रविवार, 23 अगस्त 2015

सरकारी स्कूल

जब से हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों और नेताओं के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जाने का आदेश दिया है, दिल में गुदगुदी होने लगी है कि काश हाईकोर्ट ये आदेश भी करता-
1- सरकारी अधिकारियों और नेताओं को इलाज सरकारी अस्पतालों में ही कराया जाय ।
2- हाईकोर्ट हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में ही अर्जियां स्वीकार करे और फैसले दे ।
3- रेलवे के मंत्री, अधिकारियों और कर्मचारियों का जनरल बोगी में यात्रा करना अनिवार्य हो।
4- जेल के मंत्री,जजों, अधिकारियों और कर्मचारियों को साल में एक हफ्ता जेल में बिताना अनिवार्य हो ।
5- बिजली के मंत्री, अधिकारियों और कर्मचारियों के घर पर 3 घण्टे की बिजली कटौती अनिवार्य हो।
6- अखबारों के मालिको और सम्पादकों को उनके अखबार में छपने वाले जापानी तेल और ताबीजों के विज्ञापन का निजी प्रयोग और उसके लाभ को प्रकाशित करना अनिवार्य हो ।
7- विकास प्राधिकरणांे और मल्टी स्टोरी बनाने वालों को उनके बनाए भवनों में ही रहना अनिवार्य किया जाय।
...........और आप चाहें तो लिस्ट बढ़ा सकते हैं ।

-ट्रेन-


जनरल बोगी थी । कुछ किसान सीटो पर बैठे आजादी वाली ट्रेन का आनन्द ले रहे थे । कुछ सालो मे ट्रेन अगले स्टेशन पर खड़ी हुई, बड़ा शहर था । भरी ट्रेन मे जनरल बोगी का ही सहारा था । कुछ लोग हल्ला मचाते घुसे, अरे मानवता के नाम पर बर्थ छोड़ दीजिए, लेबर पेन हो रहा है विकास पैदा होने वाला है। बेचारे बर्थ छोड़कर खड़े हो गए, आखिर मानवता का सवाल था, विकास पैदा हो जाएगा तो आगे चलकर उनको भी जगह मिल जाएगी । अगले स्टेशन पर विकास के मामा, मामी, मौसा, मौसी, चाचा, चाची भी डिब्बे मे घुस आए । सबको विकास के जनम की बधाई देनी थी, सोहर गाना था, खुशियां मनानी थी । किसानों को भी सोहर बड़ा अच्छा लग रहा था, ढोल की थाप पर वे भी अपने थके पांवो से थिरक रहे थे, सतनरायन की कथा का चरनामृत भी उनको दिया गया । वे मुग्ध भाव से विकास को निहार रहे थे, विकास खेलने कूदने लगा उनको कभी उसकी दुलत्ती लग जाती, कभी उनके सिर पर क्रिकेट की बाल टकरा जाती लेकिन वे विकास की खुशी मे ही खुश थे, कभी-कभी जब विकास ज्यादा शरारत करता तो अपनी चोट सहलाते विकास के पापा, मामा आदि से शिकायत भी करते, तब उनको बताया जाता कि बचपने मे ऐसी दुर्घटनाएं हो जाती है। वो फिर खड़े-खड़े ट्रेन की खिड़की से भागती हुई बाहर की दुनियां को निहारने लगते ।
एकाएक विकास बड़ा हो गया, इसका उनको तब आभास हुआ जब एक स्टेशन पर विकास को खरीदने वाले उस डिब्बे मे घुसे, कोई माफिया था, कोई ठेकेदार, कोई भ्रष्ट नौकरशाह, कोई बड़का नेता और विकास के शादी की तैयारी चलने लगी। अब किसानो को महसूस होने लगा कि विकास का कुनबा उनकी बर्थ नही छोड़ेगा, वे कुनमुनाए साहेब बर्थवा खाली कर दो, विकास के खरीददार सबसे पहले गरजने लगे, अरे कोई जनमभूमि छोड़ देगा, एक राष्ट्रवादी चिल्लाया ‘‘जननी जन्मभूमिश्च च‘‘ आखिर विकास वहीं पर पैदा हुआ था। ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही है। हमले मे घायल कुछ किसानो ने पंखे मे गमछा अटका कर हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया है, कुछ को गिरफ्तार करने के लिए अगले स्टेशन पर फौज खड़ी है। बोगी मे विकास के बियाह की तैयारी धूमधाम से चल रही है। पता चला है ट्रेन दिल्ली पहुंच रही है।

