रविवार, 9 दिसंबर 2018

मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा भाग-5








फीनिक्स सेटलमेन्ट-डरबन के उत्तर-पश्चिम मे महात्मा गांधी द्वारा स्थापित फीनिक्स आश्रम अपने इर्दगिर्द की जुलू आबादी से घिरा हुआ है। आश्रम को जी0पी0एस0 खोज नही पा रहा था तो हमने एक जुलू महिला का सहारा लिया और उसने खुशी-खुशी आश्रम तक पहुंचाया और कुछ रैण्ड का मेहनताना लेकर प्रसन्न हो गयीं । एक अश्वेत अपरिचित महिला को इस तरह से गाड़ी मे बैठाने की चर्चा होने पर विनय के सहकर्मियों ने इसे दुस्साहस कहा और भविष्य मे इससे बचने की सलाह दी, इससे पता चलता है कि भारतीयों और अश्वेत समुदाय के बीच अविश्वास की कितनी गहरी खाई है । इस आश्रम की देखभाल बहुत व्यवस्थित तरीके से हो रही है। परिसर मे लगे फलदार वृक्षों पर लदे फलांे ने सहयात्री श्रीमती शिवा के बचपने को जाग्रत कर दिया और उस परिसर की देखभाल करने वाले की ईमानदारी का भी एहसास हुआ । जूलू आबादी से घिरा परिसर जिस तरह से सुरक्षित और साफ सुथरा है, यह उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसे स्थानों पर हमारे जैसे भारतीय ही कभी-कभार आते है। इस स्थल पर आनंे पर हमे टिन की छतो से बने छोटे-छोटे लेकिन साफ-सुथरे मकान और सड़को के किनारे आपस मे सुख-दुख बांटती महिलाएं दिखीं ।
मण्डेला कैप्चर साइट- डरबन से जोहान्सबर्ग लौटते समय हम डरबन से लगभग 100 कि0मी0 दूर मण्डेला कैप्चर साइट देखने पहुंचे । यहां पर मण्डेला को गोरी सरकार ने काफी लम्बी अवधि तक कैद मे रखा था । अब इस जगह को म्युजियम मे बदलने का कार्य चल रहा है।  म्यूजिम का मुख्य भवन निर्माणाधीन है, अभी एक अस्थाई भवन मे रंगभेद कालीन अफ्रीका मे अश्वेतों के संघर्ष की चित्र प्रर्दशनी, फिल्मे दिखाई जाती हैं । यह जेल काफी वीराने मे बनायी गयी है, जिसके दूर-दूर तक मानव बस्ती नही दिखी। यहां पर सबसे आर्कषक नेल्सन मण्डेला अनेक लोहे की छड़ों से बनायी गयी विशाल मुखाकृति है, जो एक खास दूरी से देखने पर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगती है। दूर-दूर तक निर्जन पहाड़ियों के बीच बने इस म्यूजियम मे नेल्सन मण्डेला का यह विशाल लौह मूर्ति शिल्प इन निर्जन पहाड़ियों को निहारता हुआ इस महादेश की निगहबानी करता प्रतीत होता है। मण्डेला को इसी  जगह पर 5 अगस्त,1962 को रंगभेदी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था, जहां से उनके  27 वर्षो लम्बी कैद की शुरुआत हुई । इस जगह पर गिरफ्तारी की  50वीं वर्षगांठ पर  50 स्टील के खम्भों से यह मूर्तिशिल्प बनाया गया है।
पीटरमेरित्सबर्ग रेलवे स्टेशन- बैरिस्टर गांधी को राजनेता गांधी की दीक्षा इसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर मिली थी । भारतवंशियों के दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार होने मे इस रेलवे स्टेशन का इतना महत्वपूर्ण स्थान है कि भारत से आने वाले अधिकांश अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियो ने प्रायः इस प्लेटफार्म पर खड़े होकर उस क्षण को महसूस करने की कोशिश की है । वर्तमान भारतीय प्रधान मंत्री ने भी दक्षिण अफ्रीका के प्रवास मे इस स्टेशन का भ्रमण किया।  इस रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म नं0 1 तथा वो बेन्च सुरक्षित रखे गए हैं, जिस पर बैठकर गांधी ने रात बिताई थी । रेलवे स्टेशन अभी भी प्रयुक्त होता है और स्टेशन पर कुछ यात्री भी प्रतीक्षारत मिले । डरबन से जोहान्सबर्ग तक रेल से लगभग 12 घण्टे का रास्ता बताया गया। यह एक छोटा सा कस्बा है, जो तमाम अफ्रीकी कस्बों की तरह चैड़ी सड़कों और उनकी दोनो तरफ दुकानों से सजा हुआ है। इस कस्बे मे एक गांधी चैक भी है, जिस पर लाठी लिए गांधी की काले पत्थर की खूबसूरत प्रतिमा है।
हजारों साल पुराना वृक्ष-जोहान्सवर्ग से 400 कि0मी0 दूर लिम्पोपो प्रान्त मे बाओबाब वृक्ष के बारे मे बताया गया कि 10000 वर्ष पुराना वृक्ष है। कार्बन डेटिंग के अनुसार यह वृक्ष 1700 वर्ष पुराना पाया गया, इसकी उंचाई 22 मी0 एवं फैलाव कहीं-कहीं पर 47 मी0 है।  वृक्ष का तना इतना चैड़ा था कि उसके भीतर एक टेबुल रखी हुई थी और खाली जगह मे पांच-छ लोग खड़े हो सकते है। उसके तने को खोखला करके बनाए बार को देखकर आश्चर्यलगा लगा लेकिन दुख हुआ कि हमारे कौतुक पसन्दगी ने इस बुर्जुग बृक्ष को कितना घायल कर दिया है। इस बुर्जुग बृक्ष की शुरुआती तीन डालियां तीन दिशाओं मे जमीन की टेक लेकर उपर उठी हुई थीं, मानो यह महाबृक्ष अपने भारी शरीर को जमीन की टेक लगाकर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। वृक्ष आम के शानदार बागो के बीच घिरा हुआ था । पके सिन्दूरी आमो को देखकर खरीदनें का मन हुआ, देखभाल करने वाली अफ्रीकी महिला जिसे बोलचाल मे ममा कहते है से अनुरोध करने पर ममा ने मालिक से फोन पर बात करनी चाही लेकिन छुट्टी होने के कारण मालिक द्वारा फोन नही उठाया गया और ममा ने अपने स्तर से आम देने मे असमर्थता व्यक्त की गयी । दक्षिण अफ्रीका मे साप्ताहिक छुट्टी शनिवार और रविवार को होती है और इन दोनो दिनो मे प्रायः लोग अपने व्यावसायिक काम नही करके पार्टी आदि का आनन्द लेते हैं । यदि आप इन दो दिनो के बीच गम्भीर बीमार पड़ गए तो आपका दुर्भाग्य है, आपको बेहतर चिकित्सा सेवा शायद ही मिले । दक्षिण अफ्रीका को चिकित्सा और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र मे काफी काम करने की जरुरत है।
क्रूगर नेशनल पार्क- क्रूगर नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 19485 वर्ग कि0मी0 का अभयारण्य है। इसको अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा 1899 से 1926 के मध्य टोंगा जाति के मूल निवासियों को जबरन विस्थापित करके बनाया गया है। इसमे प्रवेश करने एवं निकलने के लिए 09 गेट बने हैं । हमलोगों ने पुण्डा मारिया गेट से प्रवेश करने और फेबियन गेट से बाहर निकलने की योजना बनाई थी, जिसकी दूरी लगभग 400 कि0मी0 है, इस प्रकार हम इस जंगल के दो तिहाई हिस्से लम्बाई को पार करने वाले थे । 
हम लिम्पोपो प्रान्त के बाओबाब वृक्ष से लगभग 2.30 बजे क्रूगर पार्क मे प्रवेश के लिए पुन्डा मारिया गेट। के लिए निकले । पुन्डा मारिया गेट तक पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो गया क्योंकि जी0पी0एस0 की महिमा से हमारी गाड़ी कुछ मुख्य रास्तो से अलग रास्तो को पकड़ कर चली । इसका फायदा यह हुआ कि हम अफ्रीका के भीतरी हिस्सो का दर्शन कर पाए जो प्रायः पर्यटक निगाहों से ओझल होता है। रास्ते में अश्वेत समुदाय के लिए निर्माणाधीन और निर्मित हो चुकी कालोनियां दिखीं । प्रत्येक मकान के इर्दगिर्द शाक सब्जी उगाने के लिए पर्याप्त भूमि छोड़ी गयी थी और कालोनी के चारो तरफ तारों की बाड़ बनायी गयी थी । कालोनियां यद्यपि की निर्माणाधीन थी परन्तु बहुत ही साफ-सुथरी थी। दक्षिण अफ्रीका मे घूमते हुए आप पाएगें कि यहां पर ईटें भी पालीथिन मे लपेट कर ही रखी मिलेगी न कि खुली इधर-उधर बिखरी हुई ।
थोड़ा रास्तो के भटकाव के कारण और अपने ठहरनें के ठिकाने के सम्बन्ध मे हुए कन्फ्यूजन के कारण पुण्डा मारिया गेट तक पहुंचने मे रात हो गयी, इस सूनसान गेट तक पहुंचने मे पहली बार हमे बीच सड़क पर खड़ा एक गधा और कुछ दूरी पर खड़ी गाय मिली, जिससे टकराने से हम बाल बाल बचे। अन्धेरे मे गेट के सामने जो चैकीदार मिले उनके द्वारा बताया गया कि सुबह 5.00 बजे से अन्दर प्रवेश मिलेगा । रुकने के ठिकाने के बारे मे उनके द्वारा बताया गया कि लगभग 15 कि0मी0 दूरी पर कोपाकोपा गेस्ट हाउस मे रुका जा सकता है। हमें अन्दाजा था कि पुण्डा मारिया गेट के आसपास कुछ कस्बेनुमा जगह होगी लेकिन रात के अन्धेरे मे 15 कि0मी0 दूरी बहुत लम्बी लग रही थी, क्योंकि रात मे प्रायः मिलने वाले अफ्रीकी नशे मे होगें और अन्जान भिन्न नस्ल के लोगों के साथ तो लूटपाट होने की सम्भावना से यहां के गैर अफ्रीकी समुदाय के लोग काफी डरते हैं । डरने कारण लूटपाट नही, बल्कि लूट के साथ-साथ हत्या कर दिया जाना यहां के नशे मे चूर अपराधियों के लिए असामान्य नही होता है।
रात मे कोपा-कोपा गेस्ट हाउस पहुंचने पर वह गेस्ट हाउस भी जंगल का ही एक हिस्सा लग रहा था क्योंकि एक तो गेस्ट हाउस कई एकड़ मे बाग-बगीचों मे फैला था दूसरे बिजली मे कुछ समस्या होने के कारण कहींे-कहीं पर ही रोशनी दिख रही थी । रिसेप्सन पर खड़े अश्वेत सज्जन यद्यपि कुछ नशे मे थे लेकिन उनके द्वारा बहुत सहृदयता से कुछ सस्ती दर पर एक सूट उपलव्ध कराया गया । सूट मे हम कुछ व्यवस्थित हुए ही थे कि बिजली पूर्णतया चली गयी लेकिन रिसेप्सनिष्ट सज्जन ने, यद्यपि कि हमारा सूट मुख्य भवन से  दूरी पर था लेकिन बैटरी वाली लालटेन खुद लाकर दी गयी और असुविधा के लिए बार-बार क्षमा मांगी गयी । बिजली की आपूर्ति की समस्या रात 11 बजे तक ठीक हुई लेकिन हमलोग तबतक सो गए । 
अगली सुबह 7 बजे तक हम पासपोर्ट वगैरह चेक कराकर परमिट लेकर पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर पार्क मे प्रवेश कर गए । पुण्डा मारिया गेट से फेबियन गेट की दूरी लगभग 400 कि0मी0 को अधिकतम 60 कि0मी0 प्रति घण्टे की गति से ही तय करना था, जो कि यहां के लिए असहज गति है। गति पर प्रतिबन्ध का कारण आगे चलते ही स्पष्ट होने लगा, सुबह बादलों से भरी थी और कहीं-कहीं पर बारिश भी हुई । पार्क के भीतर की सड़क भी डबल लेन की थी, सड़क पर कहीं-कहीं हाथियो के गोबर पड़े हुए थे जिससे लग रहा था कि उन्हांेने कुछ देर पहले रास्ता पार किया हो । कू्रगर पार्क का दर्शन बिग 5 से पूर्ण माना जाता है, बिग 5 मतलब शेर,चीता,हाथी, भैंसा, गैण्डा । यह आपके भाग्य पर है कि इन पांचो के दर्शन हो पाते हैं कि नही । जंगल मे घुसने के दसियों किलोमीटर पर हमे जिराफों का समूह दिखाई दिया, उसके बाद जेब्रा, हिरन की तमाम प्रजातियों के अलग-अलग झुण्ड और विशालकाय अफ्रीकी हाथियों के कई झुण्ड रास्ते मे मिलते चले गए। कई बार ये झुण्ड हमारे आने के कुछ पहले ही सड़क को पार कर दूसरी तरफ जंगल मे उतरे होते थे तो कई बार इन हमे गाड़ी खड़ी करके इन झुण्डों को सड़क पार करने का इन्तजार करना पड़ता था । एक बार हाथियों का झुण्ड सड़क पार करने के लिए लगभग किनारे पर था कि हमारी कार पहुंच गयी, झुण्ड मे हाथी का बच्चा भी था, हाथी अपने बच्चों के प्रति बहुत ही संवेदनशील होते हैं उस पर दुर्योग यह कि हमारे कार का रंग भी गाढ़ा लाल था, एक हथिनी चिघ्घाड़ते हुए काफी आक्रामक अंदाज मे आगे ब़ढ़ी गनीमत था कि हमारी कार कुछ आगे निकल चुकी थी लेकिन झुरझुरी के लिए काफी था ।
सबसे बड़ी उत्कन्ठा जंगल के राजा से मुलाकात की होती है । दोपहर की धूप कड़ी हो गयी थी और सड़क एक नदी के किनारे किनारे चल रही थी, कभी सड़क नदी के पास पहंुच जाती तो कभी नदी कुछ दूर हो जाती । दोपहर बीतने के कुछ बाद एक जगह सड़क के किनारे दो तीन कारे और पर्यटकों को घुमाने वाली गाड़िया खड़ी थी । पर्यटक खिड़कियों मे से बड़े-बड़े लेंसो वाले कैमरे आदि लगाकर शूट करने की कोशिश कर रहे थे । जहां पर लोगो ने कार और पर्यटको की गाड़ियां सड़क के किनारे खड़ी थी, वहां पर नदी सड़क से काफी नजदीक और गहराई मे थी । उचक-उचक कर देखने पर नदी के दूसरी तरफ घने वृक्षों की छाया मे एक शेर परिवार नदी की रेत पर लेटा मिला, घनी छाया मे करीब 5 शेर लेटे हुए थे लेकिन हम जहां पर खड़े थे वहां से एक झलक ही मिल पा रही थी । धीरे धीरे गाड़ियां जब आगे निकलीं तो हमे भी देखने का मौका मिला । शेरों का परिवार काफी गहराई मे सोया हुआ था तो मुझे लगा कि मैं सड़क पर निकल कर कुछ अच्छी जगह लेकर फोटो ले सकता हूं । वहां पर अन्य गाड़ियां नही थी इसलिए मै गेट खोलकर सड़क की पटरी की ढलान पर उगी झाड़ियों के पास पहुंचा ही था कि झुण्ड मे हलचल हो गयी । एक दो तो वापस नदी की दूसरी तरफ जाने लगे लेकिन एक महाशय को मेरा बर्ताव पसन्द नही आया और वे अपनी पूरी आक्रामकता से नदी की दूसरी तरफ खड़े हो गए, नदी की धारा इतनी पतली थी कि वो उनके एक छलांग के भी काबिल नही थी यानी दूसरी छलांग मे हम और वो आमने सामने होते । मुझको अपनी हठधर्मिता समझ मे आ गयी और भाग कर कार मे घुसकर दरवाजा बन्द करके हम नौ-दो ग्यारह हो लिए। कुछ देर मे समझ मे आया कि सम्भवतः कार से बाहर निकल कर खुले मे आ जाने के कारण दूसरी तरफ मुह करके काफी दूरी पर लेटे शेर परिवार को हमारी गंध मिल गयी थी इसीलिए पार्क मे खुले मे निकलना प्रतिबन्धित होता है परन्तु हमने सुनसान होने पर नियम की परवाह न करने की अपनी आदत के अनुसार ब्यवहार किया था, जिसमे खतरा हो सकता था ।
इसी तरह दूर-दराज एक पेड़ पर बैठे दो चीतों के भी दर्शन हो गए । पार्क की मुख्य सड़क से जुड़ी बहुत सड़के अर्द्ध चन्द्राकार पथ मे बनाई गयी हैं जो कई किलोमीटर लम्बी होती है और इनको लूप कहते हैं । लूप मे जाकर आप जंगल की गहराई का दृश्यावलोकन कर सकते हैं । करीब 70-80 किलोमीटर के अन्तराल पर पार्क मे एक ही कैम्पस मे पेट्रौल पम्प मनोरम रेस्टोरेंट वगैरह रहते हैं जहां पर आप रिफ्रेस होकर अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं । हमको अपनी मंजिल पूरी करते करते 5 बज गए और बिग 5 मे से एक गेंडा महाराज के दर्शन नही हो सके।
कुल मिलाकर क्रूगर पार्क हमे उस दुनिया से मुखातिब करता है, जिसको हमने सदियों पहले अपने आधुनिक विकास की जरुरतों के मद्देनजर रौंद डाला है।
क्रमशः

