सोमवार, 25 मई 2015

क्रिकेट टीम

जीत पर जय-जयकार, हार पर हाहाकार । एक प्रयोजन में गांव पर अपनी क्रिकेट टीम के पुरनिया भी जुटे थे, और सेमी फाइनल पर मचे हाहाकार की चर्चा हो रही थी । गांव के आज के क्रीड़ाविहीन माहौल पर निराशा ब्यक्त करते करते हमलोग याद करने लगे कि अपनी टीम को, जिसमे प्रायः गांव के अधिकतर युवा किसी न किसी भूमिका मे सम्मिलित रहते थे । कुछ कठिन जीतों और शर्मनाक हारों को याद करते हुए हमने गिनना शुरु किया उन गुणों को जो हमारी टीम के खिलाड़ियों और समर्थकों ने अर्जित किया । तब पता चला कि खेलते-खेलते हम असहमतियों को बरदाश्त करना सीख गए, सामूहिक हित के आगे अपने लालच को काबू मे रखना जान गए और फूले नथुनों से फेफड़ों को संयत करते हुए जुनून क्या होता है जान सके । इस खेल के सहारे ही हम अपनी विरासत मे मिली संर्कीण जातीय सोच से उबर सके और चीजों को अलग-अलग नजरिए से समझने की कुव्वत पैदा कर सके । हमारी टीम मे मण्डल और कमण्डल के चरम वैमनस्य के दौर में भी सभी जाति एवं धर्म के खिलाड़ियों मे सहज सम्बन्ध बने रहे । इसी की बदौलत हम आज यह  समझ सके कि बाजार को इस खेल की नही बस इसके चन्द बिकाऊ चेहरों की जरुरत है और यह भी देख सके कि क्रिकेट का अजगर कितने खेलों को निगल गया । आज उस टीम के कई महत्वपूर्ण चेहरे इस मित्र मण्डली मे दिख जाएगें, जिन्होने गांव मे जब भी टूर्नामेण्ट होता था तो अपने कितने ही जरुरी कामो को दरकिनार करके टीम के साथ अपना बहुमूल्य समय दिया । मेरे फेसबुक मित्र सूची मे सम्मिलित श्यामाम्बुज सिंह, विनय कुमार, सब्यसाची, सतीश कुमार सिंह, आनन्द सिंह, रामराजीव सिंह वर्चुवल चेहरे नही हैं और न ही इन चेहरों ने किसी किस्म की रामनामी ओढ़ी है । ये जैसे हैं वैसे ही दिखने की कोशिश करते हैं। इनके व्यक्तित्व के विकास मेे गांव की क्रिकेट टीम का योगदान रहा है, इनको जो कुछ इनका विद्यालय नही सिखा सका, परिवार नही सिखा सका उन गुणों को इन्होने क्रिकेट का मैदान साफ करते हुए, टूर्नामेण्ट को सफल बनाने के लिए नवम्बर-दिसम्बर की रातो मे मैदान पर टेन्ट के नीचे रात गुजारते हुए ,हारने पर एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए, जीतने पर एक दूसरे की खिंचाई करते हुए सीखा है। उस दौर मे हमारी टीम ग्रामीण इलाकों मे काफी सम्मानित टीम थी, जिसमे वो भी सम्मिलित होते थे जिनका पढ़ाई-लिखाई मे अच्छा रिकार्ड था और वो भी सम्मिलित होते थे जिनके लिए स्कूल-कालेज एक गैर जरुरी कवायद थी लेकिन आपस मे किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीन भावना नही होती थी । अपनी सीमाओं के चलते मैं इस टीम का खिलाड़ी नही रहा लेकिन इस टीम का शुभचिन्तक जरुर बना रहा ।