बुधवार, 29 जुलाई 2015

डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा


शिक्षा के मन्दिर को पहले बाजार और अब बाजार को चकलाघर बनाने की साजिश से सहमे सुधीजनो से हाल भरा हुआ था । अपने-अपने खन्दकों से निकल कर जुटे सिपाहियो, छात्रों, नौजवानांे के बीच डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा पर स्थापित संचार माध्यमो एवं दलो की चुप्पी की ब्याख्या करते हुए अफलातून  ने उचित ही कहा कि गुलाम को आभास ही न हो कि वह गुलाम है, यह गुलामी की सबसे निकृष्ट स्थिति है। माल (शिक्षा) और उपभोक्ता (विद्यार्थी) के रिश्ते विकसित करता डबलू0टी0ओ0 के तीसरी दुनिया के विद्यार्थियों का हमदर्द होने की त्रासदी पर दिल्ली के  साथी विकास गुप्ता ने अपने गहन दृष्टिबोध से सभागार को आलोकित किया । साथी सचिन ने मलयाली भाषी होते हुए भी जिस तरह से हिन्दी मे अपने सम्बोधन से नवउदारवादियो के शिकंजे मे फंसे समाजो की अकुलाहट को जोड़ते हुए पूर्वांचल की जमीन से उपजने वाले आलोड़न की पीठिका तैयार करने का आह्वाहन किया, उससे लगा कि बाजार के शिकंजे मे जकड़े अभिभावकों के दर्द को स्वर मिलने लगा है  । मैं सोच रहा था कि सन् 1848 मे महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फुले ने किस मुनाफे के लिए तथाकथित शूद्रों, पिछ़ड़ो, महिलाओ और दारुण विपन्नता मे पलते मनुष्यों के हित में तमाम् रुढि़वादियो से लड़ते हुए विद्यालय खोलकर उनको उस नायाब मानव जीवन से परिचय कराया होगा, जो तत्समय की रुढि़यो से उत्पादित सिर्फ मानवेतर दो पाए ही रह गए होते । शब्दों की बाजीगरी से कैसे लूट को आर्थिक लोकतंत्र की तरह पेश किया जा रहा है, कैसे किसान, आदिवासी, मजदूर को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनसे ही इन दुकानो की चैकीदारी कराने की साजिश रची जा रही है सभागार मे छात्रो, नौजवानो, बुनकरो, सामाजिक कार्यकर्ताओ, विभिन्न शिक्षण संस्थानो के प्राध्यापकों ने महसूस किया ।
और अन्त में-
सम्मेलन मे बहुत दिनो बाद मिले साथी गिरजेश जी की पंक्तियां-
तिलमिलाती अस्मिता की दलित क्षमता,
घात से, उपहास से आक्रोश तीखा,
श्रम निरन्तर, गति सतत,
हैं वेदना-संवेदना के तार झंकृत।
जिन्दगी की भृकुटियों पर बल पड़े हैं ।
मे मैने अभी भी उसी तेवर मे अपने प्रयोगधर्मिता पर अटूट विश्वास देखा, जैसा मैने बीसियों वर्ष पूर्व सरायगोबर्द्धन मे देखा था । धन्यवाद डा0 स्वाती, प्रो0 महेश विक्रम, मनोज त्यागी, डा0 नीता चैबे जी इस आयोजन के लिए ।