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा, भाग-4



जोहान्सबर्ग से डरबन- जोहान्सबर्ग से बाई रोड कार से हम डरबन पहुंचे। जोहान्सबर्ग उंचाई पर बसा दक्षिण अफ्रीका का महानगर है और डरबन समुद्रतट पर। जोहान्सबर्ग से नीचे उतर कर डरबन जाते हुए वैनरीनेंस पास से गुजरते हुए प्रकृति के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। जब जोहान्सवर्ग से लगभग 290 कि0मी0 पर दक्षिण अफ्रीका के प्रान्त क्वाजा नटाल मे प्रवेश करते है तब यह पास हैरीस्मिथ से शुरु होकर वेनरीनेंस तक पर्वतों के बीच से गुजरते हुए अपने अद््भुत नजारों से आपको सम्मोहित करता रहता है। हमंे जोहान्सबर्ग की स्थानीय निवासिनी श्रीमती शिवा के सौजन्य से उनकी यहूदी सह अध्यापिका का फ्लैट मिल गया डरबन मे रहने के लिए। तड़कती बिजलियों और बारिश की फुहारों के बीच हम रात्रि 8.00 बजे जी0पी0एस0 महोदय के सहयोग से बहुमंजलीय आवास मे पहुंचे । बुुर्जुग श्वेत केयर टेकर महोदय ने हमारा स्वागत किया और फ्लैट के सम्बन्ध मे सारी जानकारी विस्तार से देते हुए हमारी सुखद यात्रा की कामना किया। बुर्जुग केयरटेकर करीब 80 साल के रहे होगें लेकिन कमर झुकी होने के बावजूद उनकी सक्रियता से हम आश्चर्यचकित थे। फ्लैट बेहद साफ सुथरा था और अपने बुर्जुग मालिकान की स्मृतियों को अपनी दीवालों पर संजोए हुए था, इसके मालिक की बनाई पेंण्टिंग्स दीवालोे पर टंगी हुई नवागंतुकों को निहार रहीं थीं। 7वीं मजिल की बड़ी-बड़ी बालकनियों से रोशनियों मे चमकता डरबन महानगर और उसके किनारे फैले हिन्द महासागर के तट पर झिलमिलाती रोशनियां हमे मंत्रमुग्ध कर रहीं थी। जैसा कि इस देश का रिवाज है उसी का अनुसरण करते हुए हम जल्दी सो गए और सुबह जल्दी ही उठकर समुद्रतट के किनारे पहुंच गए। 
सामनें नीला हिन्द महासागर था, इस अपरिचित महाद्वीप की भूमि पर खड़े होकर अपने परिचित महासागर को निहारने का सुख अद्भुत था, वैसे ही जैसे बहुत दिनों बाद अपने गांव जाने वाली सड़क दिख जाने पर लगता है या कहीं दूर से लौटने पर अपने घर की खिड़की से आ रही रोशनी को देखकर लगता है। इतनी सुबह पहुंचने पर भी हमे लगा कि हमे कुुछ देर हो गयी है। तट के किनारे निवासियोें की जलक्रीड़ा देखकर धीरे-धीरे पानी से दूर रहने की मेरी हिचक खत्म हुई। मैं उत्तर भारत में जनवरी की कड़ाकेदार ठंड को झेलकर यहां के खुशगवार मौसम मे पहुंचा था लेकिन शरीर के भीतर घुसी ठंड अभी भी पानी से डरा रही थी। 
काफी लम्बे, साफ-सुथरे समुद्रतट के किनारे खूबसूरत टाइल्स से बने फुटपाथ पर उस दिन मैराथन दौड़ थी, थोड़ी देर मे देखता हूं कि हजारो श्वेत, अश्वेत, एशियाई, युवा, बुर्जुग, बच्चे, पुरुष, स्त्री, विकलांग लोगों को हुजूम दौड़ रहा है और केवल जूतो की आवाज ही सुनाई दे रही है। समुद्रतट के किनारे रंगविरंगे टी-शर्ट और टोपियों को दौड़ते देखकर लग रहा था कि जैसे हजारो तितलियों का समूह एक अनुशासनबद्ध उड़ान भर रहा है। किनारे समुद्र की हिलोरों के आमंत्रण को हम देर तक अवाएड नही कर पाए और पानी मे कूद पड़े। पानी मे घुसते ही सारी हिचक वैसे ही काफूर हो गयी जैसे किसी शिशु का किसी अनजान वत्सला स्त्री की गोद मे पहुंचने पर दूर होती है, अब हमे समुद्र अपनी गोद मे उछाल रहा था और हमारी शिशुवत किलकारियां गूंज रही थी।
डरबन- जोहान्सबर्ग से लगभग 500 कि0मी0 दूरी पर हिन्द महासागर के किनारे बसा दक्षिण अफ्रीका का एक बेहद खूबसूरत शहर है। भारतीय ब्यापारी, मजदूर इसी किनारे उतर कर सदियों से इस महाद्वीप मे समाते चले गए। इसीलिए यहां पर भारतवंशी अच्छी संख्या मे सड़को पर दिखते हैं। कहीं-कहीं पर तो इनकी बस्तियां लघु भारत होने का भ्रम देती हैं। डरबन और भारत का रिश्ता सदियो पुराना रहा है, इसकी खाड़ी मे क्रिसमस के समय 1497 मे पहंुचे थे वास्को डि गामा। महान जूलू राजा शाका और हेनरी के समझौते मे इसको व्यापार केन्द्र के रुप मे विकसित किया गया और केप के गर्वनर सर बेंजामिन डरबन के नाम पर इस बस्ती का नाम डरबन रखा गया। शुरु मे इसको पोर्ट नाटाल नाम दिया गया था। डरबन मे 16 नवम्बर 1860 को पहले 342 गिरमिटिया भारतीय उतरे थे फिर 26 नवम्बर, 1860 को गिरमिटिया मजदूरों का दूसरा जत्था इस खाड़ी मे उतरा था। 1860 से 1911 तक लगभग 15184 भारतीय गन्ने की खेती के लिए डरबन मे लाए गए थे। डरबन मे भारतीयो ने व्यापार मे अश्वेतों से सहज रिश्ते बना कर शीघ्र ही श्वेत व्यापारियों के माथे पर बल डाल दिए और यही चलकर आगे भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंध का कारण बना। अधिकांश भारतीय चेस्टवर्थ मे रहते हैं। भारतीय बच्चों के लिए रोमन कैथोलिक चर्च ने 1867 मे पहला भारतीय स्कूल खोला और 1909 तक 35 भारतीय स्कूल खोले गए थे। 
डरबन के समुद्रतट- हिन्द महासागर के किनारे पर बसा यह महानगर अपने शानदार समुद्र तटों पर इतराता रहता है क्योंकि इन समुद्र तटों के किनारे इसके निवासी लगातार खेलते रहते हैं। इस महानगर के किनारे  दूर-दूर तक छोटे-छोटे तटों पर सुन्दर स्नानागारों मे प्रकृति का आनन्द मे डूबे निवासियों को देखकर आप विभोर हो उठेगें। मुख्य नगर के किनारे के समुद्रतटों के अतिरिक्त नगर के बाहरी हिस्सों मे स्थित समुद्रतटों के समानान्तर तरणताल भी बने हुए हैं और नगरवासी इच्छानुसार समुद्रतट और तरणतालों का देर रात तक आनन्द लेते रहते हैं। 
डरबन के म्यूजियम- डरबन मे डरबन लोकल हिस्ट्री म्यूजियम, ओल्ड हाउस म्यूजियम, ओल्ड कोर्ट हाउस म्यूजियम, पोर्ट नेटाल मेरीटाइम म्यूजियम हमने देखा। इन म्यूजियमों मे दक्षिण अफ्रीका का उपनिवेशकालीन इतिहास दर्ज है। ओल्ड हाउस म्यूजियम नेटाल प्रान्त के प्रथम उपनिवेशकालीन प्रधानमंत्री के घर को यथावत बनाकर रखा गया है। जब हम पहंुचे तो म्यूजियम की मरम्मत शुरु होने के कारण उसको बन्द करके तिरपाल से ढका जा चुका था। सुदूर भारत से आने और फिर कभी देखपाने का अवसर न मिल पाने की सम्भावना जब हमने दर्शायी तो आयोजकों ने हमे 5 मिनट के लिए अन्दर प्रवेश करके म्यूजियम देखने की अनुमति खुशी-खुशी दे दी गयी। इन म्यूजियमों के माध्यम से आप न केवल दक्षिण अफ्रीका का अतीत जान सकते है वरन इन म्यूजियमों मे जीवन के विकास क्रम को समझाने, मानव जाति के विकास क्रम को भी जान सकते हैं।


सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

क्रिकेट का तिलस्म और वान्डर्रस का मैदान-2



संयोग से जहां हमलोग रह रहे थे उस कालोनी से पांच मिनट की पैदल दूरी पर ही वांडर्रस था। वान्र्डरस अकेला मैदान नही है यह कई छोटे-बड़े मैदानों का बिग बाजार है जिसके अगल-बगल तमाम छोटे-बड़े मैदान हैं, फुटबाल के, रग्बी के । प्रायः शाम को ये मैदान खेलने वालों से भरे मिलेगें। फुटबाल के छोटे-छोटे मैदान भी हैं जिसमे 6-6 खिलाड़ी भी खेल सकते हैं। ये मैदान रात मे दूधिया रोशनी से जगमगाते मिलेगें चाहे ठण्ड पड़ रही हो या बारिश हो रही हो, तेज संगीत और दूधिया रोशनी मे खेल अपनी पूरी रवानी पर मिलेगा। मैदान तारों के बाड़े से घिरे हुए होते हैं जिससे गेंद बाहर न जा सके और मैदान के बगल से सनसनाती गुजर रही कारों को किसी तरह की दिक्कत न हो। फिटनेस और खेल के प्रति यह मुल्क दीवाना है न कि हमारे समाज की तरह जिसमे खेल एक खास उम्र की बेचैनी भर है।
उस दिन श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका का मैच था। वान्डरर्स की तरफ आने वाली सड़के दोपहर 1 बजे से गुलाबी टी शर्ट पहने युवाओं, स्त्रियांे, बुर्जुगों से भरी हुई थी वान्डरर्स मे होने वाले अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच मे ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रहे लोगों के प्रति एक जुटता दर्शाने के लिए महिलाएं, पुरुष गुलाबी वस्त्र पहन कर मैदान मे आते हैं और दक्षिण अफ्रीकी टीम भी इसी रंग के वस्त्र पहन कर मैदान मे उतरती है। गुलाबी वस्त्र पहनने की अनिवार्यता नही होती लेकिन मैदान तीन चैथाई गुलाबी वस्त्रों के कारण गुलाबी रंग मे रंगा होता है। मैदान की तरफ आने वाली सड़को पर मीलों आगे से अश्वेत युवा कार मालिकों को कार पार्किंग मे खड़ा करने का इशारा करने लगते हैं। पार्किगं मतलब सड़कों पर कार खड़ा करने के लिए बनाई गयी पार्किंग और इशारा करने वाले प्राइवेट लोग होते हैं जो आपकी कार पार्क कराकर उसकी देखभाल करगें और बदले मे दो-चार रैण्ड जैसी आपकी खुशी हो आपसे लेगें । इन मैंचांे मे यहां के कुछ निवासी कार पार्क करने वालों से दुखी हो कर अपने मकान के बाहर की सड़क पर कार पार्क न करने की तख्ती भी टांग देते है और लोग उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए वहां पर कार पार्क नही करते हैं ।
मेले मे जाते लोगों का उत्साह देखते-सुनते और कुछ गलतफहमियों के कारण थोड़ा सा विलम्ब हो गया लेकिन मैदान मे घुसते ही एक अलग दुनिया थी। उर्जा से ओतप्रोत एक जन समूह हिलोरे ले रहा था, खूबसूरत मैदान मे एक-एक शाट पर बजने वाला संगीत, दर्शकों की लयबद्ध तालियां या क्रमशः खड़े होकर दर्शक दीर्घा मे समुद्र की लहर उठने का दृश्य पैदा करना क्रिकेट से कहीं उपर था। दर्शक दीर्घा करीब चालीस प्रतिशत गोरों से भरी थी शेष अश्वेत और भारतीय समुदाय था। अफ्रीकी टीम के नए गेंदबाज रवाडा के प्रति दर्शकों का समर्थन देखने लायक था लेकिन अच्छे क्रिकेट की सराहना राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर हो रही थी। वान्डरर्स मे उस दिन 30 प्रतिशत क्रिकेट, 30 प्रतिशत बीयर, 30 प्रतिशत दर्शकों का खेल था और शेष बयान के बाहर था। सबसे अधिक आश्चर्य जनक लगा कि लंच के समय पिच को घेर कर मैदान को दर्शकों के लिए खोल दिया गया और आधे से अधिक दर्शक मैदान मे उतर कर चहलकदमी करने लगे। खेल शुरु होने के दस मिनट पहले मात्र दो-तीन लोगों द्वारा जगह-जगह खड़े होकर इशारा किया गया और पूरा मैदान खाली हो गया। कितना विश्वास है अपने दर्शकों पर इस मैदान के प्रबन्धकों का शायद खेल भावना से भरे हुए समाजो मे यह आत्म विश्वास आ जाता है कि वे एक-दूसरे पर विश्वास कर सकें । वाडरर्स से बाहर निकलते-निकलते मुझे समझ मे आया कि यह भीड़ क्रिकेट देखने नही बल्कि खेल को जीने जाती है। उस दिन मधुमक्खियों ने भी लगभग एक घण्टा मैदान पर कब्जा कर लिया था मधुमक्खी भगाने वालों का दर्शक उसी उत्साह से तालियां बजा कर उत्साह वर्धन कर रहे थे जैसे उन्होने कोई शानदार कैच लपका हो।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

क्रिकेट का तिलस्म और वान्डर्रस का मैदान-1




 ( दक्षिण अफ्रीका यात्रा गतांक से आगे)--
हम गलियो मे, बगीचो मे, खाली जगहों मे, स्कूलों की बोझिल कक्षाओं से जान बचातेे  अभिभावकों की तिरस्कृत निगाहों से नजरे छुपाते, ‘‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराब‘‘ जैसे मुहावरांे की घुट्टी पीते हुए क्रिकेट खेलकर कर बड़े हुए हैं।
रेडियों हमे क्रिकेट परोसता था और हम टेस्ट मैचों मे लगे एक-एक चैक्के-छक्के पर आधे-आधे घण्टे चाव से उस स्ट्रोक की तारीफ सुनाते कमेन्टेटरों और विषेषज्ञों की टोली से खेल के नाम पर क्रिकेट सेे ही संस्कारित हुए थे। 
क्रिकेट हमारे उदास ठहरे वक्त को चबाने वाली च्यूगम की तरह था, जिसमें ढलती ढलती सांझ कब गुजर जाती थी पता नही चलता था।
निराशा के पठार मे क्रिकेट की जमीन पर उगे इक्के दुक्के दरख्तों की विशालता और अनोखेपन को देखते-निहारते और उनके बारे मे बात करते-करते अपने साथियांे से बहस मे उलझ जाना ही क्रिकेट था। 
क्रिकेट हमारे गांव के किशोरों और युवाओं की जिन्दगी मे अक्टूबर-नवम्बर मे उतरता था और फरवरी-मार्च की कड़ी होती धूप मे कपूर की तरह उड़ जाता था।
गांव जब अपनी हरी-भरी लहलहाती फसलों को खुशनुमा धूप मे सहेजने के लिए जूझ रहा होता था, तब मेले मे माइक लगाकर कमेन्ट्री कर रहे नए-नवेले किशोरों की जुबान मे क्रिकेट नए-नए शब्द गढ़ता है। 
हमारे जीवन मे क्रिकेट बस बचपने के गुजर जाने का अफसोस और जवानी की जिम्मेदारियों से जूझने का हौसला था। इसकी शब्दावली ने आहिस्ता-आहिस्ता कब हमारे बोलचाल मे जगह बना ली इसका हमे पता नही लगा लेकिन टूर्नामेण्ट के रस्मी उद्घाटनों से क्षेत्र में उभरते नए-नए रसूखदारों का पता लगता रहा।
क्रिकेट हमारे गांवो मे मेले की तरह आता है जिसके किनारे बैठ कर जुलाहे अपना करघा भूल जाते हैं, बाउण्ड्री के किनारे भीड़ मे खड़ा राजगीर अपनी दिहाड़ी भूल जाता है।
क्रिकेट के मेले में फसल अगोरने निकला किसान तालियों की गड़गड़ाहट सुनकर हरियाली के दुश्मनों को भूल जाता है और सड़क से गुजर रहे दूधिए के मु़ड़-मुड़ कर देखने से डगमगाती साइकिल से लोग बच कर निकलते हैं।
गांव मे क्रिकेट जब मचलता था तो मनु से लेकर मण्डल तक की सरहदों के आरपार खेलता था। यह हर साल कुछ नायक गढ़ता था जिसके बारे मे सुनकर गदोरी पर सुर्ती मलते-मलते उनके बाप-चचा अक्सर झल्ला जाते थे। क्रिकेट हर साल हमारे गांव की थकी-हारी गिरस्थी मे कुछ ऐसा अस्तब्यस्त कर जाता था, जिसका उलाहना महीनों चलता रहता था। क्रमश:

