मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

आजादी के बाद अबतक के सफर में हमनें हो सकता है बहुत चमकदार शहर न बनाएँ हो ,बहुत चिकनी  सड़के बना पाने में सफलता न पाई हो  लेकिन हमने ऐसा बहुत कुछ बनाया है जो कुछ विकसित मुल्कों को छोड़कर बाकी के लिए अभी भी दुर्लभ हैं । हमारी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबध्दता, धर्मनिपरपेक्षता  और समावेशी विकासनीति पर चलने का प्रयास बहुतो के लिए एक आदर्श  है और  जब इनमें विचलन दिखाई देता है तो अपने अपने मुल्कों में इन मूल्यों को स्थापित करने के लिए लड़ रहे लोगों के लिये हताशा होती है । ऐसी ही हताशा पाकिस्तान की कवियत्री  फहमीदा रियाज की कविता में दिखायी देती है लेकिन लोकतंत्र हमें आश्वस्त करता है कि हम अपने जहाज़ को इन हिचकोलों से उबार लेंगे । 

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई 
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।

प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्‍टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !

तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी

होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्‍या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नजर न आयी?

कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा
उल्‍टे पाँव चलते जाना
ध्‍यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नजर जमाना

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना।
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया जमाना

एक जाप सा करते जाओ
बारंबार यही दोहराओ
'कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत'

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

30 जनवरी को "सरकारी गाँधी" की हत्या पर 2 मिनट का मौन रखने के बाद "आंदोलनकारी गाँधी" की शहादत पर आयोजित गोष्ठी में भाग लेने चला गया । विषय उसी सम्प्रदायकिता का था जिसने विभाजन में लाखों लोगों के खून से अपना कटोरा नही भर पाने के कारण गांधी की भी आहुति ली थी । शहर के विभिन्न लोगों को सुनकर,  सवाल की गम्भीरता पर चिंतामग्न घर लौटा । शाम को घर खाली था और मैं रिमोट का मालिक बन गया । एक चैनल पर फ़िल्म आ रही थी "नो -मेंस लैंड "। बोस्निया युद्ध पर ये बहुत अच्छी फ़िल्म है । फ़िल्म में एक सैनिक युद्धरत सेनाओं की मोर्चाबंदी  के बीच बारूदी सुरंग पर इस तरह फंस जाता है कि वो करवट भी ले तो बारूद उसके चीथड़े उड़ा सकती है । न्यूज़ चैनलों के दबाव में संयुक्त रास्ट्र संघ के टेक्नीशियन सुरंग पर से उस सैनिक को हटाने की कोशिस करते हैं लेकिन उनको जल्दी ही पता चल जाता है कि बारूदी सुरंग को हटाया जाना सम्भव नहीं है । एक उदास संगीत और ढलती शाम की पृष्ठभूमि में कैमरा उस विवश  सैनिक से  धीरे धीरे दूर होता चला जाता है । 
पता नहीं क्यों मुझे पूरा भारतीय उप महाद्वीप बारूदी सुरंग पर फंसे उस विवश सैनिक की तरह लगा । बगल में बैठे मित्र से बोला यार मानता हू ईश्वर बहुतेरे मनुष्यों की अवश्यकता है, लेकिन क्या वो धर्म से अपना पीछा छुड़ा नही सकता । मित्र ने हमेशा की तरह मेरी बुद्धि पर तरस खाकर ठहाका लगाया और बोला भाई धर्म तो उसी मेकेनिज्म का बाई प्रोडक्ट है जिससे ईश्वर बनता है । मैंने फिर संभावना प्रगट की कि अब तो बहुत सी कम्पनियां अपने हानिकारक बाई प्रोडक्ट से बचने की तकनीक विकसित कर रही हैं फिर सामाजिक क्षेत्र में ऐसी सम्भावना क्यों नहीं है । उसको मेरे प्रश्न में कुछ दम तो लगा लेकिन फिर मेरी सम्भावना को ख़ारिज करते हुए बोला, इसमें कोई तात्कालिक फायेदा तो है नही फिर कोई इसमें क्यों इन्वेस्ट करेगा । 
उदास मन से चैनल बदलने लगा तो खबर आ रही थी कि 84 ,गुजरात , मुरादाबाद के प्रेत अपनी अपनी कब्रों से निकलकर अपने अपने वार लार्डो की सेवा में पहुँच चुके हैं । मैं पूरी रात बिस्तर पर करवट नहीं बदल रहा था कि कही कोई बारूदी सुरंग न फट पड़े । पता नही ये डर सपना है या हकीकत, इसका जवाब तो सुबह ही दे सकती है । 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

