सरकिट हाउस
एकबार मैं अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण सरकिट हाउस को चिरकुट हाउस पढ़ गया था । यह भारत के सभी जिला मुख्यालयों मे स्थित एक सरकारी मेहमानखाना होता है, जिसमे जनता के हित मे दुबले हो रहे लोग सरकारी अमले का दामाद बनकर कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं । इसमे देश, प्रदेश के सरकारी हाकिम, सरकारी पार्टी के नेता सम्मिलित रहते हैं । जिलों का दौरा करने वाले ये महानुभाव जनता के काम मे इतने हलकान परेशान रहते हैं कि ये जिस विभाग का हाल खबर लेने आते है उस विभाग के स्थानीय अधिकारी, कर्मचारी चन्दा लगाकर इनकी तथा इनके चेलों का चना, चबैना, गंगजल से सत्कार करते हैं और उस चन्दे की अदायगी के बाद वे जनता को लूटने के अपराध बोध से मुक्त हो जाते हैं। शंकर, हनुमान आदि की मूर्तियां तो अनेको स्थान पर हैं लेकिन बनारस की मूर्तियों से भक्तों को कुछ ज्यादा ही डोज मिलता है इसलिए इसी के बहाने बनारस का चिरकुट हाउस भी हमेशा गुलजार रहता है । स्वर्ग सुखाभिलासियों के आगमन से बनारसियों को जो आय होती है उसमे कुछ इन सरकारी दामादों का हिस्सा भी होता होगा और दैवी न्याय देखिए कि इन सरकारी दामादों के आने-जाने से जो आय बनारसियों को होती होगी उसको सरकारी अमले द्वारा जिले की जनता से वसूल कर लिया जाता है। इसी कारण भगवान सबको देखता है, या उसके घर देर है लेकिन अन्धेर नही है, जैसे चुटकुलों मे मेरी आस्था बढ़ जाती है। यदि आप किसी सरकारी नेता के ठीक-ठाक चमचे हैं और नेता के साथ चिरकुट हाउस मे हैं तो नेताजी की सेवा मे लगे सरकारी नौकरों को फरमाइशी प्रोग्राम सुनाकर मजा लीजिए । पब्लिक से सीधे मुंह बात नही करने वाले ये सरकारी कारकुन पूरा दांत निपोर कर ऐसे लगे रहेगें जैसे आप उनके बिटिया के बाराती हो । जरा सा बताइये साहब को हल्की चीनी की चाय पसंद है, सेवा मे लगा सरकारी खादिम ऐसे दौड़ कर रसोइये के पास जाएगा जैसे किसी मरीज को आक्सीजन का मास्क लगाने की इमरजेन्सी है। अगर किसी सरकारी अफसर के साथ हैं तो उसकी बीबी की बनारसी साड़ी मे रुचि बताइये, तुरन्त वो बड़ी-बड़ी दुकानों का पता लगाने लगेगा । हर विभाग मे इस चिरकुट हाउस के पण्डा रहते हैं, वो दिखाते तो खुद को हलकान परेशान हैं लेकिन मन ही मन खुश रहते हैं, जानते हैं घर से तो कुछ लगना नही है और खर्चे की रसीद कोई मांगता नही । मेहमान के चले जाने के बाद खर्चे की वसूली मे उनकी मेहनत की मजूरी भी सम्मिलित रहेगी और यह मजूरी धीरे-धीरे जनता से मृतक वरासत, दाखिल खारिज, जन्म/मृत्यु/जाति प्रमाण पत्र, खड़न्जा/नाली/हैण्डपम्प मरम्मत, बाल पोषाहार वितरण, बिजली कनेक्शन, नक्शा पास कराने, सरकारी राशन पाने आदि सुविधाओं के बदले असंख्य रुपों मे वसूल ली जाएगी । इस पूरे प्रहसन का अन्तिम दृश्य खासा मजेदार होता है जिसमे सरकारी मेहमान की बिदायी के समय उसके अर्दली, पी0ए0 विभाग के पण्डे को अपनी दक्षिणा पाने के लिए या सरकारी गाड़ी मे तेल भरवाने के बहाने पैसा वसूलने के लिए खोजते फिरते है और पण्डा भी इस मौके पर लुकाछिपी लगाए रहता है। कुछ सरकारी मेहमान इतने उदार होते है कि वे अपने स्टाफ से उनको बिदायी मिली कि नही इसकी जानकारी भी लेते हैं और ऐसे हाकिमों पर उनका स्टाफ कुर्बान रहता है । अचरज होता है कि ये स्वर्ग सुखाभिलासी अपने विश्वास को भी धोखा देते रहते हैं क्योंकि ये आते हैं तो निजी प्रयोजन के लिए लेकिन खाना-खर्चा सरकारी होता है, इनको शायद यह अगाध विश्वास है कि जिस तरह जनता को मूर्ख बनाकर ऐशोआराम लूट रहे हैं वैसे ही अपने ईश्वर को भी मूर्ख बना रहे हैं । हिन्दू देवी देवताओं के उपासको में अपने वैशिष्ट्य पर इतराने का भाव प्रभावी रहता है जिसके कारण ये सामान्यजन की तरह दर्शन पूजन करना तो छोड़िए सामान्य जन के दर्शन-पूजन मे बाधा डालकर अलग से इन मूर्तियों के साक्षात्कार मे किसी किस्म की बुराई नही समझते और न ही इनको कोई अपराधबोध महसूस होता है। वैसे अब अति विशिष्टों को इन चिरकुट हाउसों मे सामान्य जन के पसीने की बदबू आने लगी है इसलिए अब बेचारे जनता के चन्दे से पांच सितारा होटलो मे ठहर कर रुखी सूखी खाकर जनता की समस्याओ का समाधान करना ज्यादा सुविधाजनक मान रहे हैं । मित्रों से निवेदन है कि चिरकुट हाउस के सामने से गुजरते समय इस गोमुख पर मत्था टेकने का पुण्य जरुर लिजिए।

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