अगर फूट के न निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो …
अगर पैसे के लिए
शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो …
अगर लिख रहे हो
कि यह रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो …
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकीं हैं
तुम्हारी कौम से
मत बढ़ाओ इसे……
तुम्हे पूरे चाँद की  रात के भेड़िये सा
नही कर देता पागल या हत्यारा
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो … ( चार्ल्स बुकोस्की )
कैसा इत्तफाक है जब मैं एक पत्रिका में ये कविता पढ़ रहा था तभी गूगल बाबा ने याद दिलाया आज टालस्टाय का जन्मदिन है और  लगभग 20 साल पहले पढ़ी  युद्ध और शांति, अन्ना केरिनिन्ना की भूली बिसरी यादो को सहेजने लगा।  एक अहिंसक विश्व का स्वप्नदर्शी बिना लिखे कैसे एक मशाल बनता जिसमें  मानवता  अँधेरे में अपना रास्ता तलाशती।




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