रविवार, 17 नवंबर 2013

अख़बार के छठे या ऐसे ही किसी पन्ने पर तीन या चार लाइनों में छोटी सी खबर छपी थी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी नही रहे ।  हालांकि रात में ही पता चल गया था लेकिन सुबह उनके बारे में कुछ विशेष जानने की अपेक्षा थी, अख़बार के माध्यम से । कैसे हुआ , क्या हुआ था , परिवार में और कौन कौन है लेकिन कुछ नही छपा था । मैंने उनको १०-१५ साल पहले जाना था जूठन के माध्यम से । उनकी मध्यवय में लिखी गई आत्मकथा, पुरे भंगी समाज का आख्यान है । अपने इर्द गिर्द के इस समाज को, इसकी सहनशीलता को , इसकी बहादुरी को और अपनी चेतना में बसे सवर्ण को  मैं वाल्मीकि जी के माध्यम से ही जान पाया ।इस आत्मकथा का शीर्षक स्व ० राजेन्द्र यादव जी ने ही वाल्मीकि जी को सुझाया था, लगता है हंस अपने समूह के साथ ही  प्रयाण करते है ।   

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