कलाम साहब


अब जब भावनाओं का उफान ठंडा पड़ गया है तो मैने भी अपने विचारों को व्यवस्थित करना चाहा है। कलाम साहब क्यंू इतना भाते थे और क्यू हम उनके करीब जाते-जाते ठिठक जाते थे।
    वो मुसलमान थे......ये देवी प्रसाद मिश्र की कविता का शीर्षक नही कलाम साहब के व्यक्तित्व का हिस्सा था, लेकिन बिना तराशी हुई दाढ़ी वाले मुसलमान थे । बचपन से किशोरावस्था तक अक्षरों मे रुचि होने के कारण गीता प्रेस आदि से छपने वाली हिन्दू वीर बालको की कहानियों मे गायो को मुसलमान कसाइयों से बचाते बहादुर बालकों, युवा नारियो या कहे रानियों को विजेता आक्रान्ताओं से बचाने मे उत्सर्ग होने वाले बहादुरो की कहानियों के साथ जो रेखाचित्र उकेरे होते थे वे ऐसी तराशी हुई दाढि़यों वाले खलनायकों के होते, मन मे कही ऐसी दा़िढ़यो के प्रति उपजी नफरत के अंश अभी भी दबे छुपे दंश मार देते हैं । आज का प्रौढ़ हिन्दू इस प्रकार की पहचानो से आगे निकल चुका है और एक बुर्जग मुसलमान का अपनी पहचान के प्रति निष्ठावान नही रहना हमे आश्वस्त करता था कि इस भूगोल के रसायन ने उनको इसी भू-भाग की पहचान ढाल लिया है। वैसे मैं स्व0 असगर अली इंजिनियर साहब का आभारी हूं, जिनकी बदौलत जान सका प्रायः दाढ़ी रखना मुसलमान क्यू पसंद करते हैं और यह भी समझ सका कि काल के साथ प्रतीक कैसे अपनी अलग पहचान गढ़ लेते हैं ।
   गुरु हमारे चेतना मे बहुत अहम स्थान रखते हैं । कभी हम कथित रुप से विश्व गुरु थे और आगे भी हम वैश्विक ताकत की अपेक्षा विश्व गुरु होने मे गहन रुचि रखते है और मुख्य धारा का मीडिया गाहे-बगाहे हमारे सपने को बेचता रहता है। कलाम साहब का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही शिक्षक का था । वो किसी भी प्रयोजन मे पहंुच कर राष्ट्रपति से शिक्षक बन जाते और दर्शक समूह छात्र । संयोग देखिए वो अपने आखिरी वक्त मे भी छात्रों के मुखातिब ही थे । और हम ऐसे शिक्षक को बहुत प्यार करते हैं जो हमारे बच्चों के हौसलों को उड़ान देता है।
  उनके बाल सुलभ व्यक्तित्व मे झलकती निर्मलता से कुछ याद आ रहा है, हमने हाल मे ऐसे किस शिखर पुरुष को देखा है । मुझे मदर टेरेसा और गांधी ही याद आ रहे हैं । हमारे पाखंडी अभिजातवर्गीय समाज मे साधू संत भी सोने के सिंहासन पर बैठकर जनता को मोह माया से मुक्त करते हैं । आपको उनके आखिरी कार्यक्रम मे बैठने के लिए सिंहासन की जगह साधारण कुर्सी लगाए जाने का दृश्य दिख रहा होगा । कदम-कदम पर विषमताएं झेलता साधारण भारतीय ऐसी असाधारण सादगी से ज्यादा कनेक्ट होता है और प्यार करता है।
  कलाम साहब .़वैज्ञानिक थे । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया जो किसान को चिलचिलाती दोपहर मे गेंहू की मड़ायी करने मे हो रहे असाध्य, दमघोंटू श्रम से मुक्त कर सके । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया जो हैण्डलूम के बुनकरों को बड़ी मशीनों की मार से मची भुखमरी से बचा सके । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया गरीब मरीजों को महंगी जांचो से बचा सके । लेकिन उन्होने जो भी बनाया उससे भारतीय प्यार करते हैं, भले ही उसने इस उप महाद्वीप मे हथियारों की दौड़ को गति दे दी हो । अब सवाल उठाएंगे तो बहुत कुछ पूछा जा सकता है, हमने सचिन को प्यार किया लेकिन उसने कितने मैच हमको जिता कर दिया, उसके नाते लोकप्रिय होते क्रिकेट ने सट्टेबाजो को जनता को ठगने का मौका मिला तो इसके लिए सिर्फ सचिन ही दोषी है क्या ।
और मैं क्या हूं, अपनी उच्च जातीय परम्पराओं से उपजा एक साधारण पढ़ा लिखा भारतीय, जिसको स्व0 मुकेश का गाए गीत ‘‘कोई शर्त होती नही प्यार में‘‘ की प्रथम पंक्ति के साथ डा0 कलाम के प्रति अपने प्यार की व्याख्या मिल रही है।    