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

मेरी प्रकाशित दक्षिण अफ्रीका यात्रा संस्मरण का प्रथम भाग





मानव कुल की जन्मभूमि हैैै अफ्रीका। इसके दक्षिणी हिस्से मे घूमते हुए देखकर लगा कि प्रकृति ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति को अपनी सर्वोत्तम पृष्ठभूमि मे ही खेलने, बढ़ने और जूझने का अवसर दिया । इस महाद्वीप के किनारे पर उतरते समय काफी भावुक हो उठा था। सेसल्स के माहे द्वीप से उठता जहाज जब एयर टर्बुलेन्स मे हिचकोले लेने लगा तो मैं स्थिति की गम्भीरता को एयर होस्टेस के चेहरे पर दिखने वाले भावों से नाप रहा था, जब उसके चेहरे पर चिन्ता की कुछ लकीरे दिखीं तो मुझे  इस महाद्वीप के महासागर के तुफानो मे फंसे गिरमिटियों की याद आने लगी। लाखो वर्षो के मनुष्यों के संघर्ष मे कितने पानी के जहाज इस महाद्वीप से बाहर निकलने तथा आने की कोशिश मे जल की अथाह गहराइयों मे अपने सपनों के साथ डूब गए होगें। 
तो मैं जिक्र कर रहा था कि महाद्वीप के किनारे उतरते उतरते भावुक हो रहा था। मानव कुल इसी जमीन पर विकसित हुआ और विभिन्न रास्तो से पूरी दुनियां मे फैला, मानवता के इसी विस्तार मे भारत भूमि भी है। हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सामान आदि कहां मिलेगा इसीलिए चक्कर लगा रहा था कि दो अश्वेत लोगोेेेे से वो जगह दिखाने की गुजारिश किया और रास्ते मे इसके एवज मे कुछ पैसे चाहे, उनकी विनम्रता देखकर मैने कुछ रुपए दिए और एवज मे उनका जोरदार धन्यवाद पाया।
बाहर निकलते ही चैड़ी सड़कों का जाल एवं उस पर दौड़ती कारों को देखकर मन मे कुछ दरक सा गया कि यह मुल्क तीसरी दुनिया जो कि अपनी दुनिया है उसका हिस्सा नही लग रहा है। चैड़ी सड़के, हाइवे, कारंे अजूबी नही हैं लेकिन महत्वपूर्ण था उसके आसपास का वातावरण । दूर-दूर तक काली चमकती सड़कों पर गन्दगी तो दूर की चीज है एक भी तिनका नही दिखेगा, सड़कों की पटरियों की हरी घास लगता है जैसे करीने से तराशी गई है और टायरों की सरसराहट के अलावा कोई भी आवाज नही सुनाई पड़ी लगता है लोगो की गाड़ियो के हार्न निकलवा दिए गए हों । 
यहां घूमते समय सड़को पर कभी जानवर नही दिखे । जहां पर पालतू जानवरो को सड़को पर आने की सम्भावना है उसके एक-दो कि0मी0दूर से ही इन जानवरो के सड़क पर आने की सम्भावना के संकेत दिखाई देने लगते है, इससे स्पष्ट है कि ऐसा सामान्यतया नही होता है। हजार-पांच सौ कि0मी0 सड़को पर चलने पर भी सड़को पर पालतू जानवर नही दिखे, भले ही इससे सावधान रहने के बोर्ड सड़को पर दिखे। प्रायः राजमार्गो के किनारे फैन्सिंग रहती है, जिसके उस पार आपको बड़े-बड़े फार्मो मे मक्के के लहलहाते खेत और स्वस्थ्य एवं खूबसूरत पालतू गायों का झुंड चरते दिख जाय ।
प्राकृतिक रुप से इतने समृद्ध मुल्क मे अधिकांश अश्वेत आबादी स्लम मे रहने को क्यों अभिशप्त है यहां के समृद्ध बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का स्तर देखकर आश्चर्य हो रहा है। हालांकि जिन स्लमो को मैने दूर से देखा उनकी स्थिति मुझे अपने मुल्क के स्लमो से बेहतर दिखी। यहां पर तीसरी दुनिया के मुल्कों की ऐतिहासिक साम्यता दिखी कि ये स्लम इन मुल्कों के अभिजात वर्ग ने उपभोगवादी जीवन शैली के लिए रचे हैं ।
एक महत्वपूर्ण आदत यहां के लोगो मे पायी जाती है कि जब भी दो लोग एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं एक दूसरे की खैरियत अवश्य पूछते हैं, इससे इस मुल्क के दो अनजान नागरिकों मे भी आपस मे एक सकारात्मक संवाद का पुल बन जाता है। हमारे यहां यह ऐच्छिक होता है लेकिन यहां पर जरुरी और महत्वपूर्ण औपचारिकता होती है। आपके कितने भी सम्पन्न या महत्वपूर्ण हों लेकिन बाहर निकलते वक्त चैकीदार वगैरह से जरुरी औपचारिकता अवश्य निभाएं अन्यथा असभ्यों की श्रेणी मे गिने जाएगें ।यह इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि आप किसी से दिन मे कई बार मिलते है तब भी सामने वाले की खैरियत पूछ कर ही अपनी बात कहना सभ्यता का तकाजा है।
जब तक हिरन अपना इतिहास
खुद नही लिखेगें तबतक
हिरनों के इतिहास मे
शिकारियों की शौर्य गाथाएं
गायी जाती रहेंगी।---चिनुआ अचेबे
उपरोक्त कविता इसलिए याद आ रही है क्योंकि यह महत्वपूर्ण है कि इस मुल्क को देखने वाली निगाह की ब्याख्या करने वाला मस्तिष्क अश्वेत, गोरा, एशियायी या किसी अन्य किसी समुदायिक चेतना की निर्मिति से कितना स्वायत्त है। इस महाद्वीप से मनुष्य छोटी-छोटी नदियों की तरह निकले और भू-भाग पर समुद्र की तरह छा गए । उसी जनसमुद्र की कुछ लहरें सहश्त्र्ााब्दियों बाद प्रशान्त और हिन्द महासागर पर सवार होकर वापस लौटीं और उन्होने इस जमीन को अश्वेत रक्त से सरोबार करके जनसांख्यकी को एक नयी रंगत दे दी ।
दक्षिण अफ्रीका का क्षेत्रफल भारत का 37 प्रतिशत है और जनसंख्या भारत का मात्र 4.14 प्रतिशत है। जिसमे 9 प्राविन्सेज और 52 डिस्टिक हैं । पूरा देश 8 मेट्रोपोलिटन शहरों, 44 डिस्टिक म्यूनिसपिलिटीज और 226 लोकल म्यूनिसपिलिटीज मे विभाजित है। हजार-पांच सौ किलोमीटर एक दिन मे कारों से चल लेना सहज है क्योंकि दूर-दूर सभी प्रमुख सड़कें फोरलेन हैं और आपकी कार मे रखा गिलास का पानी जुम्बिस नही करेगा । अगर कैमरे नही लगें हो तो लोग अधिकतम प्राविधानित 120 की रफ्तार को कब पार कर जाएंगे पता नही चलेगा । प्रत्येक पेट्रौल पम्प पर सारी विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलव्ध मिलीं चाहे टायलेट हो या खाने-पीने की चीज। पेट्रौल भरने वाला आपकी गाड़ी का विन्डस्क्रीन और साइडस्क्रीन को साफ करके आपकी गाड़ी का हवा-पानी भी चेक करेगा। सैकड़ो किलोमीटर चले जाइए आपको कार का हार्न नही सुनाई देगा । हार्न यहां पर अप्रसन्नता प्रगट करने के लिए बजाया जाता है जबकि अपने यहां तो अनायास खाली सड़कों पर भी लोग प्रेशर हार्न बजाकर आनन्दित होते हैं । अगर आपने ओवरटेक किया है तो पीछे वाले को सम्मान सहित आभार प्रगट करना आपकी सभ्यता का परिचायक होगा । यदि आपकी गाड़ी रास्ते मे खराब हो गयी हो तो आपके पास से गुजरती गाड़ियां स्वयं मदद के लिए तैयार रहती हैं । इसकी पहचान यह होती है कि आपके बगल से गुजरती गाड़ी धीमी हो जाती हैैै और उसका चालक आपसे मदद का संकेत पाने की अपेक्षा करते हैं यदि आपने मदद का इशारा किया तो वे गाड़ी रोककर भरसक आपकी सहायता करते हैं । लोगों द्वारा सहज ढंग से लिफ्ट मांगते देखकर पता चल जाता है कि लिफ्ट लेना एवं देना यहां के सहज ब्यवहार का हिस्सा है। पब्लिक सवारी गाड़ियां हमारे यहां की मिनी बसों की तरह होती है मुझको किसी भी सवारी गाड़ी का सीसा टूटा या गाड़ी पर धूल जमी नही दिखी । लोग बस स्टाप पर लाइन लगाकर ही खड़े मिले । एक चीज उल्लेखनीय है कि भले ही यह देश तीसरी दुनिया का हिस्सा गिना जाता हो लेकिन दूर-दराज मे भी किसी यूरीनल या टायलेट मे गन्दगी नही मिली और प्रायः चालू हालत में फ्लस मिला । जिस तरह सड़को पर मलमूत्र विसर्जन हमारे यहां सामान्य है लेकिन यहां पर कई हजार किलोमीटर चलने पर भी सड़को पर जानवरो का भी मलमूत्र देखने को नही मिला ।
यहां सहज है कि आपके टिकट की जांच करने वाला कोई अश्वेत कर्मचारी किसी संगीत की धुन पर थिरक रहा हो या थिरक रही हो, इस मामले मे श्वेत तथा अश्वेत समुदाय की प्रवृत्तियां लगभग समान हैं । चूंकि श्वेत और अश्वेत समुदाय मे श्रम को हेय नही समझा जाता इसलिए श्रम से जुड़े कार्यो को लेकर विश्वगुरुओं की तरह हीन भावना नही पायी जाती है। मेहनत का सम्मान और दूसरों की तनिक सी असुविधा पर विनीत होकर खेद प्रकट करने के सहज भाव दिखे । तुलनात्मक रुप से अपने समाज मे पाता हूं कि किसी भी संस्थान मे तीन-चार परिश्रमी कार्मिको की तुलना मे एक चापलूस किस्म का कार्मिक अपने मुखिया का ज्यादे पसंदीदा होता है क्योंकि हमारे समाज मे श्रम के सम्मान का आभाव प्रतिपल दिखता है, आत्ममुग्धता मे डूबे विश्वगुरु सिर्फ अपनी निजी सुविधाओं और प्रशंसाओं के आकांक्षी होते हैं ।
प्रतीकों को ही धर्म मानने का पिछड़ापन मुस्लिम समुदाय मे ही ज्यादा दिखता है इसलिए रंग आधारित विभाजन के अतिरिक्त वेशभूषा और खानपान के आधार पर मुस्लिम समुदाय ही अपनी भिन्नता के प्रति आग्रही दिखा अन्यथा बाकी हिन्दू, इसाई, यहूदी और स्थानीय धर्मावलम्बियों की कोई भिन्न पहचान नही दिखी। एक मजेदार वाकया लोगों ने बताया कि हलाल मीट बेचने के चक्कर मे एक दुकान मे सूअर के मांस पर भी हलाल का टैग लगा दिया गया था, जिसका कुछ मुस्लिम धार्मिकों ने विरोध किया तो उसे हटाया गया । 
     कोकाकोला आदि कम्पनियों की साजिश और लगातार प्रचार के चलते यहां पर पीने के लिए श्वेत तथा गरीब अश्वेत समुदाय भी पानी के स्थान पर कोक ही पीता है। यहां के मजदूर वर्ग को भी दुकानों से दुकानो से कोक ढोते देखकर दुख हुआ कि कैसे कम्पनियो ने एक पूरे देश के स्वाद को बदल कर गुलाम बना दिया है। यहां का अश्वेत समुदाय भी घूस के रुप मे गर्मी के बहाने कोक की अपेक्षा करता है। 
भारतीय समुदाय के जितने भी लोगों से मुलाकात हुई उससे बातचीत से आभास हुआ कि अश्वेत समुदाय के प्रति अज्ञात भय से यह समुदाय हमेशा आशंकित रहता है और अपनी गतिविधियों को अपने समुदाय तक ही सीमित रखता है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन की कार्य पद्धति से लोग असंतुष्ट दिखे लेकिन भयभीत नही दिखे। 
           दक्षिण अफ्रीका यहां के मूल निवासियों की जीवन्तता, एशियाईमूल के लोगोे के लगन और यूरोपीयमूल के लोगो के दूरगामी समझ से विकसित हो रहा है। तीनो संस्कृतियों का मिलन इस महादेश को मनुष्यता का एक बेहतर मुकाम बना सकता है । भविष्य मे यह विकसित देश बनने की सम्भावना से भरा हुआ है मेरी कामना है कि यह साम्राज्यवादी ताकत और अहंकार से मुक्त समृद्ध निवासियों के देश के रुप मे विकसित हो। पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को इस देश के विकसित होने से दूरगामी लाभ होगा। यह सारा कुछ निर्भर होगा एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सेक्यूलर नेतृत्व की कई दशाब्दियों की लम्बी परम्परा के अधीन, लेकिन फिलहाल वर्तमान नेतृत्व से यहां के नागरिक निराश हैं। क्रमषः






सोमवार, 17 अप्रैल 2017

अन्तिम बिदाई

प्रायः पुरुष वर्ग ही रहता है । अपने दुःख को जज्ब किए दुनियावी बातचीत से उससे उबरने की कोशिश मे लगे लोग जहां जलती हुई चिताओं को निहारते हुए क्षणिक वैराग्य महसूस करने लगते हैं, वही अन्तिम क्रियाकर्म के कारोबारियों की सौदेबाजी उनको यथार्थ की दुनियां में खींचती रहती है । जलते हुए मांस की चिरांयध गंध से धुआंते वातावरण में शोकग्रस्त पुरुषों के बर्फानी विषाद के बीच मे जगह-जगह बिखरी अधजली लकड़ियों, गोबर और कोयलों के ढेर पर आवारा कुत्ते, छुट्टा जानवर, मुर्गे जहां निर्विकार भाव से घूमते रहते हैं वहीं दारिद्रय सुख का पर्यटन करते यूरोपीय, पुण्य पर्यटन करते शेष भारतीय भी कौतुक भाव से तमाशायी बने रहते हैं । इस पूरे माहौल मे हम गतात्मा के बारे मे नहीं अपितु कर्मकाण्ड की बारीकियों के बारे मे ज्यादा सोचते हैं और हमेशा की तरह गांव के कुछ विशेषज्ञ चिता की लकड़ियों को उलटते पलटते शरीर के शेष हिस्सों के जलने मे लगने वाले समय की स्वतःस्फूर्त ढंग से जानकारी देते रहते हैं । श्मशान पर एक महिला का करुण क्रंदन विषाद की बर्फ को पिघलाने लगा और मैने डूबती आंखो से उबरने के लिए सीढ़ियों पर चहलकदमी करते हुए एक लापता सज्जन के सम्बन्ध मे चिपके पोस्टर पर निगाह गड़ा दी । अजीब लगा कि जो जगह बहुसंख्य हिन्दुओं का अंतिम पता है, वहां पर भी लोग लापता की तलाश कर रहे है फिर महसूस हुआ कि शवदाह की क्रिया मे प्रतिदिन लापता होने वाले सैकड़ो पेंड़ो का पोस्टर भी इन घाटों पर जगह-जगह जरुर चिपकाया जाना चाहिए ताकि पता चलता रहे स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे हिन्दुओ के साथ गंगा प्रतिदिन कितने वृक्षों के असामयिक संहार की गवाह बन रही है ।

राजनीति

विश्व राजनीति की दिशा के अनुरुप भारतीय राजनीति भी चमत्कारिक रुप से नए चोले मे कुलांचे मार रही है यह उसी तरह अप्रत्याशित नही है, जिस तरह नेहरुवादी समाजवाद अप्रत्याशित नही था । लेकिन इसने बस चोला ही बदला है, उसके भीतर वही उच्च मध्यमवर्ग है जिसने 47 के बाद के भारत पर अपने शिकंजे को दिन ब दिन मजबूत किया है। 
शुरुआती एक-दो दशकों मे इस उच्च मध्यम वर्ग ने पूंजी को आंखे तरेर कर अपनी हैसियत का आभास कराया और अपनी वाम भाव भंगिमा से वंचितो का विश्वास हासिल करके अपनी हैसियत मे इजाफा करने का उपक्रम किया । इस पूरे दौर मे भी उच्च मध्यम वर्ग की वाम मुद्रा से पूंजी को कभी असुरक्षा नही महसूस हुई अपितु दिन ब दिन इनकी बढ़ती हैसियत और संख्या ने उद्योग जगत को अपने द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित उत्पादों के लिए विशाल ग्राहक वर्ग प्रदान किया । 
यह वर्ग उद्योग जगत की उत्पादित द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित सामग्रियों का न सिर्फ बड़ा ग्राहक वर्ग है अपितु इसने विशाल वंचित वर्ग मे उपभोगवादी जीवन पद्धति को स्वीकार्य बनाया है। इसने वंचित वर्ग को कभी महंगी जीवन पद्धति, अमीरी-गरीबी की गहरी होती खाई मे से मेढकों की मानिन्द निकलते अरबपतियों, लाखो रु0 महीने के खर्च वाले विद्यालयों आदि की उपादेयता पर मजबूती से प्रश्न नही उठने दिया। 
अवसर मिलते ही इस देश को बंधक बनाए उच्च मध्यमवर्ग ने तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को येनकेन प्रकारेण ध्वस्त करते हुए शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्रों को मुनाफा कमाने वाली फैक्ट्रियो मे बदलनें का लगातार प्रयास किया है और अपने दुष्प्रचार के चलते वंचितों को यह समझाने मे सफल रहा है कि सार्वजनिक उपक्रमों के ध्वस्त होने मे मनुष्य के नैसर्गिक चरित्रगत दोष का हाथ है। ठीक उसी तरह से जैसे अंग्रेजों ने चीन मे अफीम की बिक्री नही रोकने के लिए चीनियों के चरित्रगत दोष का हवाला दिया था । 
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन सुविधाओं का आकर्षण इतना प्रबल हो चुका है कि जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को त्यागकर कन्दराओं मे धूनी रमाने वाले बाबा और महात्मा वेशधारी लोग हाल के वर्षो मे बहुत तेजी से कन्दराओं से निकलकर पांच सितारा होटलो मे प्रतिष्ठित हो चुकें है । 
वर्तमान समय मे तमाम लाल, नीले, केसरिया, हरे, पीले राजनैतिक खेमो का नेतृत्व करने वाले वर्ग को देखें तो एक दूसरे के विरोध मे अपनी सुबह-शाम खर्च करने के बावजूद इनके जीवन पद्धति मे लगभग समानता है, इनके व्यक्तिगत खातो मे प्रायः करोड़ो की धनराशि रहती है, ये कभी सार्वजनिक परिवहन, सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक चिकित्सा, सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की न तो निजी जीवन मे पैरवी करते हैं और न ही बगैर किसी राजनैतिक जरुरत के इनका उपयोग करते हैं। 
असमानता की सहज स्वीकार्यता को जाति व्यवस्था ने हमारे जीवन मे पीढि़यों से प्रतिष्ठित कर रखा है और हमारे समाज का वंचित वर्ग इनके प्रति कृतज्ञ भाव रखने के लिए सदियों से अनुकूलित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरुप इन राजनैतिक नेतृत्वों के पीछे गोलबन्द समुदाय को उनकी मंहगी उपभोगवादी जीवन पद्धति चुभती नही है। इन गोलबन्द समुदायों के लम्पट युवा इनकी महंगी कारों मे लटक कर हथियारों को ढोने के अपने सौभाग्य पर वैसे ही इतराते हैं जैसे अंग्रेजी नौकरशाही द्वारा छोड़ी गयी परम्परा को निभाते चपरास का मुकुट पहन कर अर्दली इतराते रहते हैं।
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन स्तर पाने की अभिलाषा मे अनैतिकता और लालच की होड़ पर लगाम लगाने के लिए और सादगी को पुर्नप्रतिष्ठित करने के लिए उपभोगवादी जीवन पद्धति की धुंधली पड़ चुकी सीमारेखाओं का पुर्न रेखांकन आवश्यक है।

