शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

नया दिन


भोर  की  गुनगुनी ठंड गर्म चादर तलाश  रही थी।  सूरज की किरणें आँगन तक पहुंची तो सोया हुआ बचपन आँखे मींचते जागा  और रात के सुनहरे ख्वाबों को ढूढ़ने लगा। कुछ अधजली मोमबत्तियों और दगे हुए पटाखों की लुगदी में. जिन्दा बमों को ढूढ़ते  बच्चे दीपावली की रात में खर्च हो चुके उल्लास में से बची खुची खुशियाँ तलाश रहे थे।  मुंडेर पर उगी घास में टंगी झिलमिलाती ओस की बूंदे बुझे हुए दीपक को  चिढ़ा रहीं थी, नया दिन दस्तक दे चुका था।   


  

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