रविवार, 14 जून 2015

विकास


मुल्क राजपरिवार के साथ कुछ खुशनुमा पल और कुछ दुखद यादों को संजोते हुए आगे निकल चुका था । वर्ष 92-93 मे ब्लाक आफिस मे बैठकर गर्मी की दोपहर काटने के लिए कुछ साथी कर्मचारियों के साथ विविध विषयों पर टाइम पास होता रहता था । ऐसे ही एक व्यक्तित्व के साथ मेरा कुछ समय बीतता था, विभाग के पुराने कार्यकर्ता थे । सम्भवतः प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही ग्रामीण विकास से जुड़े थे और फोर्ड फाउण्डेशन के सलाहकार (नाम नही याद आ रहा है) के सानिध्य मे कालाकांकर मे ग्रामीण विकास पर फील्ड स्तरीयकाम किया था उन्होने । उनका व्यक्तित्व गुलजार सरीखा था, बस ज्यादा उम्रदराज दिखते थे और दाढ़ी कुछ ज्यादा बढ़ी दिखती थी। कालर विहीन टेरीकाट का सफेद कुर्ता, धोती, तीन फीते वाला चमड़े का चप्पल और हंसते वक्त दांत छोड़ते सिकुड़ते मसूढ़े बताते थे विभाग से विदा लेने के करीब हैं । एक बार ऐसे ही मैने चुहल किया लगभग हरसाल ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाओं मे प्रायः लक्ष्य पूरे होते रहते हैं, लेकिन जमीन पर अपेक्षित कुछ दिखता क्यों नही है। उन्होने ठहाका लगाते हुए एक अनुभव सुनाया । गरीबी हटाओ का दौर था और वे पड़ोस के एक जिले मे किसी ब्लाक मे ग्राम सेवक के पद पर थे । एक नये नवेले जिलास्तरीय विभागीय अधिकारी ने ब्लाक का दौरा किया और ग्रामस्तरीय कार्यकताओं के साथ बैठक लेना शुरु किया । मीटिंग हाल मे धोती कुर्ता पहने, खादी का झोला लटकाए लोगों को देखकर भड़क गए । जैसा कि नौकरशाहों के साथ होता है उनका एकालाप शुरु हुआ, आप लोगों पर गावों मे एक नयी चेतना फैलाने की जिम्मेदारी है लेकिन आपलोग भी यदि कुर्ता धोती मे ही गावों मे जाएगें तो ग्रामवासी कैसे आपकी बात सुनेगें उनको आपमे कोई विशिष्टता तो नजर आनी चाहिए, जिससे ग्रामवासी आपके व्यक्तित्व से प्रभावित हों...... अगली मीटिंग मे मैं आउंगा तो सभी लोग पैण्ट और बुशर्ट मे नजर आने चाहिए । सबने पैण्ट बुशर्ट बनवाया और खादी के झोले को सलाम किया । उन साहब का दुबारा आना तो नही हुआ लेकिन एकाध साल बाद नए साहब का मुआयना लग गया । समीक्षा के साथ उनकी ब्यंगोक्तियां शुरु हुई और कुछ समय बीतते-बीतते भड़क गए । आप लोग गांव मे विकास करने पैण्ट बुशर्ट मे जा रहे हो, ग्रामीण कैसे आपको अपनाएगें, जब आप उनकी वेशभूषा मे नही रहोगे । देखिए अगर गांव मे काम करना है तो गांव वालो की वेशभूषा मे जाओ, जिनको पैण्ट बुशर्ट पहनना है वे किसी और विभाग मे नौकरी तलाश लें......अगली मीटिंग मे सभी लोग कुर्ता धोती या पजामा मे होने चाहिए । हमलोग मीटिंग के बाद घर पहुंच कर अपनी सन्दूकचियों मे कुर्ता, पजामा तलाश रहे थे ।

