सोमवार, 9 दिसंबर 2013

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम ।
पिछले वर्ष के अंत में इसी कविता को उद्धृत करते हुए मै काफी निराश था।  आज निराश नहीं हू लेकिन  बहुत से अम्बेडकरवादी मित्रों , मार्क्सवादी मित्रों की तरह मै भी आशंकित अवश्य हू कि विभिन्न  ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राजनैतिक लाइन स्पष्ट किये बिना " आप " कहां तक जा पायेगा। दरअसल दुनिया के जिस खित्ते में हम रहते है उसके आसपास एकाध को छोड़कर बाकी जगहो पर बर्बर सत्तातंत्र है उनको आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे दिल्ली की सुल्तान सहजता से एक आम आदमी की जीत को स्वीकार करके पद त्याग रही है, कैसे जनता एक आम आदमी को स्वीकार कर ले रही है जिसके पास न अथाह पूंजी है न लुटेरों का गिरोह।
       जिनको जनतंत्र में यकीन है उनको दिल्ली के परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और जनतंत्र को सैल्यूट करना चाहिए, लेकिन इस जनतंत्र पर सवार होकर दिल्ली की बादशाहत के लिए एक मध्युगीन योद्धा के काफिले की धमक भी सुनाई दे रही है,उसका क्या होगा ?
              इस सवाल को भी जनतंत्र के उसूलों से ही हल करना पड़ेगा।

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