-ट्रेन-
जनरल बोगी थी । कुछ किसान सीटो पर बैठे आजादी वाली ट्रेन का आनन्द ले रहे थे । कुछ सालो मे ट्रेन अगले स्टेशन पर खड़ी हुई, बड़ा शहर था । भरी ट्रेन मे जनरल बोगी का ही सहारा था । कुछ लोग हल्ला मचाते घुसे, अरे मानवता के नाम पर बर्थ छोड़ दीजिए, लेबर पेन हो रहा है विकास पैदा होने वाला है। बेचारे बर्थ छोड़कर खड़े हो गए, आखिर मानवता का सवाल था, विकास पैदा हो जाएगा तो आगे चलकर उनको भी जगह मिल जाएगी । अगले स्टेशन पर विकास के मामा, मामी, मौसा, मौसी, चाचा, चाची भी डिब्बे मे घुस आए । सबको विकास के जनम की बधाई देनी थी, सोहर गाना था, खुशियां मनानी थी । किसानों को भी सोहर बड़ा अच्छा लग रहा था, ढोल की थाप पर वे भी अपने थके पांवो से थिरक रहे थे, सतनरायन की कथा का चरनामृत भी उनको दिया गया । वे मुग्ध भाव से विकास को निहार रहे थे, विकास खेलने कूदने लगा उनको कभी उसकी दुलत्ती लग जाती, कभी उनके सिर पर क्रिकेट की बाल टकरा जाती लेकिन वे विकास की खुशी मे ही खुश थे, कभी-कभी जब विकास ज्यादा शरारत करता तो अपनी चोट सहलाते विकास के पापा, मामा आदि से शिकायत भी करते, तब उनको बताया जाता कि बचपने मे ऐसी दुर्घटनाएं हो जाती है। वो फिर खड़े-खड़े ट्रेन की खिड़की से भागती हुई बाहर की दुनियां को निहारने लगते ।
एकाएक विकास बड़ा हो गया, इसका उनको तब आभास हुआ जब एक स्टेशन पर विकास को खरीदने वाले उस डिब्बे मे घुसे, कोई माफिया था, कोई ठेकेदार, कोई भ्रष्ट नौकरशाह, कोई बड़का नेता और विकास के शादी की तैयारी चलने लगी। अब किसानो को महसूस होने लगा कि विकास का कुनबा उनकी बर्थ नही छोड़ेगा, वे कुनमुनाए साहेब बर्थवा खाली कर दो, विकास के खरीददार सबसे पहले गरजने लगे, अरे कोई जनमभूमि छोड़ देगा, एक राष्ट्रवादी चिल्लाया ‘‘जननी जन्मभूमिश्च च‘‘ आखिर विकास वहीं पर पैदा हुआ था। ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही है। हमले मे घायल कुछ किसानो ने पंखे मे गमछा अटका कर हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया है, कुछ को गिरफ्तार करने के लिए अगले स्टेशन पर फौज खड़ी है। बोगी मे विकास के बियाह की तैयारी धूमधाम से चल रही है। पता चला है ट्रेन दिल्ली पहुंच रही है।

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