गिलोटिन (गांव के लोग पत्रिका मे प्रकाशित कहानी)


    नवम्बर की गुनगुनी रात में गरम मशाले की खुशबू दरवाजे पर बैठे लोगों को बेसब्र कर रही थी। जानकार बाटी पक गयी या नही उलट-पुलट कर देख रहे थे। सलाद कट रहा था और कुछ मनचले ‘‘देशी‘‘ की जुगाड़ में परेशान थे। तबतक दो लोग लुंगी मे देशी का पाउच लेकर अंधेरे मे प्रगट हुए, पियाक समझ गए कि जुगाड़ हो गया, नही तो मामला नीरस हो रहा था। दुआर पर जमावड़ा दो जगहों पर लगा था, एक जगह कुछ सरकारी कर्मचारी बैठ कर आपस मे सुखदुख कर रहे थे, दूसरी तरफ प्रधान के कुछ खास लोग ब्यवस्था और मेहमानवाजी दोनों का लुत्फ उठा रहे थे । तभी महाभारत सीरियल मे चर्चित शंख ध्वनि बजने लगी, सेकेटरी ने बतकही को विराम लगाते हुए कुर्ते में से मोबाइल निकाला और नाम देखकर मुह बिगाड़ लिया, ‘‘रतियो को चैन से रहने नही देती है‘‘ बुदबुदाते हुए मोबाइल फिर जेब में रखकर फिर पुराने रौ मे बात पूरी करना चाह रहा था, लेकिन शंखध्वनि अन्तराल पर लगातार बजती रही ं। आखिरकार किनारे जाकर काल रिसीव करते ही बोला, ‘‘नमस्कार मैडम..........पूजा पर था।‘‘ ‘‘परसों तुम्हारे गांव मे मुख्यमंत्री की विजिट है,..............अभी पहुंच कर तैयारी शुरु कर दो‘‘ दूसरी तरफ से आवाज आयी । मोबाइल जेब में रखकर जड़वत अंधेरे मे खड़ा होकर वो कुछ सोच रहा था। तबतक दूसरे कर्मचारी की मोबाइल पर द्विअर्थी भोजपुरी गीत बजने लगा और वो भी लपक कर एक किनारे खड़ा होकर ‘‘सरकार......हुजूर‘‘ करने लगा। उसका विभागीय अधिकारी भी उसको मुख्यमंत्री के प्रोग्राम की जानकारी देकर उसे गांव मे पहुंच कर अपना काम ठीक करने का निर्देश दे रहा था, उनको राहत यही थी कि दावत बड़े मौके से उसी गांव मे  थी, जिसका मुआयना होना था लेकिन दावत का मजा किरकिरा हो गया था ।
उनकी हवाई उड़ने लगी, जान तो वे भी रहे थ,े कि जिले मे मुआइना हो सकता है, लेकिन इसी गांव का होगा, उनको एक पल को विश्वास नही हुआ । वे सोचते थे कि यह आफत कहीं और आएगी और वे भीड़ में खड़ा होकर तमाशा देखेगें, अखबार में खबर दूसरों के बारे मे छपेगी और वे उसका अपने लोगों मे सिर्फ विश्लेषण करेगें, मगर अब तो खुद खबर बनने की नौबत आ गयी। कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा फिर एक ने हिम्मत बंधायी ‘‘अरे यार मुख्यमंत्री आ रहा है, तो उसको हमारे शिकार से फुटेज नही मिलेगी, उसको तो बड़ा शिकार करना है, ताकि कुछ बड़ी खबर बने, पब्लिक की तालियां बजे, नही तो इतनी कवायद बेकार जाएगी‘‘ वे कुछ आश्वस्त हुए और जल्दी से दो लालटेनें और मंगायी गयी। सबने अपने-अपने बस्ते खोलकर कागज पत्तर देखना शुरु कर दिया । खास लोग भी इन कर्मचारियों के अगल-बगल खड़े होकर कौतुहल से कारगुजारी देखने लगे । सब जान रहे थे कि सुबह होते-होते पूरा सरकारी अमला गांव मे हाजिर होगा और एक-एक विकास कार्यक्रम के लाभान्वित लोगों से कई-कई बार पूछताछ की जाएगी ताकि मुख्यमंत्री के मुआयने मे कोई कमी न होने पाए। क्षेत्रीय अधिकारी बार-बार फोन करके प्रधान को मुआयने मे नाश्ते, तम्बू, कनात, साफ सफाई की व्यवस्था के लिए  सहेज रही थी, साथ ही गांव के असन्तुष्ट लोगों की पहचान करके उनको मनाने का आग्रह कर रही थी । अगल-बगल के जिले मे किन गड़बडि़यों पर मुख्यमंत्री ने कार्यवाही किया था, इसकी भी जानकारी दे रही थी।
इधर प्रधान सोच रहा था कि छोटे मोटे खर्चे तो गांव को मिलने वाली धनराशि से सलट जाते हैं, लेकिन इतने बड़े खर्चे को वो किस मद से सुलटाएगा । अभी एक महीना पहले दिल्ली से पाखाना वाला बहुत बड़ा अफसर गांव मे आया था, उसके लिए नाश्ता, पानी, माइक, तम्बू का खर्चा ही नही निकल पाया है। पाखाना वाला साहब भी नाराजे हो गया था, हुआ यह कि वो गांव मे बने पाखानों का मुआइना कर रहा था तभी खटिक बस्ती मे बलचनवा के पाखाना का दरवाजा खोलते ही उसमें से सुअर और उसके आठ-दस बच्चे निकल कर भागने लगे, हड़बड़ाहट में वो गिरते-गिरते बचा था, इसीमें उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसको किसी तरह होटल में  अंग्रेजी दारु पिला-पिला कर ठंडा करना पड़ा । साला जितने का पाखाना नही उससे जादे की तो दारु पी गया था। दूसरे दिन बलचनवा को बहुत बिगड़ा था। मन ही मन पुरानी घटना सोचकर मुस्कराया फिर सोचने लगा ‘‘इ सब गांव मे फोटो खिचवा कर अपना टी0ए0-डी0ए0 सरकार से वसूलेगें और खर्चा परधान सरकारी पैसे मे बेइमानी करके निकालेगा‘‘ ।
क्षेत्रीय अधिकारी समझा रही थी, बहुत बड़ा मौका है सबकुछ ठीक हुआ तो आप भी हाई लाइट हो जाइयेगा, लेकिन वो समझ रहा था उसको अपनी फिकर जादा है तभी आवाज मे मधुरता आ गयी है, उसने भी आश्वस्त किया मैडम चिन्ता मत करिए ‘‘गांववालों को मै सम्भार लूंगा, लेकिन बलिकरना को आप भी तो बड़ा तवज्जो देतीं थी, एक ठो शिकायती कागज लेकर पहुंचता है और आप जांच कराने लगती हैं, उसका मन बहुत बढ़ गया है‘‘ । ‘‘देखिए जनता आती है तो उसको हमे सुनना पड़ता है, पुरानी बात भूलिए गांव को मैनेज करिए‘‘ उसने आदेशात्मक पुट के साथ अपनी बात खतम की । प्रधान सोचने लगा इतने बड़े मौके पर ये सब कहना तौहीन होगी, इसी बहाने बड़े-बड़े अधिकारियों से सम्पर्क आगे चलकर काम आएगा लेकिन बजरंगिया आजकल उसके खिलाफ गोलबन्दी करके लोगों को भड़का रहा है, उसको भी मैनेज करना होगा।
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सुबह होते-होते गांव मंे बिजली की तरह खबर फैल गयी कि गांव मे मुख्यमंत्री का मुआइना होगा । सबने इस मौके को अपने-अपने भाग्य का जागरण माना । सुबह की चाय के समय तक अहाते में काफी लोग जुट गए, प्रधान हांक रहा था कि ‘‘गांव ने इतनी तरक्की कर ली है कि मुख्यमंत्री उसको देखने आ रहे है। सब लोग अपनी नाद-चरनी खड़न्जा पर से हटालें और साफ-सफाई कर लें पता नही मुख्यमंत्री खुश होकर गांव के लिए कोई योजना ही दे दें‘‘। उधर विपक्षी खेमें मे भी यह खबर पहुची तो बजरंगी ने चेलों को सुनाया ‘‘ परधनवां इतना सरकारी माल घोंटा है कि उसकी खबर मुख्यमंत्री को भी लग गयी है और मुख्यमंत्री उसी को देखने आ रहे हैं‘‘। कहने का मतलब यह खबर अलग-अलग लोगो को अलग-अलग ढंग से समझा रही थी ।  प्रधान और विपक्षियों की बतकही का अपना-अपना अर्थ निकालते हुए गांव अपने दैनिक काम-काज मे जुट गया ।
प्रधान गांव मे घूम-घूम कर सरकारी योजनाओं को सहेज रहा था, बकरी का लोन लेने वालों को कहा गया कि वो जल्दी से पांच-छः बकरियां अगल-बगल से ंमगां कर बांध ले, क्या पता बकरियों की गिनती हो । परचून की दुकान वाले को कहा गया कि अपनी दुकान जरा झाड़ पोंछ कर कुछ और माल भर ले। सहुआइन भड़क गयी ‘‘लोन का आधा पइसा तो सब दलाली में काट लिया, अब सामान कहा से लाऊं‘‘ प्रधान ने अनसुनी करते हुए उसके बेटे को समझाया कि ‘‘तुम्हारा तो लोन ही नही पास होता, तुम्हारे स्कूटर को देखकर मैनेजर चिंहुक गया था कि तुम गरीब नही हो। वो तो मैने समझाया कि साहब उ पुराना स्कूटर उसके साढ़ू ने कबाड़ समझ कर उसको दे दिया है, कभी-कभार तेल भराकर वक्त-जरुरत में अपना काम कर लेता है, तब वो कुछ नरम पड़ा‘‘ ।
सहुआइन का बेटा दुनियादार था, उसने अपनी मां को डांट कर चुप कराया और दुकान में कुछ माल भर कर मुआइने लायक बनाने का आश्वासन दिया । असल में उसका साढ़ू बिजली का छोटा मोटा मैकेनिक था और उसका मरम्मत के बहाने एक बड़े इंजीनियर के घर आना जाना हो गया था। उस इंजीनियर ने उसको छोटा मोटा ठेकेदारी का काम दिला दिया था, जिससे उसकी हैसियत क्रमशः पुराने बजाज स्कूटर से कान में गाना लगाकर सुनते हुए नई मोटरसाइकिल चलाने लायक हो गयी थी और उस पुराने स्कूटर का कोई खरीददार नही मिलने पर उसको अपने पत्नी की सलाह पर अपनी साली के घर भिजवा दिया। उसकी पत्नी को डर था कि स्कूटर घर पर पड़ा रहने पर उसका देवर उसे लेकर इधर-उधर दौड़ेगा और तेल खर्चा अपने भाई से मांगेगा । उसी पुराने स्कूटर देखकर मैनेजर उसको ऐसा अमीर समझ लिया, जिसको गरीबी की योजनाओं से लाभ नही दिया जाना चाहिए । वस्तुतः उस स्कूटर को मैनेजर ने ब्लैकमेल करने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया और सहुआइन के बेटे से उसने लोन देने के लिए मनमाफिक सौदा किया था । सहुआइन उसी सौदे को लेकर आज भड़क रही थी । लोन मिलने के बाद उसके बेटे ने शहर जा कर सारे नकली आइटमों से दुकान भर लिया, नकदी के ग्राहक पहली बार मे ही भड़क गए लेकिन उधारी वाले अभी भी मजबूरी में सौदा-सुलफ लेते रहते है।
उसके बाद प्रधान खटिक बस्ती की तरफ चल पड़ा । उसको अंदाजा था कि हो सकता है मुआइना इसी बस्ती का ज्यादे हो सकता है। बालचन के दरवाजे पर पहुंच कर मुस्कराया, का दद्दा ए बार तो पिछला किस्सा नही होगा । अरे नही प्रधान जी उस बार भी हमारी गलती नही था, उस दिन सांझ को बूंदा-बांदी हो रही थी और छोटका लडि़कवा पाखाना मे सुअर भितरा दिया था। कुछ आगे बढ़ा ही था कि मोबाइल पर खबर आ गयी, दरवाजे पर कुछ सरकारी अफसर आ गए हैं, उनको चाय-पानी के लिए सहेजते हुए वह तेजी से घर वापस घर की ओर चल पड़ा। दरवाजे पर जमावड़ा था, क्षेत्रीय अधिकारी, हलके का दरोगा और तमाम जाने-अनजाने सरकारी लोग पहुंच चुके थे ।
क्षेत्रीय अधिकारी गांव की विकास पुस्तिका उलट-पुलट रही थी ।  कर्मचारी सरकारी कार्यक्रमों से गांव मे हुई उपलव्धियों की जानकारी दे रहे थे, वो किताब को बन्द करते हुए, बोली ‘चलो काम देखते है, एक तरफ से सारा विकास कार्य दिखाओ।‘  बकरी से गरीबी दूर करने वाले लाभार्थियों के दरवाजे पर पहुंची,‘ अरे तुम्हारी बकरियां कहां है, किताब मे तो 10 बकरियां है।‘ ‘‘साहेब चरने गयीं है‘‘ बस्ती के लोग तमाशायी बनकर खड़े हो गए थे, उन्ही में से एक ने जबाब दिया।  दरअसल वो कई लोगों का स्वयं सहायता समूह था, जिसको बैंक ने लोन दिया था।
