सोमवार, 25 मई 2015

-सपने-

-सपने-
बेटों के सपनों,
और,
बेटियों की जरुरतों,
में फंसी जेब,
थरथराती है,
बाजार के गुरुत्वाकर्षण में ।
कुलबुलाती आंते,
पूछती हैं,
ईमानदारी का पता,
और
नैतिकता
इतिहास के पन्नो से ओझल,
पराजित अश्वारोही की तरह,
ढूढ़ रही है अपना आश्रय।
लेकिन,
स्वर्ग के द्वारपालों की खूंखार फौज,
शिनाख्त है,
कुलीनों के डर का,
क्योंकि
सपने डिलीवर कर रहा है,
कोई फटेहाल पिज्जा बाय। सन्तोष 

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