इस समय कि राजनैतिक आपाधापी में विक्टर ह्यूगो के लेस मिजरेबल का छोटा सा अंश उद्धृत कर रहा हू। यह महान लेखक 1840 के आसपास फ़्रांस के राजनैतिक ऊथल पुथल कि कितनी सटीक ब्याख्या कर रहा है, और समय कि धूल ने आजतक इसकी प्रासंगिकता की चमक को जरा भी धुंधला नहीं किया है।
------ईश्वर अपनी इक्छा घटनाओं से व्यक्त करता है, रहष्यमय भाषा में लिखा एक अश्पस्पट पाठ। लोग उसका तत्काल अनुवाद करने लग जाते हैं। गलत शासन, पूर्व भ्रांतियों से भरपूर बहुत थोड़े लोग दैवी भाषा समझ पाते हैं। सबसे दूरदर्शी, सबसे गहरे लोग, धीरे धीरे समझ पाते हैं और जबतक उनका पाठ तैयार हो जरूरत ख़त्म हो चुकी होती है। बीसों अनुवाद चौराहे पर खड़े हैं। हर से एक पार्टी जन्मती है ---जो अपने को ही मठ समझती है, हर गुट समझता है कि वही एकमात्र प्रकाशवान है। --------
------ईश्वर अपनी इक्छा घटनाओं से व्यक्त करता है, रहष्यमय भाषा में लिखा एक अश्पस्पट पाठ। लोग उसका तत्काल अनुवाद करने लग जाते हैं। गलत शासन, पूर्व भ्रांतियों से भरपूर बहुत थोड़े लोग दैवी भाषा समझ पाते हैं। सबसे दूरदर्शी, सबसे गहरे लोग, धीरे धीरे समझ पाते हैं और जबतक उनका पाठ तैयार हो जरूरत ख़त्म हो चुकी होती है। बीसों अनुवाद चौराहे पर खड़े हैं। हर से एक पार्टी जन्मती है ---जो अपने को ही मठ समझती है, हर गुट समझता है कि वही एकमात्र प्रकाशवान है। --------

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