-सपने-

-सपने-
बेटों के सपनों,
और,
बेटियों की जरुरतों,
में फंसी जेब,
थरथराती है,
बाजार के गुरुत्वाकर्षण में ।
कुलबुलाती आंते,
पूछती हैं,
ईमानदारी का पता,
और
नैतिकता
इतिहास के पन्नो से ओझल,
पराजित अश्वारोही की तरह,
ढूढ़ रही है अपना आश्रय।
लेकिन,
स्वर्ग के द्वारपालों की खूंखार फौज,
शिनाख्त है,
कुलीनों के डर का,
क्योंकि
सपने डिलीवर कर रहा है,
कोई फटेहाल पिज्जा बाय। सन्तोष 

अन्तिम विदाई

मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट से कितने ही परिजनों को अन्तिम विदाई दी है । हरिश्चन्द्र घाट पर कल ऐसा ही एक दुखद अवसर था । इन श्मशानों पर होने वाले क्रियाकर्म मे प्रायः पुरुष वर्ग ही रहता है । अपने दुःख को जज्ब किए दुनियावी बातचीत से उससे उबरने की कोशिश मे लगे लोग जहां जलती हुई चिताओं को निहारते हुए क्षणिक वैराग्य महसूस करने लगते हैं, वही अन्तिम क्रियाकर्म के कारोबारियों की सौदेबाजी उनको यथार्थ की दुनियां में खींचती रहती है । जलते हुए मांस की चिरांयध गंध से धुआंते वातावरण में शोकग्रस्त पुरुषों के बर्फानी विषाद के बीच मे जगह-जगह बिखरी अधजली लकड़ियों, गोबर और कोयलों के ढेर पर आवारा कुत्ते, छुट्टा जानवर, मुर्गे जहां निर्विकार भाव से घूमते रहते हैं वहीं दारिद्रय सुख का पर्यटन करते यूरोपीय, पुण्य पर्यटन करते शेष भारतीय भी कौतुक भाव से तमाशायी बने रहते हैं । इस पूरे माहौल मे हम गतात्मा के बारे मे नहीं अपितु कर्मकाण्ड की बारीकियों के बारे मे ज्यादा सोचते हैं और हमेशा की तरह गांव के कुछ विशेषज्ञ चिता की लकड़ियों को उलटते पलटते शरीर के शेष हिस्सों के जलने मे लगने वाले समय की स्वतःस्फूर्त ढंग से जानकारी देते रहते हैं । श्मशान पर एक महिला का करुण क्रंदन विषाद की बर्फ को पिघलाने लगा और मैने डूबती आंखो से उबरने के लिए सीढ़ियों पर चहलकदमी करते हुए एक लापता सज्जन के सम्बन्ध मे चिपके पोस्टर पर निगाह गड़ा दी । अजीब लगा कि जो जगह बहुसंख्य हिन्दुओं का अंतिम पता है, वहां पर भी लोग लापता की तलाश कर रहे है फिर महसूस हुआ कि शवदाह की क्रिया मे प्रतिदिन लापता होने वाले सैकड़ो पेंड़ो का पोस्टर भी इन घाटों पर जगह-जगह जरुर चिपकाया जाना चाहिए ताकि पता चलता रहे स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे हिन्दुओ के साथ गंगा प्रतिदिन कितने वृक्षों के असामयिक संहार की गवाह बन रही है ।

फागुन

सुनो.........फागुन,
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष

खेवली

पक्की सड़क छूटी, आबादी के बीच में से गुजर रहा खड़ंजा ठिठक गया तो कुछ पेड़ो के बीच से पगडण्डीनुमा रास्ते दिखाई दिए। खटोले पर बैठी एक महिला से पूछना पड़ा सुदामा पान्डे के घर का रास्ता कौन है। एहर से चल जा, उसके बताने की विशिष्टता पर गौर किया तो पाया हम एक दृष्टिहीन से रास्ता पूछ रहे हैं। मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे चचा ने संस्मरणों की पोटली खोली, एक बार गोदौलिया के पास एक गूंगा किसी को रास्ता बता रहा था, धूमिल बोले "देखिये न प्रकाश जी ये गूंगा अपने पूरे शरीर से बतिया रहा है"। ऐसे ही संस्मरणों को दुहराते हम कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे, जहां नन्दलाल मास्टर गांव के बच्चों के साथ दूसरे प्रजातंत्र की तलाश में लगे हुए। खेवली अभी भी धूमिल को याद कर रहा है, गांव के उनके समकालीन धूमिल के तेवर को अभी भी सहेजे हुए हैं। आशा करता हूँ वो दिन भी आएगा जब ९ नवंबर को हम नारा लगाएंगे " खेवली चलो ".