   गांव में इस समय सिवान की हरियाली में  किसान के प्रतिस्पर्धियों ( नीलगायों, छुट्टा जानवरों ) के पीछे दौड़ लगाते चचा को  , रात भर खेत में  गेंहू की सिंचाई करके लौटे भइया को दुआर पर कंबल ओढ़े चाय सुड़कते देख कर किसान दिवस की बधाई देने जा रहा था कि प्रधान जी को मनरेगा का काम शुरू होने की हांक लगाते सुनकर ठिठक गया । पता चला फिर उसी चकरोड पर मिटटी फेंकी जायेगी जिसकी   मिट्टी पिछली बारिश में बह गई थी । प्रधान जी को मनरेगा में काम देने की मजबूरी है लेकिन काम की उपयोगिता नही है। सरकार ने मनरेगा का बजट २ लाख करोड़ रखा  है , इस योजना ने ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी सम्मानजनक ढंग से बढ़ाई है लेकिन सरकार तो बस 100 दिन की मजदूरी देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है बाकि दिवसों में सरकार की दर पर मजदूरी किसान दे रहे है।  जरा सोचिये सरकार इस योजना का बहुलांश औचित्यहीन  कार्यो पर खर्च कर रही है। अगर मनरेगा में जरा सा संशोधन करके इसको कृषि उत्पादन से जोड़ दिया जाय तो इससे किसानों को और ग्रामीण मजदूरों दोनों को राहत मिल सकती है बस इतना करना होगा कि किसान को इस योजना के अंतर्गत मजदूर उपलब्ध कराये जाय और किसान मजदूरी का आधा अंश ग्राम पंचायत के खाते में डाल दें। जो लोग मनरेगा की जमीनी हकीकत जानते हैं उनको भली भांति पता है कि काम देने कि मजबूरी में ग्राम पंचायते एक कार्य को कई बार करा रही हैं जिसके फलस्वरूप इसका बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च हो रहा है दूसरी तरफ किसान बढ़ी हुई लागत के कारण आर्थिक दुस्वारियां झेल रहें है।  इसलिए इस योजना को अगर किसान से जोड़ दिया जाय तो किसान को भी कुछ राहत मिल जायेगी और इसका बहुत अच्छा प्रभाव  कृषि उत्पादन पर भी पड़ेगा  जिससे  सरकार का भी मजदूरी का कुछ अंश बचेगा।किसान दिवस की शुभकामना के साथ  नक्कारखाने में अपनी तूती अदम साहब को याद करके बंद कर रहा हू -
 वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है 

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का 
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले 
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है 

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी 
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

इस समय कि राजनैतिक आपाधापी में विक्टर ह्यूगो के लेस मिजरेबल का छोटा सा अंश उद्धृत कर रहा हू।  यह महान लेखक 1840 के आसपास फ़्रांस के राजनैतिक ऊथल पुथल कि कितनी सटीक ब्याख्या कर रहा है, और समय कि धूल ने आजतक इसकी  प्रासंगिकता की चमक को जरा भी धुंधला नहीं किया  है।          
------ईश्वर अपनी इक्छा घटनाओं से व्यक्त करता है, रहष्यमय भाषा में लिखा एक अश्पस्पट पाठ। लोग उसका तत्काल अनुवाद करने लग जाते हैं। गलत शासन, पूर्व भ्रांतियों से भरपूर बहुत थोड़े लोग दैवी भाषा समझ पाते हैं। सबसे दूरदर्शी, सबसे गहरे लोग, धीरे धीरे समझ पाते हैं और जबतक उनका पाठ तैयार हो जरूरत ख़त्म हो चुकी होती है।  बीसों अनुवाद चौराहे पर खड़े हैं। हर से एक पार्टी जन्मती है ---जो अपने को ही मठ समझती है, हर गुट समझता है कि वही एकमात्र प्रकाशवान है। --------

