-पंचायत चुनाव-
शहराते देहात की दीवारों पर उगे पोस्टर दशहरा, दीवाली की तरह चुनावी त्योहार के आने की खबर दे रहे हैं । जी हां पंचायत के चुनाव आ गए हैं उत्तम प्रदेश में । गांवों की दीवाल करबद्ध सुर्दशन युवकों और दुल्हनों की तस्वीरों की दीवाली मना रही है। पोस्टर देखकर चचा चिंहुकते है ‘‘अरे फलनवो भी खड़ा हो गयल, बाह ‘‘।
बड़ी-बड़ी गाडि़यों मे गरदन मे सोने की सीकड़ लटकाए, धूपी चश्मा पहने उम्मीदवार और उनके पीछे लटकन बने गांवो के खलिहर किशोर, बेरोजगार युवा निचाट दुपहरिया मे एकाएक बंसखट पर बैठे किसी अधेड़ के दरवाजे पर कूद पड़ते हैं, पालागी चचा, तोहार आर्शिवाद चांही । अरे बचवा इधर सब तोहरे इलाका हौ, चिन्ता क कौनो बात नाही हौ । अधेड़ चचा भी शातिर है अलसायी दुपहरिया मे उनको किसी तरह टरकाना चाहता है, नेताजी और उनके लटकन इधर-उधर देख रहे हैं दुआर से कोई और रास्ता फूटता हो तो आगे हांथ-गोड़ जोड़ा जाय । तबतक कारखास चचा को नेता जी के बारे मे बता देता है, किस गांव के है, समाज मे कितना काम करते है, कौन-कौन बिरादरी का वोट पक्का है और घाघ चचा भी आश्वस्त करते हैं कि उनको चिन्ता करने की जरुरत नही है, इधर के मुहल्ले का वोट एक मुश्त नेताजी को ही जा रहा है। चचा चाह रहे हैं तबतक घर मे से आवाज आती है, बिजली आ गइल बा..........जा जल्दी से ट्यूबवेल चलवा....वा, चचा का धान झुरा रहा है । चचा गमछा कंधे पर रखते खड़े होते है और नेता जी समझ जाते है कि किसी और दरवाजे की तरफ बढ़ा जाय । क्योंकि अब छेक कर बतियाने पर चचवा खेती-किसानी- बिजली-पानी की बात बतियाने लगेगा, जिसका उसके पास कोई जबाब नही है।
बड़ी-बड़ी गाडि़यों मे गरदन मे सोने की सीकड़ लटकाए, धूपी चश्मा पहने उम्मीदवार और उनके पीछे लटकन बने गांवो के खलिहर किशोर, बेरोजगार युवा निचाट दुपहरिया मे एकाएक बंसखट पर बैठे किसी अधेड़ के दरवाजे पर कूद पड़ते हैं, पालागी चचा, तोहार आर्शिवाद चांही । अरे बचवा इधर सब तोहरे इलाका हौ, चिन्ता क कौनो बात नाही हौ । अधेड़ चचा भी शातिर है अलसायी दुपहरिया मे उनको किसी तरह टरकाना चाहता है, नेताजी और उनके लटकन इधर-उधर देख रहे हैं दुआर से कोई और रास्ता फूटता हो तो आगे हांथ-गोड़ जोड़ा जाय । तबतक कारखास चचा को नेता जी के बारे मे बता देता है, किस गांव के है, समाज मे कितना काम करते है, कौन-कौन बिरादरी का वोट पक्का है और घाघ चचा भी आश्वस्त करते हैं कि उनको चिन्ता करने की जरुरत नही है, इधर के मुहल्ले का वोट एक मुश्त नेताजी को ही जा रहा है। चचा चाह रहे हैं तबतक घर मे से आवाज आती है, बिजली आ गइल बा..........जा जल्दी से ट्यूबवेल चलवा....वा, चचा का धान झुरा रहा है । चचा गमछा कंधे पर रखते खड़े होते है और नेता जी समझ जाते है कि किसी और दरवाजे की तरफ बढ़ा जाय । क्योंकि अब छेक कर बतियाने पर चचवा खेती-किसानी- बिजली-पानी की बात बतियाने लगेगा, जिसका उसके पास कोई जबाब नही है।

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