बुधवार, 19 नवंबर 2014

कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को


  रेडियों पर एक पुराना फ़िल्मी गीत बज रहा था " कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को " किशोरावस्था में इस सुपर हिट फ़िल्मी गीत के बोल और रंजीता का मासूमियत भरा अभिनय देख सुन कर लगता था जमाना बस दो प्रेमियों के साथ खिलवाड़ कर रहा है और वो बस ऐसे ही गीत गाकर भीड़ से अपने  प्रेमी को बचा  लेगी।  इस गीत को देखने सुनने में कहीं भी संगेमार की भयावहता नही महसूस होती थी।  आज मध्यपूर्व की इस क्रूर परम्परा को जानसुनकर महसूस होता है कि बंबइया फिल्में क्रूरतम चीजों कों भी मांसल सौंदर्य में लपेट कर ऐसे परोसती हैं कि हम किसी कुप्रथा को भी बहुत सहजता से लेने लगते हैं , चाहे वो धार्मिक या जातीय  भेदभाव हो , दहेज प्रथा हो , आर्थिक विषमता हो या कोई और गंभीर समस्या। इसी प्रकार गैर हिंदी भाषी या नारी स्वतंत्रता, गंवई ब्यक्ति प्रायः इनके उपहास का पात्र होता है। दरअसल  तस्करी और कालेधन के बलपर बनने वाली अधिकांश फिल्मों  ने हमारी भाषा पर ऐसा प्रभाव डाला है कि हमने अपनी अगली पीढ़ियों के लिए तमाम  फर्जी नायक, महानायक या सदी नायक रच डाले  है। काले धन को सफेद करते ये फर्जी नायक या  महानायक अपनी इंड्रस्ट्री को भी इतना लूट लेते हैं कि इस इंड्रस्ट्री के छोटे मोटे  कर्मचारियों के  आवश्यक आवश्यकताओं  की पूर्ति भी नहीं हो पाती और हम इन भाँडो पर तालियां बजाकर नायकत्व का दर्जा देते रहते हैं।  समाज के इन धूर्त  नायकों के चरित्र की  निरंतर चीरफाड़ भी उतनी ही जरूरी  है, जितना राजनीति या जीवन के अन्य क्षेत्र के धूर्तों के लिए जरूरी  है । कुछ साथी सोच सकते हैं कि इनको गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है, उनसे मेरा निवेदन है कि आप इनको गंभीरता से लें या ना लें,आपकी  परिधि के बाहर इनको गंभीरता से लिया जाता है।


शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

नया दिन


भोर  की  गुनगुनी ठंड गर्म चादर तलाश  रही थी।  सूरज की किरणें आँगन तक पहुंची तो सोया हुआ बचपन आँखे मींचते जागा  और रात के सुनहरे ख्वाबों को ढूढ़ने लगा। कुछ अधजली मोमबत्तियों और दगे हुए पटाखों की लुगदी में. जिन्दा बमों को ढूढ़ते  बच्चे दीपावली की रात में खर्च हो चुके उल्लास में से बची खुची खुशियाँ तलाश रहे थे।  मुंडेर पर उगी घास में टंगी झिलमिलाती ओस की बूंदे बुझे हुए दीपक को  चिढ़ा रहीं थी, नया दिन दस्तक दे चुका था।   


  