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम ।
पिछले वर्ष के अंत में इसी कविता को उद्धृत करते हुए मै काफी निराश था।  आज निराश नहीं हू लेकिन  बहुत से अम्बेडकरवादी मित्रों , मार्क्सवादी मित्रों की तरह मै भी आशंकित अवश्य हू कि विभिन्न  ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राजनैतिक लाइन स्पष्ट किये बिना " आप " कहां तक जा पायेगा। दरअसल दुनिया के जिस खित्ते में हम रहते है उसके आसपास एकाध को छोड़कर बाकी जगहो पर बर्बर सत्तातंत्र है उनको आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे दिल्ली की सुल्तान सहजता से एक आम आदमी की जीत को स्वीकार करके पद त्याग रही है, कैसे जनता एक आम आदमी को स्वीकार कर ले रही है जिसके पास न अथाह पूंजी है न लुटेरों का गिरोह।
       जिनको जनतंत्र में यकीन है उनको दिल्ली के परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और जनतंत्र को सैल्यूट करना चाहिए, लेकिन इस जनतंत्र पर सवार होकर दिल्ली की बादशाहत के लिए एक मध्युगीन योद्धा के काफिले की धमक भी सुनाई दे रही है,उसका क्या होगा ?
              इस सवाल को भी जनतंत्र के उसूलों से ही हल करना पड़ेगा।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गेंहू

  यह तो नही कहूंगा कि उस दौर में होश सम्भाला था, जब गेंहू " खास " हुआ करता   था, लेकिन  जब गेंहू   खास हुआ करता  था, उस दौर के लोगो  की गोंद  में पला और गेंहू के "आम " होने की कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ हू । मेरे इलाके के भूगोल में सिंचाई का पानी हमेशा से दुर्लभ रहा है , चाहे वो ढेंकुल या रहट का जमाना रहा हो या आज के ट्यूबवेल का  जमाना रहा  हो।  गेंहू को जौ के मुकाबले  पानी जादा  पसन्द है । एक-दो ट्यूबवेल जरुर सरकार ने लगवा दिए थे लेकिन ढेकुल,रहट ,दोन  आदि ही गेंहू पैदा करने के लिए सिंचाई का मुख्य श्रोत था ।  सिंचाई के अभाव में सूखती  गेंहू की  फसल  के मोह में कितनी बार लाठियां चली और रिश्ते बने बिगड़े।  जिनके पास सिंचाई का साधन हो गया उनकी ठाकुर सुहाती करने वालों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा इसी में बीतता था । 
  आजादी के बिहान से  गेंहू का प्रताप बढ़ना शुरू हुआ और धीरे - धीरे   जौ के दिन पूरे हुए। तब मेहमानों के आने पर बच्चों में खुशियाँ तैर जाती थी कि" आज गेंहू के आटे से बनी रोटी या पूड़ी मिलेगी "। सरकारी लोंगो की सिफारिश पर गेंहू उगाने का प्रयास प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही  शुरू हुआ।  किसानों के  किसी भी नई चीज के प्रति संदेह के सदियों पुराने रोग ने इस फसल के प्रचलित  होने में कुछ समय जरुर लिया लेकिन गेंहू से बनी  रोटी और  अन्य ब्यंजनों  ने शीघ्र ही सबको अपना मुरीद बना लिया। 
  गेंहू किसान की बहुत कठिन परीक्षा लेता रहा है । जब शहरी समाज आराम से रजाई में सोता है तो बिजली विभाग की मेहरबानी से  किसान गेंहू की प्यास बुझाने के लिए  दिसम्बर, जनवरी के जाड़े की ठिठुरती रातों में खेत के मेड़ पर खड़े रहते है कि कही पानी मेड़ तोड़कर कही और न निकल जाय, क्योंकि पानी तो अपने स्वभाव से लाचार होता है उसको क्या मतलब कि कोई उसकी अगवानी में खड़े खड़े ठिठुर रहा है, उसको जब जिधर मौका मिलेगा बह निकलेगा। जब ये फसल पक कर तैयार होती है तब चिलचिलाती धूप में उसकी कटाई और दंवाई का अनुभव जिनको नही है वो इस कार्य की कठिनाई को समझ ही नहीं सकता। पकी फसल से दाना निकालने की तकनीक के विकास ने इसके कठोर परिश्रम को कम कर दिया है नहीं तो लगभग पूरी गर्मी और बरसात की पहली फुहारों तक किसान भूसा और दाना में ही उलझे रहते थे। वस्तुतः गेंहू जेठ की दोपहरी में किसान के बदन पर चुहचुहाता पसीना है । गेंहू किसान की बहुत कठोर परीक्षा लेता है तब कही जाकर उसके ब्यंजनों की  खुशबू से हमारी रसोइ महकती है ।
  

