डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा
शिक्षा के मन्दिर को पहले बाजार और अब बाजार को चकलाघर बनाने की साजिश से सहमे सुधीजनो से हाल भरा हुआ था । अपने-अपने खन्दकों से निकल कर जुटे सिपाहियो, छात्रों, नौजवानांे के बीच डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा पर स्थापित संचार माध्यमो एवं दलो की चुप्पी की ब्याख्या करते हुए अफलातून ने उचित ही कहा कि गुलाम को आभास ही न हो कि वह गुलाम है, यह गुलामी की सबसे निकृष्ट स्थिति है। माल (शिक्षा) और उपभोक्ता (विद्यार्थी) के रिश्ते विकसित करता डबलू0टी0ओ0 के तीसरी दुनिया के विद्यार्थियों का हमदर्द होने की त्रासदी पर दिल्ली के साथी विकास गुप्ता ने अपने गहन दृष्टिबोध से सभागार को आलोकित किया । साथी सचिन ने मलयाली भाषी होते हुए भी जिस तरह से हिन्दी मे अपने सम्बोधन से नवउदारवादियो के शिकंजे मे फंसे समाजो की अकुलाहट को जोड़ते हुए पूर्वांचल की जमीन से उपजने वाले आलोड़न की पीठिका तैयार करने का आह्वाहन किया, उससे लगा कि बाजार के शिकंजे मे जकड़े अभिभावकों के दर्द को स्वर मिलने लगा है । मैं सोच रहा था कि सन् 1848 मे महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फुले ने किस मुनाफे के लिए तथाकथित शूद्रों, पिछ़ड़ो, महिलाओ और दारुण विपन्नता मे पलते मनुष्यों के हित में तमाम् रुढि़वादियो से लड़ते हुए विद्यालय खोलकर उनको उस नायाब मानव जीवन से परिचय कराया होगा, जो तत्समय की रुढि़यो से उत्पादित सिर्फ मानवेतर दो पाए ही रह गए होते । शब्दों की बाजीगरी से कैसे लूट को आर्थिक लोकतंत्र की तरह पेश किया जा रहा है, कैसे किसान, आदिवासी, मजदूर को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनसे ही इन दुकानो की चैकीदारी कराने की साजिश रची जा रही है सभागार मे छात्रो, नौजवानो, बुनकरो, सामाजिक कार्यकर्ताओ, विभिन्न शिक्षण संस्थानो के प्राध्यापकों ने महसूस किया ।
और अन्त में-
सम्मेलन मे बहुत दिनो बाद मिले साथी गिरजेश जी की पंक्तियां-
तिलमिलाती अस्मिता की दलित क्षमता,
घात से, उपहास से आक्रोश तीखा,
श्रम निरन्तर, गति सतत,
हैं वेदना-संवेदना के तार झंकृत।
जिन्दगी की भृकुटियों पर बल पड़े हैं ।
मे मैने अभी भी उसी तेवर मे अपने प्रयोगधर्मिता पर अटूट विश्वास देखा, जैसा मैने बीसियों वर्ष पूर्व सरायगोबर्द्धन मे देखा था । धन्यवाद डा0 स्वाती, प्रो0 महेश विक्रम, मनोज त्यागी, डा0 नीता चैबे जी इस आयोजन के लिए ।

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