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

कुत्ता, कैंची और सायकिल



 नेट पैक ख़त्म होने लगता है  तो सर्च करने वाला चक्र कभी इतना धीमे घूमता है जैसे उसकी बेयरिंग फूट गयी है  और  कभी निर्रथक इतना तेज चलता है जैसे उसका कुत्ता फेल हो गया है।
कुत्ता समझ रहें हैं न, अरे वो कुत्ता नही जिसकी जंजीर पकड़ कर सुसंकृत  लोग मॉर्निंग वाक करते हैं।
  एक कुत्ता सायकिल के धुर्री में होता है, जिसके फेल होने पर सिर्फ पैडिल ही घूमती है पहिया नही घूमता है।  कही आप ये तो नही समझने रहे हैं  कि हमारे लोकतंत्र का भी  कुत्ता फेल हो गया है ?
   इसी तरह  कैंची चलाने का मतलब  सिर्फ कपड़ा  काटना नही  होता  है या नेताओं और टीवी एंकरों का जबान चलाना ही  नही होता है  । बचपन में  जब पांव सीट पर बैठकर पैडिल तक नही पहुँचते है तो सायकिल के त्रिभुजाकार फ्रेम में घुसकर तिरछे होकर सायकिल चलाने की कला को " कैंची चलाना " कहते हैं। 
 दरअसल सायकिल हम गरीबों की जिंदगी में इतना रची बसी है की उसके प्रतीकों को लेकर ही हम अपना वर्तमान गाहे बगाहे अचेतन में रचते रहते  हैं। 
    किसी तरह पैडिल तक पहुंच कर पांव मारते डगमगाते हुए हैंडिल को संभालने की कला देखिये आपको हर बच्चे में एक  जिमनास्ट नजर आएगा। डगमगाती हैंडल संभालकर डबल सवारी खीचने के रोमांच और पेट्रोल की ताकत से सड़क पर गाड़ी दौड़ाते आज के नवाबजादों के रोमांच में मेरे हिसाब से फर्क  शारीरिक श्रम का है जो सायकिल चलाने वालों को और बहुत कुछ सिखाता है, जिससे पेट्रोल की ताकत से दौड़ने वाले नवाबजादे वंचित रह जाते है, बेचारे  ।
  एक पांव पैडल पर रखकर सायकिल दौड़ाते हुए सीट पर चढ़ने की कोशिश में  बार बार गिरना  और चोट सहलाते हुए देखना  कि कोई परिचित देख तो नही रहा है ।  कैरियर में झोला दबा  कर स्कूल जाना और लौटते समय  पहिया पंचर होने पर भूख से ब्याकुल मन से छुट्टी होने की ख़ुशी का भक्क से उड़ जाना। आगे निकलते  साथियों का  घंटी बजा बजा कर चिढ़ाना । ऐसे बहुतेरे अविस्मरणीय पल सायकिल देती रही है, जिससे पन्नें रंगे जा सकते हैं और आप बिना पढ़े लाइक करके आगे बढ़ सकते हैं।
   गेंहू पिसाने की बोरी हो, खेत में ले जाने वाली खाद की बोरी हो या नजदीक की मंडी में बेचने के लिए ढोया जा रहा अनाज हो सायकिल  हमारे इतना काम आइ जितना इसको बनाने  वाले ने सपनें में भी नही सोचा होगा।  और हा जब किसी गरीब दलित घर का किशोर अपने घर की जिम्मेदारियों में अपना कंधा लगाना चाहा   तो सायकिल  मरम्मत का हुनर उसकी उम्मीद  बना।
 मेरे बाबा (दादा ) बीसवीं सदी की शुरुआती दहाई में पैदा हुए थे उन्होंने सायकिल को रईसों की सवारी से गरीबों की सवारी बनते देखा था , वो कभी-कभार सायकिल के बहु उपयोगी होने को उसकी प्रतिष्ठा का अपमान समझ कर आह भरा करते थे। 
सुनसान पगडण्डी हो या किसी बाजार का उपेक्षित कोना, सायकिल मरम्मत की दुकान से उसको कोई  किशोर  या कोई  अधेड़ अपने हुनर से गुलजार कर देता है । पहले सायकिल मरम्मत करने वाले मुफ्त में ही बच्चों की सायकिल में हवा भरा करते थे और ये मुफ्त का काम उनके प्रतिदिन के जीवन का जरूरी हिस्सा हुआ करता था, मेरी समझ में यही काम करके कितने समाजसेवी पुरस्कार लेने की लाइन में खड़े हो सकते हैं  या लॉबिंग कर सकते हैं लेकिन मैले कुचैले कपड़े और बिखरे बालों वालों के इस काम को कितने लोगों ने  सहृदयता से धन्यवाद देने लायक भी समझा है ?
   ए भाई जरा हैंडल ठीक कर दो , ए लड़के जरा ब्रेक टाइट कर दो, दिन में हिकारत से भरी गरजती आवाजें अँधेरा होते होते पंचर बनवाने के लिए रिरियाने लगती है  ।
   सायकिल तुम हमारे कितने चेहरों की गवाह रही हो। 

