अन्तिम विदाई
मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट से कितने ही परिजनों को अन्तिम विदाई दी है । हरिश्चन्द्र घाट पर कल ऐसा ही एक दुखद अवसर था । इन श्मशानों पर होने वाले क्रियाकर्म मे प्रायः पुरुष वर्ग ही रहता है । अपने दुःख को जज्ब किए दुनियावी बातचीत से उससे उबरने की कोशिश मे लगे लोग जहां जलती हुई चिताओं को निहारते हुए क्षणिक वैराग्य महसूस करने लगते हैं, वही अन्तिम क्रियाकर्म के कारोबारियों की सौदेबाजी उनको यथार्थ की दुनियां में खींचती रहती है । जलते हुए मांस की चिरांयध गंध से धुआंते वातावरण में शोकग्रस्त पुरुषों के बर्फानी विषाद के बीच मे जगह-जगह बिखरी अधजली लकड़ियों, गोबर और कोयलों के ढेर पर आवारा कुत्ते, छुट्टा जानवर, मुर्गे जहां निर्विकार भाव से घूमते रहते हैं वहीं दारिद्रय सुख का पर्यटन करते यूरोपीय, पुण्य पर्यटन करते शेष भारतीय भी कौतुक भाव से तमाशायी बने रहते हैं । इस पूरे माहौल मे हम गतात्मा के बारे मे नहीं अपितु कर्मकाण्ड की बारीकियों के बारे मे ज्यादा सोचते हैं और हमेशा की तरह गांव के कुछ विशेषज्ञ चिता की लकड़ियों को उलटते पलटते शरीर के शेष हिस्सों के जलने मे लगने वाले समय की स्वतःस्फूर्त ढंग से जानकारी देते रहते हैं । श्मशान पर एक महिला का करुण क्रंदन विषाद की बर्फ को पिघलाने लगा और मैने डूबती आंखो से उबरने के लिए सीढ़ियों पर चहलकदमी करते हुए एक लापता सज्जन के सम्बन्ध मे चिपके पोस्टर पर निगाह गड़ा दी । अजीब लगा कि जो जगह बहुसंख्य हिन्दुओं का अंतिम पता है, वहां पर भी लोग लापता की तलाश कर रहे है फिर महसूस हुआ कि शवदाह की क्रिया मे प्रतिदिन लापता होने वाले सैकड़ो पेंड़ो का पोस्टर भी इन घाटों पर जगह-जगह जरुर चिपकाया जाना चाहिए ताकि पता चलता रहे स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे हिन्दुओ के साथ गंगा प्रतिदिन कितने वृक्षों के असामयिक संहार की गवाह बन रही है ।

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