फागुन
सुनो.........फागुन,
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष

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