सोमवार, 25 मई 2015

-मार्च-


आखिरी बैठक थी, उसके बाद सरकारी खजाने मे ताला लग जाता । इस आपाधापी मे खजाना वापस लौटाना और लुटाना दोनो से बचना था बड़े हाकिम को । हां दाल मे नमक तो स्वाद के लिए जरुरी है इस समझदारी पर प्रश्नचिन्ह नही था, लेकिन किसको कितना नमक पसन्द है इसका भी पैमाना नही था । हाल ठसाठस भरा हुआ था, उसके आते ही सभी को स्कूली जीवन याद आया और नतसिर खड़े हो गए । बैठते ही कुछ कातर निगाहों से, कुछ कर्बलाई अन्दाज मे और कुछ ने ससुर-पतोह अन्दाज मे बड़ा साहब को निहारा और अपने पन्ने पलटने लगे । कोशिश बस इतनी ही थी कि घण्टे-दो घण्टे किसी तरह से सकुशल गुजर जाय, इसके बाद तू कहां, मैं कहां इस अंधेरी रात मे । जिनको प्रशंसात्मक लहजे से निहारा गया, वे कुर्बान हो गए इसका मतलब ये नही था कि उन्होने जनसेवा मे कोई कमाल कर दिया उन्होने बस इतना किया कि बड़ा साहब को उपर की जबाबदेही मे किसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों से उबार लिया। जिनको लताड़ा गया वे रुआंसे हो गए, इसलिए नही कि उन्होने व्यवस्था मे कोई खलल डाल दिया था वे बस चूहा दौड़ मे पिछड़ने की त्रासदी झेल रहे थे । शानदार नाश्ते से ये गम्भीर कार्य सम्पन्न हुआ, जैसे सब भूखे प्यासे ही खेत खनखोद कर आए थे और गृहणी का फर्ज था कि कैसे भी उनका स्वागत करे। विर्सजन मे कुछ ने मुग्ध भाव से निहारा कि बड़ा साहब कितना बारीक निगाह रखता है, जिसको पकड़ता है उसके तह तक पहुंच जाता है। मैं भी चकित था, तभी याद आया अपने क्षेत्र की अवैध यात्री बसों के कंडक्टरों का भी मैं लोहा मानता था क्योंकि ठसाठस भरी हुई बस मे बिना टिकट दिए उसको याद रहता था किसने पैसा दिया है, किसको वापस करना है और कौन क्षेत्र का रंगबाज है, जिससे पैसा मांगने की हिमाकत भी नही करना है। 

