मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

-बीज गणित-

पच्चीस सालोें की,
लम्बी मेज के उसपार,
हिचकिचाता खड़ा था।
सीधे चलने की जिद मे,
वो अब भी अड़ा था ।
उसके माथे पर झुर्रियंों की मुस्कान थी,
अपने मुखौटे पर मेन्स पार्लर की दुकान थी।
कालेज में हमने साथ साथ पढ़ा था,
पर जिन्दगी के बीजगणित ने,
अलग-अलग गढ़ा था ।
इन्कमटैक्स मेरे लिए बवालेजान था,
उस पर मुफलिसी का पेंशन ही एहसान था।
दुनियादारी की समझ से,
मेरा पेट निकल आया था ।
सीधे चलने की जिद मे,
वो हल्का सा झुक आया था ।

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