल्दी वोट पड़ जात दिन रात के चाय-पान, आवा-जाही से मुक्ति मिलत । उनको लगता इतनी भाग दौड़, इतनी सिफारिस, इतनी मरनी- करनी,शादी-बियाह का नेवता करने के बाद पिन्टुआ को चुनाव जीतना ही चाहिए । चुनाव जीतकर पिन्टुआ का करेगा, उनको पता नही था, लेकिन अगर कोई टोला महल्ला मे पिन्टुआ की जीत पर शंका जताता तो वो उसका मुंह नोचने पर उतारु हो जातीं।
   लेकिन........अफसोस पिन्टुआ हार गया, महीनों सियापा रहा एतना सियापा जेतना छोटकी बिटियवा के ससुराल मे जला कर मार डालने पर नहीं हुआ था । असल मे पट्टीदरवा सब खेल करके दक्खिन टोला का ओट बिगाड़ दिए । उ सब पिन्टुआ के भौकाल से दुखी  थे, इसका पता पिन्टुआ को चुनाव बाद चला ।

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