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

    अँधेरा होते होते सड़क पिपहरियों और बांसुरियों की धुन में मगन थी । गुब्बारों की विभिन्न आकृतियों को रगड़ने से निकलने वाली तीखी आवाज से भड़क कर जानवर अपनी  पगुरी रोक  करके खड़े हो गए थे । खरीददारी करके लौटी बेटियों के आँगन में पहुँचते ही तलाशी शुरू हो गयी थी । मूंगफली, रेवड़ी, सफेद बाल वाली मिठाई, चूड़ी, आलता, गृहस्थी का छोटा-मोटा सामान क्या नहीं था इन झोलियों में । मेले से लौटी किशोरियों के चहकने में  दुल्हनों को अपने नैहर का मेला याद आ रहा था, तो दरवाजे पर बैठे वयस्क गुब्बारे फोड़ते बच्चों को देखकर अपना बचपन याद कर रहे थे । कुछ कंधे पर बच्चों को लादे पान चुआते महंगाई का रोना रोते हुए वापस चले आ रहे थे तो कुछ बहुत दिनों बाद मिले परदेशियों से हालचाल कर रहे थे । मेला महीनों के इंतजार के बाद कब शुरू हुआ और कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला लेकिन गांव इस थोड़े से वक्त के लिए रेँड़ा पर आ रहे धान की प्यास को भूल गया था । 









डर लग रहा है ? इन लोगों ने नोबेल देकर तुमको उम्मीदों के एवरेस्ट पर खड़ा कर दिया है।  जहाँ से गिरने की त्रासदी बगदादियों की फौज को ज्यादे मारक हथियार मुहैया कराएगी , लेकिन तुम्हारे शिखर पर बने रहने तक शायद बगदादियों के खिलाफ खड़ी जमात को ऊर्जा मिलती रहे।  इसी आशा के साथ ……… शुभकामना।











मंगलवार, 9 सितंबर 2014


अगर फूट के न निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो …
अगर पैसे के लिए
शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो …
अगर लिख रहे हो
कि यह रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो …
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकीं हैं
तुम्हारी कौम से
मत बढ़ाओ इसे……
तुम्हे पूरे चाँद की  रात के भेड़िये सा
नही कर देता पागल या हत्यारा
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो … ( चार्ल्स बुकोस्की )
कैसा इत्तफाक है जब मैं एक पत्रिका में ये कविता पढ़ रहा था तभी गूगल बाबा ने याद दिलाया आज टालस्टाय का जन्मदिन है और  लगभग 20 साल पहले पढ़ी  युद्ध और शांति, अन्ना केरिनिन्ना की भूली बिसरी यादो को सहेजने लगा।  एक अहिंसक विश्व का स्वप्नदर्शी बिना लिखे कैसे एक मशाल बनता जिसमें  मानवता  अँधेरे में अपना रास्ता तलाशती।




जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...