मैनेजर स्वयं सहायता समूह को लोन देने के लिए अनिच्छुक था, ‘‘अरे भाई............सगे भाइयों का परिवार तो एकसाथ चलता नही है ये अलग-अलग लोग मिलकर धन्धा क्या चलाएगें, जिनको अपने खाने-पीने के ही लाले पड़े रहते है, आं.......ए। सरकार भी कैसी-कैसी हवा-हवाई स्कीम बनाती है, आं.........ए‘‘। हर बात खतम करने के बाद ‘आं........ए‘ उसका तकिया कलाम था, जिससे वो सामने वाले से अपनी बात की तस्दीक चाहता था । मैनेजर ने लोन देने के पहले समूह के हर आदमी को अलग-अलग बुलाकर पूछताछ के बहाने भड़काया था क्योंकि उसको पता था कि कुछ ही दिनो मे यह लोन एन0पी0ए0 मे बदल जाएगा। समूह का हर आदमी मुफ्त मे मिलने वाली बकरियों को पाने के लिए लालायित था, वो मैनेजर के हर सवाल का भोलेपन से जबाब देता और गांव पर अपने लोगों के बीच बैठकर अपनी समझदारी का बखान करता, दरअसल ये लोग इन सरकारी योजनाओं के परम्परागत लाभार्थी थे। लोन मे उनको नकदी मिली थी जो बकरी सप्लाई करने वाले एजेन्ट ने अपना और सरकारी महकमे का सारा कमीशन काटकर दिया था। गांव के सरकारी कर्मचारी ने समझाया था कि जब-जब मुआयना होगा तुमलोग अगल-बगल से बकरियां मांग कर बांध लेना। प्रधान ने सुबह जब बताया तो सब बकरियां मांगने के चक्कर मे इधर-उधर घूम रहे थे कि तबतक साहेब लोग आ पहुंचे । क्षेत्रीय अधिकारी भी अनुभवी हो गयी थी, उसने जबाब देने वाले से ही पूछा ‘‘अच्छा तुम लोग बकरियां कहां बांधते हो, चलो दिखाओ‘‘ वो अचकचा गया, इधर-उधर गोल-गोल घुमाने पर सौभाग्य से दो तीन खूंटे जमीन मे गड़े दिख गये, ‘‘इहैं बन्हाती है।‘‘ वो मन में समझ गयी इनके पास बकरी नही है, केवल बेवकूफ बना रहे हैं । उसने चेताया, ‘‘दोपहर मे आंऊगी, अगर बकरियां बंधी नही मिली तो तुमलोगों की खैर नही होगी‘‘कहते हुए आगे निकल गयी, ‘‘ठीक है साहेब‘‘ उसको पीछे से सुनायी पड़ा।
सरकारी घर कहां बने है, उस तरफ ले चलो । कुछ ही दूर पर एक दो-तीन कमरे का पलस्तर विहीन मकान दिख गया, ‘‘मैडम यह सरकारी आवास बना है‘‘ इतना बड़ा घ् ये लोग तो गरीब नही दिखते हैं, इसको सरकारी मकान कैसे मिल गया, उसने तरेरते हुए पूछा । ‘‘मैडम इनका नाम गरीबी रेखा वाली लिस्ट मे था, जब ये बनवा रहे थे तो मैने मना किया था कि नियम के मुताबिक एक ही कमरा बनवाओ लेकिन बदकिस्मती से इसका ससुर मर गया, जिसके नाम से जमीन का एक टुकड़ा था, इसने उसी को बेचकर दो कमरा और बनवा लिया है।‘‘ सरकारी कर्मचारी बार-बार सफाई दे रहा था, मैडम मैने प्रधान जी से भी इसको काम रोकवाने के लिए कहा लेकिन इसने प्रधान जी का कहना भी नही माना । अन्दरखाने बात यह भी थी कि उन्होने सरकारी पैसा वापस लेने के नाम पर उससे  हजार दो हजार वसूल भी लिया था।
आगे एक कमरे का मकान था, गेरु से रंगा हुआ, साफ-सुथरा उसके दरवाजे पर पहुंचते ही उसका मन प्रसन्न हो गया, सोचने लगी ऐसे ही सब मकान बनते तो एक सुन्दर कालोनी की तरह दिखते । मकान के बाहर एक मड़ई मे एक औरत चूल्हा फंूक रही थी, क्षेत्रीय अधिकारी ने किताब मे लिखे नाम के आदमी को पुकारा तो उसने कई अनजान लोगों को देखकर घूंघट माथे तक खींचते हुए बताया कि उसका आदमी बाहर मजूरी करने गया है। ‘‘ तुम्हारा मकान बहुत अच्छा है‘‘ उसने महिला की प्रशंसा किया और गांव के कर्मचारी से बोली, ‘‘इसके मकान पर सरकारी आवास लिखवा दो‘‘ इतना कान मे पड़ते ही उसके तेवर बदल गए,‘‘ई...सरकारी आवास लिखवावे के मना कइले हउवन, कौवनो भीख मे मकान मिलल हौ का, जवन हमार मन करी उ लिखवाइब‘‘। क्षेत्रीय अधिकारी को उस महिला का गर्वदीप्त चेहरा पता नही क्यों भा गया, लेकिन कर्मचारी अपने अफसर के सलाह की तौहीन और एक मामूली गरीब औरत की वाचालता पर नाराज होकर बोल उठा, ‘‘सरकारी पैसा से आवास बना है तो लिखा नही जाएगा‘‘। उसने फिर उसी तैश में जबाब दिया, ‘‘तुम लोगन के भी त सरकारी पइसा मिलेला, काहे नही अपने घर-मकान, कपड़ा-लत्ता  पर सरकारी पइसा से बनल लिखवा देते ‘‘।  क्षेत्रीय अधिकारी ने गरीबी मे अपने स्वाभिमान को सहेजती महिला को थोड़ी देर ध्यान से देखा और आगे बढ़ गयी ।
अगला सरकारी आवास अधूरा था, पूछने पर पता चला कि अभी कमरे की कुर्सी ही भरी गयी थी कि  एक एक्सीडेन्ट मे बाएं हांथ-पैर की हड्डी टूट गयी, अब कहां का आवास, अब तो जान बचाने के लाले थे और आवास का पैसा दवा दारु में, उसके दुख मे शामिल होने वाले मेहमानों के स्वागत में खर्च हो गया। 6 महीने घर बैठकर बिना मजदूरी के खाने-पीने का खर्चा भी उसी आवास के पैसे से चला। उसकी औरत भी मेहनत मजूरी करती थी, लेकिन चार जने का खर्चा और दवाई उसकी मजदूरी से निकलना सम्भव नही था। बड़की बिटिया पढ़ाई छोड़कर 6 महीने तक लगातार बाप, छोटे भाई को सम्हाली, चूल्हा-चौका किया तब जाकर वो खड़ा होने लायक हुआ, अभी भी लंगड़ा कर चलता है और मेहनत मजूरी करने लायक नही हुआ है। निराशा में कभी कभार कच्ची दारु लगाकर अपनी किस्मत और परिवार को कोसता रहता है। सरकारी लोगों को उसके दुर्भाग्य से मतलब नही था उनको तो उस पैसे से आवास चाहिए था और वे बराबर उसको सरकारी पैसा नाजायज खर्च नही करने और किसी तरह से आवास बनवाने के लिए कोंचते रहते । क्योंकि उनके कागजों मे यह अधूरा आवास कभी भी बड़ी समस्या पैदा कर सकता था और उपर से जांच मे आने वाले लोगों के लिए यह सरकारी कर्मचारियों को ब्लैकमेल करने के लिए अच्छा चारा साबित होता। क्षेत्रीय अफसर थोड़ी देर तक खड़ी होकर इस समस्या के समाधान के बारे मे सोचती रही, फिर अपने कर्मचारी को उसके पीछे पड़कर किसी तरह से आवास पूरा कराने के लिए लगातार दबाव बनाए रखने की हिदायत देती रही ।
गांव मे झाड़ू-बेलचा लिए सफाई कर्मचारियों से भरा एक ट्रक पहुंच चुका था और हर गली मुहल्ले की सफाई शुरु हो चुकी थी । लोगों ने गलियों मे जानवरों को बांधने वाले खूंटे उखाड़ लिए और अपने घर सामने बची-खुची जगह में जानवरों को बांधा जा चुका था । बाहरी लोगों को सफाई मे लगे देखकर सबने अपने-अपने दरवाजे की सफाई शुरु कर दी थी और कुछ मौके का फायदा उठाकर अपने दरवाजे की सफाई भी करा ले रहे थे, कुछ लगातार व्यंग बोले जा रहे थे कि काश मुख्यमंत्री रोज आते तो इसी तरह सफाई होती, सरकारी लोग इन ब्यंगबाणों को हंसी-मजाक मे उड़ाकर अपने-अपने जिम्मे का काम निपटा रहे थे, अबतक गांव का हर आदमी-औरत वी0आई0पी0 हो चुका था ।  गांव मे पंचायत भवन पर बैठक होने की डुगडुगी बज रही थी, पता चला कि कलेक्टर भी और अधिकारियों के साथ आने वाले हैं । दोपहर में कलेक्टर, कप्तान की गाडि़यां धूल उड़ाती पहुंची, वे आपस में कहां हेलीपैड बनेगा, कहां मंच से मुख्यमंत्री आम जनता को सम्बोधित करेगें, कितने लोगों को मुख्यमंत्री से मिलने दिया जाएगा, पत्रकारवार्ता कहां होगी इसी पर चर्चा करते हुए बैठक स्थल पर पहुंचे ।
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  काफी संख्या मे ग्रामवासी इकठ्ठा थे, कुछ उदास चेहरों से कौतुक निहारने आए थे तो कुछ अपना सारा गुस्सा आज ही उतारने का निश्चय करके गोलबन्द होकर बैठे थे । कलेक्टर ने बोलना शुरु किया, देखिये आप सभी लोगों के लिए और हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि मुख्यमंत्री जी इस गांव मे पधार रहे हैं । आपको जो भी समस्या है कागज पर लिख कर दे दीजिए, उसको मुख्यमंत्री जी तक पहुंचा दिया जाएगा । बजरंगी तमतमा कर खड़ा हो गया, ‘‘साहब मुख्यमंत्री जी आएगें तो उनसे तो बताया ही जाएगा, लेकिन साहब बलिकरना केे साथ इतने दिनों से अन्याय हो रहा है और आपलोगों ने कोई सुनवाई नही किया, पहले इसका जबाव मिलना चाहिए, उसने पूरे सरकारी अमले को घेरना चाहा । इसका गरीबी वाला राशनकार्ड अबतक नही बना है, जबकि इससे अच्छी  हालत के लोगों का गरीबी का राशनकार्ड बन गया है।‘‘ गरीबी के राशनकार्ड पर मुफ्त मे कुछ राशन मिल जाता था, इसीलिए गांव मे इसकी मारामारी थी । मैडम बताइये इनकी समस्या का निराकरण अबतक क्यों नही किया गया, कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी की तरफ मुखातिब होकर पूछा । संयोग से बजरंगी क्षेत्रीय अधिकारी से इस मसले पर बलिकरन को लेकर कईबार मिल चुका था और उसने तहकीकात भी कराया था । ‘‘सर, गांव मे 55 लोगों का ही गरीबी रेखा वाला राशनकार्ड बनना था, अभी 55 लोगों का बन चुका है, आगे जब राशनकार्ड मिलेगा तब बलिकरन का बन जाएगा ।‘‘ प्रधान ने भी क्षेत्रीय अधिकारी की बात का समर्थन किया, लेकिन बजरंगी फिर उठ खड़ा हुआ, उसने कहा ‘‘सर समस्या यह नही है, समस्या यह है कि रामअचल के मरने पर खाली हुआ राशनकार्ड भुआल को दे दिया गया, जबकि बलिकरन उससे ज्यादा गरीब है ।‘‘ दर असल भुआल के पास बलिकरन से दो बिस्वा जमीन ज्यादा थी, सामान्य गणित के अनुसार भुआल बलिकरन से ज्यादा अमीर था, लेकिन भुआल की जमीन का कुछ हिस्सा उसर था और घरवाली को टी0बी0 की गम्भीर बीमारी से अबतब लगा था, इसीलिए प्रधान ने गरीबी रेखा वाला राशनकार्ड भुआल को दिलवा दिया था । प्रधान ने इससे एक तीर से दो शिकार किए थे, पिछले चुनाव मे बलिकरन ने बजरंगी के पक्ष मे बढ़चढ़ कर प्रचार किया था, प्रधान को उसका बदला भी लेना था, इसीलिए उसने भुआल के पक्ष मे राशनकार्ड जारी किया था और बजरंगी उसी को मुद्दा बनाकर लगातार दरखास देता फिर रहा था । उसके लिए मुख्यमंत्री का मुआइना बहुत अच्छा मौका था।
कलेक्टर ने समझ लिया समस्या बलिकरन से ज्यादा बजरंगी की है, उसने बजरंगी से उसका नाम पूछा, फिर पुचकार का बोला ‘ बजरंगी जी मुआइना बीत जाता है तो आप आफिस मे आइए, आपकी सारी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।‘ उसको लगा पुचकार से घोड़ा सध जाएगा, लेकिन घोड़ा और उखड़ गया । ‘साहब एक समस्या हो तो गिनाए, बुढ़ापे का पेंशन कई लोगों को नही मिल रहा है, उनको बड़ी तकलीफ है और कितने अमीर लोगों को मिल रहा है‘ अरे भाई नाम बताइये किनको नही मिल रही है तो इसकी जांच कराई जाय। ‘खड़ा हो जा हो चचा‘ बजरंगी ने इशारा किया और दो-तीन बृद्ध महिलाएं-पुरुष खड़े हो गए । कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी की तरफ प्रश्नवाचक मुद्रा मे सिर घुमाया, सर 42 पेंशन का कोटा है, इस गांव का, जब खाली होगा तब इन लोगों को दिया जाएगा, खाली होना मतलब जब कोई बुढ़ापे का पेंशन पाने वाला मरेगा तो जगह बनेंगी। कलेक्टर ने बजरंगी से पूछा अच्छा किन अपात्र लोगों को पेंशन मिल रहा है, यह भी बताइये ।
