-चश्मा-

 लोरियों नें सपने पिरोना बन्द किया,
तो दादी ने डराना शुरू किया ,
चुड़ैलों से,प्रेतों से, विधर्मियों से........
रुआँसी माँ ,
मेरी शरारतों को ,
निम्नजातीय गुण होनें का,
उलाहना देने लगी ,
चाचियों ने ,
पड़ोसियों द्वारा पुरखों की जमीन,
हड़प लेने की कहानी सुनाई ,
दादा के पास स्वधर्म श्रेस्ठता का बखान था,
पिता के पास अन्य जातियों की बुराइयों का विश्वकोष,
चाचा से जाना एटम बम के बिना,
कितने कमजोर थे हम,
विद्यालय ने उपनाम से,
मेरी योग्यता का मूल्यांकन किया,
और इस तरह से बना,
दुनिया को देखने का मेरा चश्मा । 
मेरा प्यार अपने घर, जाति तथा धर्म  की,
चहारदीवारी में ही अट जाता है,
शेष के लिए बस अपनी जरूरत भर,
बट जाता है । 
कमजोर विजातीय को ,
अपनी श्रेस्ठता के डंक से तिलमिला देता हू,
और कभी किसी अकेले को ,
चलती ट्रेन में फेकने  का मजा लेता हू ।
लेकिन ……
ऐसा भी हो सकता था ,
दादी बताती,
कैसे सुनसान रास्ते पर दादा को,
रहजनों से एक विधर्मी ने बचाया था।
माँ बताती मेरे जन्मोपरांत,
पड़ोसियों ने महीनों तक,
अपनी गाय का दूध पिलाया था।
दादा बताते,
हम श्रेस्ठ हैं लेकिन सर्वश्रेस्ठ नहीं।
पिता के पास,
अन्य जातियों की योग्यता का ज्ञान होता,
और चाचा बताते कि एटम बम से जरूरी ,
बिजली का वो तार है,
जो वर्षो से खम्भे पर नही लगा है।
तब मेरे चश्मे का नंबर दूसरा होता ,
तब शायद मानवता के आंसुओ का ,
खारापन कुछ कम होता।
दरअसल बाग में,
फूल भी थे और कांटे भी ,
मगर मालियों ने,
मेरे जेहन को कांटो से,
ज्यादा पिरोया था। 

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