कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को


  रेडियों पर एक पुराना फ़िल्मी गीत बज रहा था " कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को " किशोरावस्था में इस सुपर हिट फ़िल्मी गीत के बोल और रंजीता का मासूमियत भरा अभिनय देख सुन कर लगता था जमाना बस दो प्रेमियों के साथ खिलवाड़ कर रहा है और वो बस ऐसे ही गीत गाकर भीड़ से अपने  प्रेमी को बचा  लेगी।  इस गीत को देखने सुनने में कहीं भी संगेमार की भयावहता नही महसूस होती थी।  आज मध्यपूर्व की इस क्रूर परम्परा को जानसुनकर महसूस होता है कि बंबइया फिल्में क्रूरतम चीजों कों भी मांसल सौंदर्य में लपेट कर ऐसे परोसती हैं कि हम किसी कुप्रथा को भी बहुत सहजता से लेने लगते हैं , चाहे वो धार्मिक या जातीय  भेदभाव हो , दहेज प्रथा हो , आर्थिक विषमता हो या कोई और गंभीर समस्या। इसी प्रकार गैर हिंदी भाषी या नारी स्वतंत्रता, गंवई ब्यक्ति प्रायः इनके उपहास का पात्र होता है। दरअसल  तस्करी और कालेधन के बलपर बनने वाली अधिकांश फिल्मों  ने हमारी भाषा पर ऐसा प्रभाव डाला है कि हमने अपनी अगली पीढ़ियों के लिए तमाम  फर्जी नायक, महानायक या सदी नायक रच डाले  है। काले धन को सफेद करते ये फर्जी नायक या  महानायक अपनी इंड्रस्ट्री को भी इतना लूट लेते हैं कि इस इंड्रस्ट्री के छोटे मोटे  कर्मचारियों के  आवश्यक आवश्यकताओं  की पूर्ति भी नहीं हो पाती और हम इन भाँडो पर तालियां बजाकर नायकत्व का दर्जा देते रहते हैं।  समाज के इन धूर्त  नायकों के चरित्र की  निरंतर चीरफाड़ भी उतनी ही जरूरी  है, जितना राजनीति या जीवन के अन्य क्षेत्र के धूर्तों के लिए जरूरी  है । कुछ साथी सोच सकते हैं कि इनको गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है, उनसे मेरा निवेदन है कि आप इनको गंभीरता से लें या ना लें,आपकी  परिधि के बाहर इनको गंभीरता से लिया जाता है।


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