अब बजरंगी फंस गया, उसके हिसाब से कई लोग थे जिनको यह पेंशन नही मिलनी चाहिए लेकिन वो किसी का नाम लेकर सबसे खुली दुश्मनी नही लेना चाहता था और चुनाव भी आने वाले थे। साहब आप जांच कराइये, हम काहे बताएं। देखिये हम तो जांच कराएगें लेकिन आपको अगर जानकारी है तो बताइये । उधर कई कर्मचारी कागज कलम लेकर खड़े हुए वृद्धों का नाम, वल्दियत पूछने लगे । कलेक्टर ने आश्वस्त किया ‘घबड़ाइये मत आज कल में  इनके पंेशन का कागज बनालिया जाएगा और कोई समस्या हो तो बताइए।‘ ‘साहब चांपाकल खराब है‘ ‘अरे कब से खराब है।‘ ‘तीन महीना हो गया साहब।‘ क्यों मैडम अभी तक क्यों नही बना, ‘आज सुबह से ठीक कराया जा रहा है, वाशर खराब था, सरकारी वाशर की सप्लाई कल ही हुई है एकाध घण्टे मे ठीक हो जाएगा।‘ इस बार संन्तोषजनक जवाब से कलेक्टर आश्वस्त हुआ, क्षेत्रीय अधिकारी को भी कुछ राहत महसूस हुई ।
‘आप इन लोगों की समस्या सुनिये‘ तमाम छोटे-बड़े अधिकारियों को सहेजता हुआ कलेक्टर कप्तान को लेकर एक कोने मे चला गया ‘ऐसा करिए एक तेज तर्रार दारोगा लगाइये । जितने शिकायती पत्र मिल रहे है, उसमे कौन-कौन शरारती हैं, जो मुख्यमंत्री जी की विजिट मे बवाल कर सकते है, उनको देर रात मे ही उठवा लीजिए और कल शाम तक छोड़ दिजीएगा । देखिए बहुत सावधानी से यह काम होना चाहिए कोई हल्ला-गुल्ला न हो और उनको किसी किस्म का टार्चर नही होना चाहिए नही तो मीडिया वाले तिल का ताड़ बना देगें ।‘ सर, मैने पहले ही लगा दिया है और उसने लिस्ट भी तैयार कर ली है । उसमे वो क्या नाम है इसका जो बहुत बोल रहा है, बजरंगी कप्तान ने बताया, ‘हां बजरंगी को भी डाल दीजिएगा, यह भी बखेड़ा खड़ा करेगा।‘ ‘यह प्रधान कैसा आदमी है, ठीक-ठाक है सर कोई क्रिमिनल रिकार्ड नही है । ऐसा करिएगा, कल सुबह से ही गांव की घेरेबन्दी करा लिजिएगा, कोई अनावश्यक व्यक्ति गांव मे घूमता दिखाई न दे । अरे हां एक काम और करियेगा, मेरी अभी शासन मे बात हुई है, मुख्यमंत्री जी गांव मे कार से पहुंच कर दो मिनट के लिए किसी गली में पैदल चलेगें, किस गली में चलेगें, ये जल्दी ही डिसाइड हो जाएगा । जिस गली में मुख्यमंत्री जी चलेगें उस में पड़ने वाले मकानों में गंवई वेश मे 100-150 सिपाहियों को खड़ा करा दीजिएगा, जिससे लगे कि वे भी गांव वाले ही है और मुख्यमंत्री जी के जाने तक कुछ पेशेवर लोगों को जिन्दाबाद का नारा लगाते रहने के लिए लगा दीजिए, जानते ही हैं इन नेताओं यह सब कितना पसन्द होता है । मुख्यमंत्री तो इन नारा लगाने वालो को हाथ हिलाते अभिवादन स्वीकार करने मे ही व्यस्त हो जाएगें, फिर कितना समय ही उनके पास बचेगा । कलेक्टर ने मुस्कराकर अपनी योजना समझाई ।
कप्तान सहमति मे केवल सर.....सर बोलता रहा । फिर कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी को भी अपने पास बुलाया और शेष योजना मे भागीदार बनाने की गरज से बोलने लगा, नगर पालिका वालों से कहो कि तीन-चार सौ और सफाई कर्मचारी रात के शिफ्ट मे लगा दें और बिजली के प्रकाश मे रातभर सफाई का काम इस तरह चलता रहे कि गांव वाले रातभर सो नही पाएं, इनके साथ ही पुलिस लाइन से दो-तीन सौ रंगरुट सिपाहियों को रात भर गांव की गलियों मे मार्च कराइए । कप्तान ने प्रश्नवाचक मुद्रा मे आदत के मुताबिक बोला......सर । आप समझ नही रहे हैं, रात भर जागने से और इतने अनजाने लोगों के इस गांव मे घूमने से ये लोग अपने गांव मे ही अपरिचित महसूस करने लगेगें और तब इनके कान्फिडेन्स का लेवल कुछ कम हो जाएगा, जिससे कल इनको हैण्डल करने मे आसानी हो जाएगी और ये भी सोचेंगे कि किसी तरह से बिना और किसी लफड़े के यह कार्यक्रम जल्दी खत्म हो और उनको सुकून मिले । कप्तान सहमति में बोला.........सर, फिर दारोगा को लेकर एक किनारे चला गया। यार कलेक्टर साहब कह तो रहे हैं लेकिन किसी को अनावश्यक उठाने मे लफड़ा खड़ा हो जाएगा, तब ये लोग किनारे हो जाएगें और झेलेंगे हम । कुछ ऐसा करो कि इनको उठाने पर लोगों को हमारा काम जेनुइन लगे। ठीक है.....सर । दारोगा एड़ी चटकाते हुए दूर चला गया ।
दारोगा ने प्रधान को किनारे ले जाकर कुछ खुसर-फुसर किया । गांव की बैठक खतम हो चुकी थी, अधिकतर लोग अपने-अपने घर की तरफ निकल लिए ।
 रात 8 बजे बजरंगी के दरवाजे पर कोई दूर से चिल्ला कर बताया कि उसके मटर के खेत मे किसी की भैंस चर रही है, बजरंगी का बेटा गरम दिमाग का था, तुरन्त लाठी लेकर दौड़ पड़ा और उसके पीछे-पीछे बजरंगी भी उसको सम्भालने के लिए दौड़ा। गाली-गलौज से शुरु होकर लठ्म-लठ्ठ होने लगा । गांव के दूसरे टोले मे पूरा प्रशासन था और कुछ सिपाहियों के साथ दरोगा पहुंचा। सिपाहियों ने दोनो पक्षों को अलग-अलग किया और दारोगा फटकारने लगा ‘मुख्यमंत्री जी आ रहे हैं और आपलोग यही नजारा पेश करेगें उनके सामने। इनलोगों को थाने ले चलिए ।‘‘ बजरंगी, उसका बेटा और विपक्षी गाड़ी मे बैठाकर थाने भेज दिए गए, लोग मौके की नजाकत समझ कर शान्त होकर तमाशाई बने रहे । गांव मे  बिजलीे की सप्लाई मे कोई गड़बड़ी आ गयी थी जिसको ठीक होने मे तीन-चार घण्टे लगते, लेकिन वक्त कहां था । रात भर में खड़न्जो की मरम्मत होनी थी, चार-पांच बड़े-बडे जनरेटर गलियों मे खड़े कर दिए गए कुछ उनका शोर, कुछ रात भर काम करने वाले लोगों का शोरगुल गांव वालो के लिए असहज हो गया था। दरवाजे पर बंधे जानवर  बैठ नही पा रहे थे वो  लगातार खूंटे के चारो ओर चक्कर लगा रहे थे, बच्चे दौड़कर बाहर निकल रहे थे, अजनबियों को देखकर घूंघट काढ़े औरतों को नित्यक्रिया में परेशानी हो रही थी । झुंझलाए पुरुष कभी खड़ा होकर काम देखते, कभी बिेस्तर पर लेटते, बच्चे तमाशा देख-देख कर थक गए थे । काम करने वाले गांववालों से कभी पानी मांगते, कभी कुछ खाने पीने का इंतजाम करने का अनुरोध करते । लगता था पूरे गांव मे हर किसी के दरवाजे पर बारात आयी है।
पृथ्वी अपनी गति से ही चल रही थी लेकिन उस गली की मरम्मत करने वालों और मरम्मत कराने वालों का समय जैसे भाग रहा था । इस तमाम शोरगुल के कारण जिनकी दैनिक चर्या प्रभावित हो गयी थी उनका समय थम गया था, उनको लगता था जैसे इस रात की सुबह नही होगी ।
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मुख्य मरम्मत का काम पूरे गांव को उत्तर और दक्खिन मे बांटने वाली ईट की सड़क का हो रहा था । प्रधानी खाते मे पैसा आने के शुरुआत मे यह सड़क बनी थी । यह सड़क बहुत दिनों तक गांव का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी, क्योंकि तबतक इसके किनारे जनसंख्या वृद्धि और बंटवारे से इतनी सघन बस्ती नही हुई थी । गांव के पुराने लोगों को इसके खूबसूरत दिखने का राज था इसका इतिहास, जब यह कच्ची थी। प्रायः घरों के नाबदान और बरसाती पानी मिल कर इसको मसाला  देते जिसको इस रास्ते पर गुजरने वाले गाय, भैंस, बैल आदि जानवर इतना मथ देते कि इस रास्ते को पार करना बच्चों और बूढ़ों के लिए दूरुह हो जाता । इस रास्ते को पार करने की कोशिश मे कितने बूढ़ों की हड्डियां ऐसी चटकी कि उन्होने बिस्तर पर ही इस दुनिया को सलाम किया था। कितनी नयी नवेली दुलहिनों के लिए यह सड़क उनकी झिझक और शरम तोड़ने का कारण बन गयी, क्योंकि इस सड़क को नित्य क्रिया के लिए रोज ही पार करना होता था।
 कहने का मतलब साल मे चार महीने यह सड़क साधन नही चुनौती होती थी, लोग इस सड़क से जाते नही थे इसको पार करते थे, जैसे कोई नदी पार करते हों । जिस साल परधानी खाते मे पैसा आया, सबने इस सड़क को ही बनवाने पर जोर दिया, शुरु के कई साल इस पर मिट्टी फेंकी गयी, फिर जब इसको ईट से बनाने का प्रयास प्रधान ने किया तो सेकेटरी ने समझाया, परधान जी लम्बा काम है, लगभग 200 मीटर का । ईट के सरकारी रेट और बाजार के रेट मे डेढ़गुने का अन्तर है। इस रास्ते के लिए जितनी ईट चाहिए उतनी सरकारी रेट से खरीदने पर लगभग 50 मी0 काम नही हो पाएगा क्योंकि ईट सरकारी रेट पर भट्ठे से मिलेगी नही, परधान  दलित जाति का था चिहुंक गया । उसको लगा अगर बाजार के रेट पर ईट खरीद कर सड़क बनवा दिया तो आएगें-जाएगें सभी लेकिन पता चलते ही अपर कास्ट वाले दरखास ठोंकनेे लगेगें और वो जानता था जांच का मतलब है जांच करने वालों की जी हजूरी और जेब गरम करना।
परधान कुछ महीनों तक ठंडा पड़ा रहा, तबतक पूरा गांव उसको गरियाने लगा। वो सीधा-सादा आदमी था जो मात्र दुर्घटनावश प्रधान हो गया था क्योंकि गांव के अपर कास्ट और पिछड़ों को उस दलित की विनम्रता पसन्द थी । उसने ब्लाक पर जाकर अनुभवी लोगों से राय ली, उन्होनें बताया कि परधान जी इस सड़क को दो बार मे बनवाओ, एक साल पूरब तरफ से 100 मीटर फिर दूसरे साल पश्चिम तरफ से 100 मीटर तब जाकर 200 मीटर ईट की सड़क बनेगी क्योंकि उसमे 50 मी0 कामन हो जाएगा। परधानी कागज मे तो बस फलाने के कुआं से फलाने के दुआर तक ही लिखा जाएगा, इसको गांव के बाहर का आदमी पकड़ नही पाएगा । काम पर पूरे गांव की निगाह थी, कागज कौन देखता है इसलिए प्रधान ने हिम्मत करके सड़क बनवाई और पूरे गांव ने इस पर से अपना अतिक्रमण स्वेच्छा से या समझाने पर हटा लिया ।
इस प्रकार यह सुन्दर सी सड़क एक कागजी अनियमितता से ही बन पायी। इस सड़क के एक तरफ अपर कास्ट और पिछड़ो की मिश्रित आबादी थी तो दूसरी तरफ पिछड़े और दलितों की मिश्रित आबादी थी। कई साल तक गांव वाले पूरे गर्व से उस सड़क के गुजरते। घर आने वाले मेहमानों से उस सड़क से पैदा हुई सुविधा का बखान सुनकर सीना फुलाते और जिनका घर उस सड़क से सटा हुआ होता था वो अपना दुआर साफ करते समय कभी-कभी इस सड़क को भी साफ कर दिया करते थे । कितनी अर्थियां और डोलियां इस सड़क से गुजर गयीं, धीरे-धीरे इस सड़क पर से बैलों और गायों के गले मे बजती घण्टियों की आवाज गुम होकर मोटर साइकिलों और ट्रैक्टरों की कर्कश आवाज गूंजने लगी । समय गुजरने पर यह सीधी सपाट सड़क ट्रैक्टरों की उझल कूद से उबड़ खाबड़ हो गयी थी । आज रात उसी सड़क के दिन फिर गए थे, कई दर्जन मजदूर उसके पुराने टूटे फूटे ईटों को उखाड़ कर नयी ईटें लगा रहे थे, क्योंकि प्रशासन को अन्दाजा था मुख्यमंत्री की कार इस सड़क से गांव के भीतर भी जा सकती है, यदि उनकी कार को इस पर गुजरने मे झटके लगे तो जिले के अफसरों को कई झटके लग जाएगें।
 