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

१२ नवम्बर की शाम को प्रोफ़ेसर लालबहादुर वर्मा से  आदमी के बायोलॉजिकल मैन से कल्चरल मैन के रूप में विकसित होने की अवधारणा को सुना । आज सुबह  सोच रहा था कि कल्चरल मैन सम्भवतः  प्रकृत का बाई प्रोडक्ट है और ये बाई प्रोडक्ट इस स्थिित में आ रहा है की प्रकृत को अपना प्रोडक्ट बना ले । यह मनुष्य के लिए समग्रता में शुभ   होगा या अशुभ  होगा यह तो  भविष्य बतायेगा लेकिन  शुभ  की  कामना ।  

-चश्मा-

 लोरियों नें सपने पिरोना बन्द किया,
तो दादी ने डराना शुरू किया ,
चुड़ैलों से,प्रेतों से, विधर्मियों से........
रुआँसी माँ ,
मेरी शरारतों को ,
निम्नजातीय गुण होनें का,
उलाहना देने लगी ,
चाचियों ने ,
पड़ोसियों द्वारा पुरखों की जमीन,
हड़प लेने की कहानी सुनाई ,
दादा के पास स्वधर्म श्रेस्ठता का बखान था,
पिता के पास अन्य जातियों की बुराइयों का विश्वकोष,
चाचा से जाना एटम बम के बिना,
कितने कमजोर थे हम,
विद्यालय ने उपनाम से,
मेरी योग्यता का मूल्यांकन किया,
और इस तरह से बना,
दुनिया को देखने का मेरा चश्मा । 
मेरा प्यार अपने घर, जाति तथा धर्म  की,
चहारदीवारी में ही अट जाता है,
शेष के लिए बस अपनी जरूरत भर,
बट जाता है । 
कमजोर विजातीय को ,
अपनी श्रेस्ठता के डंक से तिलमिला देता हू,
और कभी किसी अकेले को ,
चलती ट्रेन में फेकने  का मजा लेता हू ।
लेकिन ……
ऐसा भी हो सकता था ,
दादी बताती,
कैसे सुनसान रास्ते पर दादा को,
रहजनों से एक विधर्मी ने बचाया था।
माँ बताती मेरे जन्मोपरांत,
पड़ोसियों ने महीनों तक,
अपनी गाय का दूध पिलाया था।
दादा बताते,
हम श्रेस्ठ हैं लेकिन सर्वश्रेस्ठ नहीं।
पिता के पास,
अन्य जातियों की योग्यता का ज्ञान होता,
और चाचा बताते कि एटम बम से जरूरी ,
बिजली का वो तार है,
जो वर्षो से खम्भे पर नही लगा है।
तब मेरे चश्मे का नंबर दूसरा होता ,
तब शायद मानवता के आंसुओ का ,
खारापन कुछ कम होता।
दरअसल बाग में,
फूल भी थे और कांटे भी ,
मगर मालियों ने,
मेरे जेहन को कांटो से,
ज्यादा पिरोया था। 

