खेवली
पक्की सड़क छूटी, आबादी के बीच में से गुजर रहा खड़ंजा ठिठक गया तो कुछ पेड़ो के बीच से पगडण्डीनुमा रास्ते दिखाई दिए। खटोले पर बैठी एक महिला से पूछना पड़ा सुदामा पान्डे के घर का रास्ता कौन है। एहर से चल जा, उसके बताने की विशिष्टता पर गौर किया तो पाया हम एक दृष्टिहीन से रास्ता पूछ रहे हैं। मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे चचा ने संस्मरणों की पोटली खोली, एक बार गोदौलिया के पास एक गूंगा किसी को रास्ता बता रहा था, धूमिल बोले "देखिये न प्रकाश जी ये गूंगा अपने पूरे शरीर से बतिया रहा है"। ऐसे ही संस्मरणों को दुहराते हम कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे, जहां नन्दलाल मास्टर गांव के बच्चों के साथ दूसरे प्रजातंत्र की तलाश में लगे हुए। खेवली अभी भी धूमिल को याद कर रहा है, गांव के उनके समकालीन धूमिल के तेवर को अभी भी सहेजे हुए हैं। आशा करता हूँ वो दिन भी आएगा जब ९ नवंबर को हम नारा लगाएंगे " खेवली चलो ".

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