सरकिट हाउस

एकबार मैं अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण सरकिट हाउस को चिरकुट हाउस पढ़ गया था । यह भारत के सभी जिला मुख्यालयों मे स्थित एक सरकारी मेहमानखाना होता है, जिसमे जनता के हित मे दुबले हो रहे लोग सरकारी अमले का दामाद बनकर कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं । इसमे देश, प्रदेश के सरकारी हाकिम, सरकारी पार्टी के नेता सम्मिलित रहते हैं । जिलों का दौरा करने वाले ये महानुभाव जनता के काम मे इतने हलकान परेशान रहते हैं कि ये जिस विभाग का हाल खबर लेने आते है उस विभाग के स्थानीय अधिकारी, कर्मचारी चन्दा लगाकर इनकी तथा इनके चेलों का चना, चबैना, गंगजल से सत्कार करते हैं और उस चन्दे की अदायगी के बाद वे जनता को लूटने के अपराध बोध से मुक्त हो जाते हैं। शंकर, हनुमान आदि की मूर्तियां तो अनेको स्थान पर हैं लेकिन बनारस की मूर्तियों से भक्तों को कुछ ज्यादा ही डोज मिलता है इसलिए इसी के बहाने बनारस का चिरकुट हाउस भी हमेशा गुलजार रहता है । स्वर्ग सुखाभिलासियों के आगमन से बनारसियों को जो आय होती है उसमे कुछ इन सरकारी दामादों का हिस्सा भी होता होगा और दैवी न्याय देखिए कि इन सरकारी दामादों के आने-जाने से जो आय बनारसियों को होती होगी उसको सरकारी अमले द्वारा जिले की जनता से वसूल कर लिया जाता है। इसी कारण भगवान सबको देखता है, या उसके घर देर है लेकिन अन्धेर नही है, जैसे चुटकुलों मे मेरी आस्था बढ़ जाती है। यदि आप किसी सरकारी नेता के ठीक-ठाक चमचे हैं और नेता के साथ चिरकुट हाउस मे हैं तो नेताजी की सेवा मे लगे सरकारी नौकरों को फरमाइशी प्रोग्राम सुनाकर मजा लीजिए ।  पब्लिक से सीधे मुंह बात नही करने वाले ये सरकारी कारकुन पूरा दांत निपोर कर ऐसे लगे रहेगें जैसे आप उनके बिटिया के बाराती हो । जरा सा बताइये साहब को हल्की चीनी की चाय पसंद है, सेवा मे लगा सरकारी खादिम ऐसे दौड़ कर रसोइये के पास जाएगा जैसे किसी मरीज को आक्सीजन का मास्क लगाने की इमरजेन्सी है। अगर किसी सरकारी अफसर के साथ हैं तो उसकी बीबी की बनारसी साड़ी मे रुचि बताइये, तुरन्त वो बड़ी-बड़ी दुकानों का पता लगाने लगेगा । हर विभाग मे इस चिरकुट हाउस के पण्डा रहते हैं, वो दिखाते तो खुद को हलकान परेशान हैं लेकिन मन ही मन खुश रहते हैं, जानते हैं घर से तो कुछ लगना नही है और खर्चे की रसीद कोई मांगता नही । मेहमान के चले जाने के बाद खर्चे की वसूली मे उनकी मेहनत की मजूरी भी सम्मिलित रहेगी और यह मजूरी धीरे-धीरे जनता से मृतक वरासत, दाखिल खारिज, जन्म/मृत्यु/जाति प्रमाण पत्र, खड़न्जा/नाली/हैण्डपम्प मरम्मत, बाल पोषाहार वितरण, बिजली कनेक्शन, नक्शा पास कराने, सरकारी राशन पाने आदि सुविधाओं के बदले असंख्य रुपों मे वसूल ली जाएगी । इस पूरे प्रहसन का अन्तिम दृश्य खासा मजेदार होता है जिसमे सरकारी मेहमान की बिदायी के समय उसके अर्दली, पी0ए0 विभाग के पण्डे को अपनी दक्षिणा पाने के लिए या सरकारी गाड़ी मे तेल भरवाने के बहाने पैसा वसूलने के लिए खोजते फिरते है और पण्डा भी इस मौके पर लुकाछिपी लगाए रहता है। कुछ सरकारी मेहमान इतने उदार होते है कि वे अपने स्टाफ से उनको बिदायी मिली कि नही इसकी जानकारी भी लेते हैं और ऐसे हाकिमों पर उनका स्टाफ कुर्बान रहता है ।  अचरज होता है कि ये स्वर्ग सुखाभिलासी अपने विश्वास को भी धोखा देते रहते हैं क्योंकि ये आते हैं तो निजी प्रयोजन के लिए लेकिन खाना-खर्चा सरकारी होता है, इनको शायद यह अगाध विश्वास है कि जिस तरह जनता को मूर्ख बनाकर ऐशोआराम लूट रहे हैं वैसे ही अपने ईश्वर को भी मूर्ख बना रहे हैं । हिन्दू देवी देवताओं के उपासको में अपने वैशिष्ट्य पर इतराने का भाव प्रभावी रहता है जिसके कारण ये सामान्यजन की तरह दर्शन पूजन करना तो छोड़िए सामान्य जन के दर्शन-पूजन मे बाधा डालकर अलग से इन मूर्तियों के साक्षात्कार मे किसी किस्म की बुराई नही समझते और न ही इनको कोई अपराधबोध महसूस होता है। वैसे अब अति विशिष्टों को इन चिरकुट हाउसों मे सामान्य जन के पसीने की बदबू आने लगी है इसलिए अब बेचारे जनता के चन्दे से पांच सितारा होटलो मे ठहर कर रुखी सूखी खाकर जनता की समस्याओ का समाधान करना ज्यादा सुविधाजनक मान रहे हैं । मित्रों से निवेदन है कि चिरकुट हाउस के सामने से गुजरते समय इस गोमुख पर मत्था टेकने का पुण्य जरुर लिजिए।


