गांव में इस समय सिवान की हरियाली में किसान के प्रतिस्पर्धियों ( नीलगायों, छुट्टा जानवरों ) के पीछे दौड़ लगाते चचा को , रात भर खेत में गेंहू की सिंचाई करके लौटे भइया को दुआर पर कंबल ओढ़े चाय सुड़कते देख कर किसान दिवस की बधाई देने जा रहा था कि प्रधान जी को मनरेगा का काम शुरू होने की हांक लगाते सुनकर ठिठक गया । पता चला फिर उसी चकरोड पर मिटटी फेंकी जायेगी जिसकी मिट्टी पिछली बारिश में बह गई थी । प्रधान जी को मनरेगा में काम देने की मजबूरी है लेकिन काम की उपयोगिता नही है। सरकार ने मनरेगा का बजट २ लाख करोड़ रखा है , इस योजना ने ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी सम्मानजनक ढंग से बढ़ाई है लेकिन सरकार तो बस 100 दिन की मजदूरी देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है बाकि दिवसों में सरकार की दर पर मजदूरी किसान दे रहे है। जरा सोचिये सरकार इस योजना का बहुलांश औचित्यहीन कार्यो पर खर्च कर रही है। अगर मनरेगा में जरा सा संशोधन करके इसको कृषि उत्पादन से जोड़ दिया जाय तो इससे किसानों को और ग्रामीण मजदूरों दोनों को राहत मिल सकती है बस इतना करना होगा कि किसान को इस योजना के अंतर्गत मजदूर उपलब्ध कराये जाय और किसान मजदूरी का आधा अंश ग्राम पंचायत के खाते में डाल दें। जो लोग मनरेगा की जमीनी हकीकत जानते हैं उनको भली भांति पता है कि काम देने कि मजबूरी में ग्राम पंचायते एक कार्य को कई बार करा रही हैं जिसके फलस्वरूप इसका बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च हो रहा है दूसरी तरफ किसान बढ़ी हुई लागत के कारण आर्थिक दुस्वारियां झेल रहें है। इसलिए इस योजना को अगर किसान से जोड़ दिया जाय तो किसान को भी कुछ राहत मिल जायेगी और इसका बहुत अच्छा प्रभाव कृषि उत्पादन पर भी पड़ेगा जिससे सरकार का भी मजदूरी का कुछ अंश बचेगा।किसान दिवस की शुभकामना के साथ नक्कारखाने में अपनी तूती अदम साहब को याद करके बंद कर रहा हू -
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है


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