सोमवार, 25 नवंबर 2013

  कोरौत घाट और  पिसौर घाट पर बन रहे पुल तमाम राजनैतिक आग्रहों और दुराग्रहों के बीच दशकों से झूल रहें है । हमारे क्षेत्र से वरुणा नदी पार करके वाराणसी शहर से जौनपुर या लखनऊ   जाने  वाले रास्तों पर पहुचना या वाया शिवपुर कचहरी जाना सदैव दुष्कर रहा है ।  मामाजी स्व ० मारकंडे सिंह ( bhu छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ) ने  अस्सी के दशक में कई मीटिंगे करके इस  मुद्दे को ज्वलंत बनाने का प्रयास किया था । उनके तब के साथियों में से अब कुछ बड़े नेता हो गये होंगे, लेकिन पुल अभी भी विक्रम का बैताल ही बना हुआ है । जो सत्ता में नही रहता है उसको हमारे क्षेत्र के इस पुल की याद आ जाती है । मित्र अनिल सिंह और कुछ साथियों  ने भी पिछले वर्षों अख़बार के माध्यम से इन पुलों को पूरा करने के लिय़े जनजागरण का बहुत प्रयास किया, जनता तो जगी लेकिन ब्यवस्था अपने  हुकमरानो के नफे नुकसान का आंकलन करके सोती ही रही ।  इससे जुड़ी एक घटना साझा करना चाहता हू ।
 हमारे गांव के  कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय  अक्सर रात हो जाती थी ।  एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और  नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार  जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई ।  अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया  ।  बदन के कपड़े उतार  कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों  जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था  कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान  बचाने का संघर्ष था लेकिन  सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की  लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है ।   मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले   बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर   लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो  रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको  देखकर  घबड़ा गये तुरंत अपना शाल  और  साईकिल दिए घर जाने के लिए  ।
    ये दोनों घाट ऐसी कितनी ही ज्ञात अज्ञात  घटनाओं और दुर्घटनाओं  के साक्षी रहें हैं, लेकिन  इन घाटो पर बनने वाले  पुल किसी बड़े राजनैतिक नफे नुकसान से नही जुड़े है ।  इन पुलो के चालू हो जाने पर जौनपुर से इलाहाबाद का अधिकतर ट्रैफिक  कैंट स्टेशन पर जाम नही लगाएगा और काफी समय और  ईंधन भी  बचाएगा ।इन पुलों के बनने में जो थोड़ी  बहुत तेजी दिखाई दे रही है। वो वाराणसी महानगर की जरुरतो की वजह से है हमारे गांव गिरांव की जरूरतों  के कारण नहीं हैं । 

रविवार, 17 नवंबर 2013

अख़बार के छठे या ऐसे ही किसी पन्ने पर तीन या चार लाइनों में छोटी सी खबर छपी थी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी नही रहे ।  हालांकि रात में ही पता चल गया था लेकिन सुबह उनके बारे में कुछ विशेष जानने की अपेक्षा थी, अख़बार के माध्यम से । कैसे हुआ , क्या हुआ था , परिवार में और कौन कौन है लेकिन कुछ नही छपा था । मैंने उनको १०-१५ साल पहले जाना था जूठन के माध्यम से । उनकी मध्यवय में लिखी गई आत्मकथा, पुरे भंगी समाज का आख्यान है । अपने इर्द गिर्द के इस समाज को, इसकी सहनशीलता को , इसकी बहादुरी को और अपनी चेतना में बसे सवर्ण को  मैं वाल्मीकि जी के माध्यम से ही जान पाया ।इस आत्मकथा का शीर्षक स्व ० राजेन्द्र यादव जी ने ही वाल्मीकि जी को सुझाया था, लगता है हंस अपने समूह के साथ ही  प्रयाण करते है ।   

बुधवार, 1 मई 2013

- गिद्ध-


अर्द्ध निर्मित पलस्तर विहीन,
मकान के सामने,
लाल,नीली,पीली बत्तियो वाले,
कैमरा चमकाते गिद्धों को,
देखते ही,
टोला जुट जाता है ।
घर के भीतर से,
निकलती घुटी-घुटी चीख,
खेलते हुए,
धूल-धूसरित बच्चों को,
स्तब्ध कर देती है।
छिलंगी दार खटिया में पड़ा,
कथरी में लिपटा झुर्रीदार चेहरा,
चश्मा पोछतें हुए  नवागन्तुको  को,
पहचानने  की कोशिश करता है,
फिर सिरहाने से,
भूमि नीलामी की पर्ची दिखाकर,
बिलखने लगता है ।
गिद्ध ........पर्ची लेकर,
भीड़ में इस हादसे की ,
अगली संभावना निहारते है ।
जब वो फिर पंख फड फड़ाते हुए,
इस  महाश्मसान के,
आसमान में चक्कर लगायेंगे,
आपस में खूब चीखेंगे-चिल्लाएंगे ।
कल की संभावना से पुलकित,
बहुत उदास दिख रहें है, गिद्ध ।


जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...