गेंहू

  यह तो नही कहूंगा कि उस दौर में होश सम्भाला था, जब गेंहू " खास " हुआ करता   था, लेकिन  जब गेंहू   खास हुआ करता  था, उस दौर के लोगो  की गोंद  में पला और गेंहू के "आम " होने की कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ हू । मेरे इलाके के भूगोल में सिंचाई का पानी हमेशा से दुर्लभ रहा है , चाहे वो ढेंकुल या रहट का जमाना रहा हो या आज के ट्यूबवेल का  जमाना रहा  हो।  गेंहू को जौ के मुकाबले  पानी जादा  पसन्द है । एक-दो ट्यूबवेल जरुर सरकार ने लगवा दिए थे लेकिन ढेकुल,रहट ,दोन  आदि ही गेंहू पैदा करने के लिए सिंचाई का मुख्य श्रोत था ।  सिंचाई के अभाव में सूखती  गेंहू की  फसल  के मोह में कितनी बार लाठियां चली और रिश्ते बने बिगड़े।  जिनके पास सिंचाई का साधन हो गया उनकी ठाकुर सुहाती करने वालों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा इसी में बीतता था । 
  आजादी के बिहान से  गेंहू का प्रताप बढ़ना शुरू हुआ और धीरे - धीरे   जौ के दिन पूरे हुए। तब मेहमानों के आने पर बच्चों में खुशियाँ तैर जाती थी कि" आज गेंहू के आटे से बनी रोटी या पूड़ी मिलेगी "। सरकारी लोंगो की सिफारिश पर गेंहू उगाने का प्रयास प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही  शुरू हुआ।  किसानों के  किसी भी नई चीज के प्रति संदेह के सदियों पुराने रोग ने इस फसल के प्रचलित  होने में कुछ समय जरुर लिया लेकिन गेंहू से बनी  रोटी और  अन्य ब्यंजनों  ने शीघ्र ही सबको अपना मुरीद बना लिया। 
  गेंहू किसान की बहुत कठिन परीक्षा लेता रहा है । जब शहरी समाज आराम से रजाई में सोता है तो बिजली विभाग की मेहरबानी से  किसान गेंहू की प्यास बुझाने के लिए  दिसम्बर, जनवरी के जाड़े की ठिठुरती रातों में खेत के मेड़ पर खड़े रहते है कि कही पानी मेड़ तोड़कर कही और न निकल जाय, क्योंकि पानी तो अपने स्वभाव से लाचार होता है उसको क्या मतलब कि कोई उसकी अगवानी में खड़े खड़े ठिठुर रहा है, उसको जब जिधर मौका मिलेगा बह निकलेगा। जब ये फसल पक कर तैयार होती है तब चिलचिलाती धूप में उसकी कटाई और दंवाई का अनुभव जिनको नही है वो इस कार्य की कठिनाई को समझ ही नहीं सकता। पकी फसल से दाना निकालने की तकनीक के विकास ने इसके कठोर परिश्रम को कम कर दिया है नहीं तो लगभग पूरी गर्मी और बरसात की पहली फुहारों तक किसान भूसा और दाना में ही उलझे रहते थे। वस्तुतः गेंहू जेठ की दोपहरी में किसान के बदन पर चुहचुहाता पसीना है । गेंहू किसान की बहुत कठोर परीक्षा लेता है तब कही जाकर उसके ब्यंजनों की  खुशबू से हमारी रसोइ महकती है ।
  

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