क्रिकेट टीम

जीत पर जय-जयकार, हार पर हाहाकार । एक प्रयोजन में गांव पर अपनी क्रिकेट टीम के पुरनिया भी जुटे थे, और सेमी फाइनल पर मचे हाहाकार की चर्चा हो रही थी । गांव के आज के क्रीड़ाविहीन माहौल पर निराशा ब्यक्त करते करते हमलोग याद करने लगे कि अपनी टीम को, जिसमे प्रायः गांव के अधिकतर युवा किसी न किसी भूमिका मे सम्मिलित रहते थे । कुछ कठिन जीतों और शर्मनाक हारों को याद करते हुए हमने गिनना शुरु किया उन गुणों को जो हमारी टीम के खिलाड़ियों और समर्थकों ने अर्जित किया । तब पता चला कि खेलते-खेलते हम असहमतियों को बरदाश्त करना सीख गए, सामूहिक हित के आगे अपने लालच को काबू मे रखना जान गए और फूले नथुनों से फेफड़ों को संयत करते हुए जुनून क्या होता है जान सके । इस खेल के सहारे ही हम अपनी विरासत मे मिली संर्कीण जातीय सोच से उबर सके और चीजों को अलग-अलग नजरिए से समझने की कुव्वत पैदा कर सके । हमारी टीम मे मण्डल और कमण्डल के चरम वैमनस्य के दौर में भी सभी जाति एवं धर्म के खिलाड़ियों मे सहज सम्बन्ध बने रहे । इसी की बदौलत हम आज यह  समझ सके कि बाजार को इस खेल की नही बस इसके चन्द बिकाऊ चेहरों की जरुरत है और यह भी देख सके कि क्रिकेट का अजगर कितने खेलों को निगल गया । आज उस टीम के कई महत्वपूर्ण चेहरे इस मित्र मण्डली मे दिख जाएगें, जिन्होने गांव मे जब भी टूर्नामेण्ट होता था तो अपने कितने ही जरुरी कामो को दरकिनार करके टीम के साथ अपना बहुमूल्य समय दिया । मेरे फेसबुक मित्र सूची मे सम्मिलित श्यामाम्बुज सिंह, विनय कुमार, सब्यसाची, सतीश कुमार सिंह, आनन्द सिंह, रामराजीव सिंह वर्चुवल चेहरे नही हैं और न ही इन चेहरों ने किसी किस्म की रामनामी ओढ़ी है । ये जैसे हैं वैसे ही दिखने की कोशिश करते हैं। इनके व्यक्तित्व के विकास मेे गांव की क्रिकेट टीम का योगदान रहा है, इनको जो कुछ इनका विद्यालय नही सिखा सका, परिवार नही सिखा सका उन गुणों को इन्होने क्रिकेट का मैदान साफ करते हुए, टूर्नामेण्ट को सफल बनाने के लिए नवम्बर-दिसम्बर की रातो मे मैदान पर टेन्ट के नीचे रात गुजारते हुए ,हारने पर एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए, जीतने पर एक दूसरे की खिंचाई करते हुए सीखा है। उस दौर मे हमारी टीम ग्रामीण इलाकों मे काफी सम्मानित टीम थी, जिसमे वो भी सम्मिलित होते थे जिनका पढ़ाई-लिखाई मे अच्छा रिकार्ड था और वो भी सम्मिलित होते थे जिनके लिए स्कूल-कालेज एक गैर जरुरी कवायद थी लेकिन आपस मे किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीन भावना नही होती थी । अपनी सीमाओं के चलते मैं इस टीम का खिलाड़ी नही रहा लेकिन इस टीम का शुभचिन्तक जरुर बना रहा ।


