आजादी के बाद अबतक के सफर में हमनें हो सकता है बहुत चमकदार शहर न बनाएँ हो ,बहुत चिकनी सड़के बना पाने में सफलता न पाई हो लेकिन हमने ऐसा बहुत कुछ बनाया है जो कुछ विकसित मुल्कों को छोड़कर बाकी के लिए अभी भी दुर्लभ हैं । हमारी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबध्दता, धर्मनिपरपेक्षता और समावेशी विकासनीति पर चलने का प्रयास बहुतो के लिए एक आदर्श है और जब इनमें विचलन दिखाई देता है तो अपने अपने मुल्कों में इन मूल्यों को स्थापित करने के लिए लड़ रहे लोगों के लिये हताशा होती है । ऐसी ही हताशा पाकिस्तान की कवियत्री फहमीदा रियाज की कविता में दिखायी देती है लेकिन लोकतंत्र हमें आश्वस्त करता है कि हम अपने जहाज़ को इन हिचकोलों से उबार लेंगे ।
नया भारत
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !
तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नजर न आयी?
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पाँव चलते जाना
ध्यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नजर जमाना
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना।
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया जमाना
एक जाप सा करते जाओ
बारंबार यही दोहराओ
'कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत'
फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें