कोरौत घाट और  पिसौर घाट पर बन रहे पुल तमाम राजनैतिक आग्रहों और दुराग्रहों के बीच दशकों से झूल रहें है । हमारे क्षेत्र से वरुणा नदी पार करके वाराणसी शहर से जौनपुर या लखनऊ   जाने  वाले रास्तों पर पहुचना या वाया शिवपुर कचहरी जाना सदैव दुष्कर रहा है ।  मामाजी स्व ० मारकंडे सिंह ( bhu छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ) ने  अस्सी के दशक में कई मीटिंगे करके इस  मुद्दे को ज्वलंत बनाने का प्रयास किया था । उनके तब के साथियों में से अब कुछ बड़े नेता हो गये होंगे, लेकिन पुल अभी भी विक्रम का बैताल ही बना हुआ है । जो सत्ता में नही रहता है उसको हमारे क्षेत्र के इस पुल की याद आ जाती है । मित्र अनिल सिंह और कुछ साथियों  ने भी पिछले वर्षों अख़बार के माध्यम से इन पुलों को पूरा करने के लिय़े जनजागरण का बहुत प्रयास किया, जनता तो जगी लेकिन ब्यवस्था अपने  हुकमरानो के नफे नुकसान का आंकलन करके सोती ही रही ।  इससे जुड़ी एक घटना साझा करना चाहता हू ।
 हमारे गांव के  कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय  अक्सर रात हो जाती थी ।  एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और  नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार  जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई ।  अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया  ।  बदन के कपड़े उतार  कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों  जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था  कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान  बचाने का संघर्ष था लेकिन  सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की  लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है ।   मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले   बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर   लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो  रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको  देखकर  घबड़ा गये तुरंत अपना शाल  और  साईकिल दिए घर जाने के लिए  ।
    ये दोनों घाट ऐसी कितनी ही ज्ञात अज्ञात  घटनाओं और दुर्घटनाओं  के साक्षी रहें हैं, लेकिन  इन घाटो पर बनने वाले  पुल किसी बड़े राजनैतिक नफे नुकसान से नही जुड़े है ।  इन पुलो के चालू हो जाने पर जौनपुर से इलाहाबाद का अधिकतर ट्रैफिक  कैंट स्टेशन पर जाम नही लगाएगा और काफी समय और  ईंधन भी  बचाएगा ।इन पुलों के बनने में जो थोड़ी  बहुत तेजी दिखाई दे रही है। वो वाराणसी महानगर की जरुरतो की वजह से है हमारे गांव गिरांव की जरूरतों  के कारण नहीं हैं । 

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