-सपने-

-सपने-
बेटों के सपनों,
और,
बेटियों की जरुरतों,
में फंसी जेब,
थरथराती है,
बाजार के गुरुत्वाकर्षण में ।
कुलबुलाती आंते,
पूछती हैं,
ईमानदारी का पता,
और
नैतिकता
इतिहास के पन्नो से ओझल,
पराजित अश्वारोही की तरह,
ढूढ़ रही है अपना आश्रय।
लेकिन,
स्वर्ग के द्वारपालों की खूंखार फौज,
शिनाख्त है,
कुलीनों के डर का,
क्योंकि
सपने डिलीवर कर रहा है,
कोई फटेहाल पिज्जा बाय। सन्तोष 

अन्तिम विदाई

मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट से कितने ही परिजनों को अन्तिम विदाई दी है । हरिश्चन्द्र घाट पर कल ऐसा ही एक दुखद अवसर था । इन श्मशानों पर होने वाले क्रियाकर्म मे प्रायः पुरुष वर्ग ही रहता है । अपने दुःख को जज्ब किए दुनियावी बातचीत से उससे उबरने की कोशिश मे लगे लोग जहां जलती हुई चिताओं को निहारते हुए क्षणिक वैराग्य महसूस करने लगते हैं, वही अन्तिम क्रियाकर्म के कारोबारियों की सौदेबाजी उनको यथार्थ की दुनियां में खींचती रहती है । जलते हुए मांस की चिरांयध गंध से धुआंते वातावरण में शोकग्रस्त पुरुषों के बर्फानी विषाद के बीच मे जगह-जगह बिखरी अधजली लकड़ियों, गोबर और कोयलों के ढेर पर आवारा कुत्ते, छुट्टा जानवर, मुर्गे जहां निर्विकार भाव से घूमते रहते हैं वहीं दारिद्रय सुख का पर्यटन करते यूरोपीय, पुण्य पर्यटन करते शेष भारतीय भी कौतुक भाव से तमाशायी बने रहते हैं । इस पूरे माहौल मे हम गतात्मा के बारे मे नहीं अपितु कर्मकाण्ड की बारीकियों के बारे मे ज्यादा सोचते हैं और हमेशा की तरह गांव के कुछ विशेषज्ञ चिता की लकड़ियों को उलटते पलटते शरीर के शेष हिस्सों के जलने मे लगने वाले समय की स्वतःस्फूर्त ढंग से जानकारी देते रहते हैं । श्मशान पर एक महिला का करुण क्रंदन विषाद की बर्फ को पिघलाने लगा और मैने डूबती आंखो से उबरने के लिए सीढ़ियों पर चहलकदमी करते हुए एक लापता सज्जन के सम्बन्ध मे चिपके पोस्टर पर निगाह गड़ा दी । अजीब लगा कि जो जगह बहुसंख्य हिन्दुओं का अंतिम पता है, वहां पर भी लोग लापता की तलाश कर रहे है फिर महसूस हुआ कि शवदाह की क्रिया मे प्रतिदिन लापता होने वाले सैकड़ो पेंड़ो का पोस्टर भी इन घाटों पर जगह-जगह जरुर चिपकाया जाना चाहिए ताकि पता चलता रहे स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे हिन्दुओ के साथ गंगा प्रतिदिन कितने वृक्षों के असामयिक संहार की गवाह बन रही है ।

फागुन

सुनो.........फागुन,
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...