कुत्ता, कैंची और सायकिल



 नेट पैक ख़त्म होने लगता है  तो सर्च करने वाला चक्र कभी इतना धीमे घूमता है जैसे उसकी बेयरिंग फूट गयी है  और  कभी निर्रथक इतना तेज चलता है जैसे उसका कुत्ता फेल हो गया है।
कुत्ता समझ रहें हैं न, अरे वो कुत्ता नही जिसकी जंजीर पकड़ कर सुसंकृत  लोग मॉर्निंग वाक करते हैं।
  एक कुत्ता सायकिल के धुर्री में होता है, जिसके फेल होने पर सिर्फ पैडिल ही घूमती है पहिया नही घूमता है।  कही आप ये तो नही समझने रहे हैं  कि हमारे लोकतंत्र का भी  कुत्ता फेल हो गया है ?
   इसी तरह  कैंची चलाने का मतलब  सिर्फ कपड़ा  काटना नही  होता  है या नेताओं और टीवी एंकरों का जबान चलाना ही  नही होता है  । बचपन में  जब पांव सीट पर बैठकर पैडिल तक नही पहुँचते है तो सायकिल के त्रिभुजाकार फ्रेम में घुसकर तिरछे होकर सायकिल चलाने की कला को " कैंची चलाना " कहते हैं। 
 दरअसल सायकिल हम गरीबों की जिंदगी में इतना रची बसी है की उसके प्रतीकों को लेकर ही हम अपना वर्तमान गाहे बगाहे अचेतन में रचते रहते  हैं। 
    किसी तरह पैडिल तक पहुंच कर पांव मारते डगमगाते हुए हैंडिल को संभालने की कला देखिये आपको हर बच्चे में एक  जिमनास्ट नजर आएगा। डगमगाती हैंडल संभालकर डबल सवारी खीचने के रोमांच और पेट्रोल की ताकत से सड़क पर गाड़ी दौड़ाते आज के नवाबजादों के रोमांच में मेरे हिसाब से फर्क  शारीरिक श्रम का है जो सायकिल चलाने वालों को और बहुत कुछ सिखाता है, जिससे पेट्रोल की ताकत से दौड़ने वाले नवाबजादे वंचित रह जाते है, बेचारे  ।
  एक पांव पैडल पर रखकर सायकिल दौड़ाते हुए सीट पर चढ़ने की कोशिश में  बार बार गिरना  और चोट सहलाते हुए देखना  कि कोई परिचित देख तो नही रहा है ।  कैरियर में झोला दबा  कर स्कूल जाना और लौटते समय  पहिया पंचर होने पर भूख से ब्याकुल मन से छुट्टी होने की ख़ुशी का भक्क से उड़ जाना। आगे निकलते  साथियों का  घंटी बजा बजा कर चिढ़ाना । ऐसे बहुतेरे अविस्मरणीय पल सायकिल देती रही है, जिससे पन्नें रंगे जा सकते हैं और आप बिना पढ़े लाइक करके आगे बढ़ सकते हैं।
   गेंहू पिसाने की बोरी हो, खेत में ले जाने वाली खाद की बोरी हो या नजदीक की मंडी में बेचने के लिए ढोया जा रहा अनाज हो सायकिल  हमारे इतना काम आइ जितना इसको बनाने  वाले ने सपनें में भी नही सोचा होगा।  और हा जब किसी गरीब दलित घर का किशोर अपने घर की जिम्मेदारियों में अपना कंधा लगाना चाहा   तो सायकिल  मरम्मत का हुनर उसकी उम्मीद  बना।
 मेरे बाबा (दादा ) बीसवीं सदी की शुरुआती दहाई में पैदा हुए थे उन्होंने सायकिल को रईसों की सवारी से गरीबों की सवारी बनते देखा था , वो कभी-कभार सायकिल के बहु उपयोगी होने को उसकी प्रतिष्ठा का अपमान समझ कर आह भरा करते थे। 
सुनसान पगडण्डी हो या किसी बाजार का उपेक्षित कोना, सायकिल मरम्मत की दुकान से उसको कोई  किशोर  या कोई  अधेड़ अपने हुनर से गुलजार कर देता है । पहले सायकिल मरम्मत करने वाले मुफ्त में ही बच्चों की सायकिल में हवा भरा करते थे और ये मुफ्त का काम उनके प्रतिदिन के जीवन का जरूरी हिस्सा हुआ करता था, मेरी समझ में यही काम करके कितने समाजसेवी पुरस्कार लेने की लाइन में खड़े हो सकते हैं  या लॉबिंग कर सकते हैं लेकिन मैले कुचैले कपड़े और बिखरे बालों वालों के इस काम को कितने लोगों ने  सहृदयता से धन्यवाद देने लायक भी समझा है ?
   ए भाई जरा हैंडल ठीक कर दो , ए लड़के जरा ब्रेक टाइट कर दो, दिन में हिकारत से भरी गरजती आवाजें अँधेरा होते होते पंचर बनवाने के लिए रिरियाने लगती है  ।
   सायकिल तुम हमारे कितने चेहरों की गवाह रही हो। 

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