सोमवार, 25 मई 2015

-मार्च-


आखिरी बैठक थी, उसके बाद सरकारी खजाने मे ताला लग जाता । इस आपाधापी मे खजाना वापस लौटाना और लुटाना दोनो से बचना था बड़े हाकिम को । हां दाल मे नमक तो स्वाद के लिए जरुरी है इस समझदारी पर प्रश्नचिन्ह नही था, लेकिन किसको कितना नमक पसन्द है इसका भी पैमाना नही था । हाल ठसाठस भरा हुआ था, उसके आते ही सभी को स्कूली जीवन याद आया और नतसिर खड़े हो गए । बैठते ही कुछ कातर निगाहों से, कुछ कर्बलाई अन्दाज मे और कुछ ने ससुर-पतोह अन्दाज मे बड़ा साहब को निहारा और अपने पन्ने पलटने लगे । कोशिश बस इतनी ही थी कि घण्टे-दो घण्टे किसी तरह से सकुशल गुजर जाय, इसके बाद तू कहां, मैं कहां इस अंधेरी रात मे । जिनको प्रशंसात्मक लहजे से निहारा गया, वे कुर्बान हो गए इसका मतलब ये नही था कि उन्होने जनसेवा मे कोई कमाल कर दिया उन्होने बस इतना किया कि बड़ा साहब को उपर की जबाबदेही मे किसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों से उबार लिया। जिनको लताड़ा गया वे रुआंसे हो गए, इसलिए नही कि उन्होने व्यवस्था मे कोई खलल डाल दिया था वे बस चूहा दौड़ मे पिछड़ने की त्रासदी झेल रहे थे । शानदार नाश्ते से ये गम्भीर कार्य सम्पन्न हुआ, जैसे सब भूखे प्यासे ही खेत खनखोद कर आए थे और गृहणी का फर्ज था कि कैसे भी उनका स्वागत करे। विर्सजन मे कुछ ने मुग्ध भाव से निहारा कि बड़ा साहब कितना बारीक निगाह रखता है, जिसको पकड़ता है उसके तह तक पहुंच जाता है। मैं भी चकित था, तभी याद आया अपने क्षेत्र की अवैध यात्री बसों के कंडक्टरों का भी मैं लोहा मानता था क्योंकि ठसाठस भरी हुई बस मे बिना टिकट दिए उसको याद रहता था किसने पैसा दिया है, किसको वापस करना है और कौन क्षेत्र का रंगबाज है, जिससे पैसा मांगने की हिमाकत भी नही करना है। 

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