क्रिकेट टीम

जीत पर जय-जयकार, हार पर हाहाकार । एक प्रयोजन में गांव पर अपनी क्रिकेट टीम के पुरनिया भी जुटे थे, और सेमी फाइनल पर मचे हाहाकार की चर्चा हो रही थी । गांव के आज के क्रीड़ाविहीन माहौल पर निराशा ब्यक्त करते करते हमलोग याद करने लगे कि अपनी टीम को, जिसमे प्रायः गांव के अधिकतर युवा किसी न किसी भूमिका मे सम्मिलित रहते थे । कुछ कठिन जीतों और शर्मनाक हारों को याद करते हुए हमने गिनना शुरु किया उन गुणों को जो हमारी टीम के खिलाड़ियों और समर्थकों ने अर्जित किया । तब पता चला कि खेलते-खेलते हम असहमतियों को बरदाश्त करना सीख गए, सामूहिक हित के आगे अपने लालच को काबू मे रखना जान गए और फूले नथुनों से फेफड़ों को संयत करते हुए जुनून क्या होता है जान सके । इस खेल के सहारे ही हम अपनी विरासत मे मिली संर्कीण जातीय सोच से उबर सके और चीजों को अलग-अलग नजरिए से समझने की कुव्वत पैदा कर सके । हमारी टीम मे मण्डल और कमण्डल के चरम वैमनस्य के दौर में भी सभी जाति एवं धर्म के खिलाड़ियों मे सहज सम्बन्ध बने रहे । इसी की बदौलत हम आज यह  समझ सके कि बाजार को इस खेल की नही बस इसके चन्द बिकाऊ चेहरों की जरुरत है और यह भी देख सके कि क्रिकेट का अजगर कितने खेलों को निगल गया । आज उस टीम के कई महत्वपूर्ण चेहरे इस मित्र मण्डली मे दिख जाएगें, जिन्होने गांव मे जब भी टूर्नामेण्ट होता था तो अपने कितने ही जरुरी कामो को दरकिनार करके टीम के साथ अपना बहुमूल्य समय दिया । मेरे फेसबुक मित्र सूची मे सम्मिलित श्यामाम्बुज सिंह, विनय कुमार, सब्यसाची, सतीश कुमार सिंह, आनन्द सिंह, रामराजीव सिंह वर्चुवल चेहरे नही हैं और न ही इन चेहरों ने किसी किस्म की रामनामी ओढ़ी है । ये जैसे हैं वैसे ही दिखने की कोशिश करते हैं। इनके व्यक्तित्व के विकास मेे गांव की क्रिकेट टीम का योगदान रहा है, इनको जो कुछ इनका विद्यालय नही सिखा सका, परिवार नही सिखा सका उन गुणों को इन्होने क्रिकेट का मैदान साफ करते हुए, टूर्नामेण्ट को सफल बनाने के लिए नवम्बर-दिसम्बर की रातो मे मैदान पर टेन्ट के नीचे रात गुजारते हुए ,हारने पर एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए, जीतने पर एक दूसरे की खिंचाई करते हुए सीखा है। उस दौर मे हमारी टीम ग्रामीण इलाकों मे काफी सम्मानित टीम थी, जिसमे वो भी सम्मिलित होते थे जिनका पढ़ाई-लिखाई मे अच्छा रिकार्ड था और वो भी सम्मिलित होते थे जिनके लिए स्कूल-कालेज एक गैर जरुरी कवायद थी लेकिन आपस मे किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीन भावना नही होती थी । अपनी सीमाओं के चलते मैं इस टीम का खिलाड़ी नही रहा लेकिन इस टीम का शुभचिन्तक जरुर बना रहा ।


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