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गांव की जिस मुख्य सड़क की मरम्मत हो रही थी, उसके किनारे से बिजली के तार गुजरे थे, जिसके तीसरे खम्भे के बगल से एक गली भीतर जाकर गांव की आबादी में गुम हो गयी थी । उसी गली मे रामअधार और शिवअधार सगे भाइयों का घर था। घर के बर्तनों के काफी लड़ने के बाद दोनो भाइयों मे आंगन से लेकर गली तक दीवाल खिंच गयी थी । वैसे दोनो भाइयों मे काफी प्रेम था लेकिन सौभाग्य से शिवअधार का बेटा सरकारी विभाग के चपरासी हो गया । इस खबर को सुनकर कुछ पड़ोसियांे ने मुह बिचकाया लेकिन कुछ लोग समझ गए कि उसने कितनी बड़ी लाटरी जीती है। का समझते हैं.........चपरासी को.....................10 हजार के उपरे तनखाह होगी.....................बिला नागा मिलेगी.................आराम से...............न धूल मिट्टी लगेगी.............न पसीना बहेगा। कौने धंधा मे एतना कमाई है............................बताओ जरा...........................बड़े-बड़े खेतीबारी वाले.....................दुकान-दौरी वाले को हर महीना एतना निकालना मुश्किल है। परिवार में मुश्किल अब शुरु हो गयी थी, शिवअधार के नाती  सरकारी प्राइमरी स्कूल की जगह नर्सरी स्कूल मे जाने लगे, उनको स्कूली ड्रेस, पानी का बोतल, टिफिन दिया जाने लगा और यहीं से पतोहों मे तकरार शुरु हो गयी । एक तरफ रामअधार के नाती कउवा...क, खरहा...........ख पढ़ते दूसरी तरफ शिवअधार के नाती ए फार एप्पुल, बी फार ..........बैट पढ़ते। घर में ऐसी असमानता आ गयी, जिसके कारण बंटवारा अवश्यंभावी हो गया था । बाप..........मतारी...........गोरु.........बछरु.........गहना..........गुरिया.........लोटा........थरिया..........हित...........नात सब बंट गए।
 जिन भतीजों ने चाचा की नौकरी मिलने पर होने वाली सतनरायन की कथा का बोलउवा बड़ी उमंग से आस पड़ोस मे बांटा था, दौड़-दौड़ कर पंजीरी-चरनामृत बांटा था, वही भतीजे आंगन मे दीवाल के उस पार से आ रही कुकर की सीटी से निकल रही महीन चावल की गंध, गरम मसाले की खुशबू, गाहे बगाहे तरी जाने वाली पूड़ी-कचौडि़यों की महक पर मन मसोस कर अपनी रसोंई का बासी-कुबासी खाकर मनमार कर सोने लगे । यही भतीजे चाचा की नौकरी लगने पर आस-पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों को बड़े गुमान से बताया करते कि आज चाचा क्या लेकर आए थे, वो सब पराया था जिसे रिश्तों की क्रूरता ने उन्हे अनकहे समझा दिया था । हजारों साल की सभ्यता के विकास ने बाहर के जंगल को हमारे मन मे बसा दिया है, जिसमे सामर्थ्यवान के लिए ही सबकुछ होता है ।
शिवअधार के कमासुत बेटे से मिलने-जुलने वालों का एक भिन्न स्तर भी हो गया, ऐसे में प्राइवेसी के लिए चहारदीवारी जरुरी हो गयी, दीवार  आंगन से चली, दरवाजे पर आकर ठिठक गयी, सामने कटहल का पेंड़ खड़ा था। रामअधार और शिवअधार ने बहुतेरी कोशिश की लेकिन न कोई एक इंच  जमीन छोड़ना चाहता था और न कोई कटहल का पेंड़। बंटवारा करने वाले गुनी रिश्तेदारों ने तमाम जोड़ घटाना करने के बाद कटहल का पेंड़ रामअधार के हिस्से मे दिया था।
कटहल के पेंड़ की भी अपनी यादें थी । एक बार उनकी मां शिवअधार को लेकर नैहर गयी थी, वहां से उसको बिदायी मे पका कटहल मिला था, जिसका कोआ परिवार ने कई दिनों तक बड़े मन से खाया था । इधर उधर फेंके गए बीजों मे एक बीज अपने शुरुआती संघर्षो के बाद जिन्दा रह गया, जिसको ननिहाल की देन मानकर रामअधार और शिवअधार ने बड़े जतन से बचाया था। कटहल धीरे-धीरे बड़ा होता गया, उसकी छाया मे परिवार की साल के गर्मियों वाले तीन-चार महीने की दोपहर और हल्के जाड़े मे दो-तीन महीने की रातें गुजरती थी, वो कटहल उनके घर की पहचान हो गया। किसी नए मेहमान को उनके घर तक पहुचने के लिए वह कटहल न सिर्फ लाइट हाउस का काम करता बल्कि पड़ोसियों के यहां पहुंचने वाले नए-नवेले मेहमानों के लिए एक जरुरी पहचान होता था । लोग अजनबियों को पता बताते थे..............अरे उस कटहर के पेंड़ से तीन घर आगे ही फलाने का घर है। अब वही कटहर उस दीवार के सामने खड़ा हो गया था । रामअधार का उस पेंड़ के प्रति आसक्ति इसलिए भी थी कि यह पेंड़ इतना फलता कि हर साल सीजन के कटहल बेंच कर उससे कुछ आमदनी हो जाती, इस प्रकार उस डगमगाती अर्थव्यवस्था के लिए यह पेंड़ बहुत बड़ा सहारा था।
 शिवअधार जमीन छोड़ने के लिए तैयार नही था और रामअधार पेंड़ छोड़ने के लिए । अन्त मे फैसला यह हुआ कि कटहल के तने तक दीवाल जाएगी, फिर उसके तने के उस पार से दीवाल खड़ी की जाएगी । तने के दोनो तरफ दीवाल बनाने के लिए नींव खोदने में कटहल की जड़ों को काफी लहूलुहान हो गयी थी, लेकिन मामला यहीं नही रुका । शिवअधार के चपरासी बेटे की तनखाह इतनी अतिरिक्त आमदनी ला रही थी कि उसके दिमाग में नित कुछ नया चलता रहता । दुआर की छोटी सी बची जमीन को शिवअधार ने पक्का फर्श करा दिया और दबगंयी करते हुए कटहल की कुछ डालों को भी छंटवा दिया । कुछ इन्ही कारणों से कटहल इस साल फला नही था, जिसका रामअधार को काफी सदमा लगा था हालांकि आर्थिक क्षति की भरपायी संयोग से नेनुआ, भिण्डी ने कर दी थी, जो थोड़ा पहले फलने लगा था, जिसके कारण कुछ बाजार-भाव अच्छा मिल गया था, लेकिन रामअधार को लग रहा था कि शायद कटहल अब कभी न फले, जिसका निराकरण गाहे-बगाहे लोगों से पूछा करता था, सभी लोग जो कारण बताते थे, उसका निदान उसके हांथ मे नही था।
 शिवअधार के चपरासी बेटे को समझ में आने लगा कि गांव मे तो उससे काबिल-काबिल लोग पड़े हैं लेकिन उसको सरकारी नौकरी मिलना ईश्वर की कृपा और पिछले जनम के सुकर्मो का ही नतीजा है। नही तो यही नौकरी पाने के लिए लोग लाखो रुपया घूस देते हैं, लाखो रु0 खरच करके बड़ी-बड़ी पढ़ाई करके बंगलौर, दिल्ली जैसे शहर मे इतना ही पाते हैं । ईश्वर कृपा के प्रति उसकी उमड़ती आस्था ने उसको पुरोहितों के काफी नजदीक ला दिया। जिन्होने उसे बताया कि अभी तो सब ठीक है लेकिन दरवाजे पर दूध वाला पेंड़ शुभ नही होता है दर असल कटहल के तने या पत्तो को तोड़ने से जो सफेद द्रव निकलता है, लोक प्रचलन मे उसको दूध कहा जाता है । कटहल के पेंड़ के कारण उसके परिवार को कितनी क्षति हुई थी, अब उसको समझ में आया ।
उसका बाप शिवअधार बम्बई मे कपड़े के मिल मे नौकरी करता था, कई साल नौकरी करने के बाद उसकी मां को भी बम्बई अपनी चाल मे लेकर गया था, वहीं पर उसकी मां ने पहली बार समुद्र देखा था, बड़ा-बड़ा पानी का जहाज, लोकल ट्रेन, बड़ा पाव जिसका जिकर वह बात-बेबात करती रहती थी, दुर्भाग्य से कपड़े की मिल हड़ताल में बन्द हो गयी, और कुछ महीने बेकार रहने के बाद उनका परिवार मन मारकर गांव चला आया था, तब उसके बड़के बाउ ने बहुत सहारा दिया था, उनको लगा ही नही कि वे किसी दूसरे के घर मे आए हैं, उनको लगा जैसे वे अपने घर ही परदेश से लौटे हैं । उसको समझ में आ गया कि यदि दुआर पर यह कटहल का पेंड़ नही रहता तो शायद मिल बन्द नही होती और वे सब अब भी बम्बई जैसे महानगर मे बेहतर जिन्दगी जी रहे होते । आगे यह कटहल कौन सा अशुभ कर देगा इससे पहले इससे निजात पाना जरुरी है लेकिन बड़का बाउ  तो समझते ही नही है। इसीलिए उसने भरसक कोशिश किया कि कटहल की जड़ों को इतना नुकसान हो जाए कि वो अपने आप ही सूख कर खतम हो जाय।
आज रात रामअधार का भी वक्त थम गया था, धमा चौकड़ी से उसको नींद नही आ रही थी ।  
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अगले दिन सुबह दस बजते-बजते गांव तमाम जाने-अनजाने लोगों से भर चुका था । मुख्यमंत्री के आने का समय हो चुका था । जिस खड़न्जे वाले रास्ते से मुख्यमंत्री को गुजरना था उसके किनारे-किनारे मोटी-मोटी रस्सियों से बैरिकेटिंग किया जा चुका था । गांववासी उसी बैरिकेटिंग के किनारे खड़े होकर इंतजार कर रहे थे, उनके अगल-बगल खड़े इतने अनजाने चेहरे थे कि वे खुद ही अजनबी होकर तमाशायी बन गए थे । एकाएक सायरन बजाती धूल उड़ाती गाडि़यों का काफिला तेजी से गांव के किनारे से होते हुए बाहर की तरफ खड़ा हो गया और एक कार उस खड़न्जे की तरफ तेजी से घूम गयी । कार मालाओं से लदी हुई थी । गांव के भीतरी रास्ते पर कार धीरे-धीरे चलने लगी और उसके शीशे में से हाथ निकल कर अभिवादन करने लगा । भीड़ उत्साहित होकर नारे लगाने लगी, गांव के लोग भी उन नारों मे सम्मिलित हो गए । एकाएक मुख्यमंत्री कार रोक कर बाहर निकल पड़े । किनारे पर खड़े लोगों ने नारों के साथ फूल मालाओं की बरसात कर दी । गांव वाले कभी नारे लगाने वालों को, कभी फूल माला फेंकने वालों को अकबका कर चीन्हने की कोशिश करने लगे, मुख्यमंत्री के पीछे-पीछे सैकड़ों पुलिस, आला अधिकारियों का हुजूम था । मुख्यमंत्री गांव वालों का अभिवादन स्वीकार करते, उनको चुप रहने के लिए पुचकारते लेकिन जोश थमने का नाम ही नही ले रहा था । दरअसल कलेक्टर ने सरकारी पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ताओं को भी मजमे मे घुसेड़ रखा था, वो सब मुख्यमंत्री की नजदीकी से ही प्रफुल्लित थे ।
एकाएक मुख्यमंत्री ने एक दीनहीन दिखने वाले ग्रामीण का हाथ थाम लिया। कई दिनों की बड़ी दाढ़ी, धूप में झुलसा पोपला चेहरा तमाशे के केन्द्र मे आ गया। कैमरों के फ्लैश चमकने लगे, पोज के लिए मुख्यमंत्री ने उस बुर्जुग को अपने करीब कर लिया । दादा तबीयत कैसी है, ठीक......है, साहब बुजुर्ग ने जबाब दिया । कउनो समस्या तो नाही है ! बुजुर्ग सारी रात उधेड़ बुन मे था, बोल उठा ‘साहेब इ....साल कटहरवा नाही फरा‘ । इतना सुनते ही सरकारी मशीनरी हरकत मे आ गयी । बागवानी का अधिकारी पेश कर दिया गया ।
बागवानी वाले अधिकारी ने सपने मे भी नही सोचा था कि आज उसकी भी पूछ हो सकती है। वो तो मजमे मे खड़ा होकर अपने साथी अधिकारियों के साथ हंसी-ठिठोली कर रहा था। उसकी पहली पोस्टिंग थी । बड़ी मेहनत से हुई सलेक्शन के बाद पहला जिला था, उसके बाप ने उसकी शादी मे खींच कर दहेज लिया था, अभी वो उसी को पचा रहा था। उसने जल्दी ही शादी की साल गिरह मनाई थी, तमाम सालियों, सालों, साढ़ूओं के स्वागत और बिदायी में ही उसके दिन महीने खर्च हो रहे थे । मुख्यंमत्री के मुआइने को सुनकर उसकी बीबी ने भी तमाम अफसरों की बीबीयों की तरह सकुशल बीत जाने पर शहर के चर्चित मन्दिर मे लड्डू चढ़ाने का संकल्प लिया था, जिसका उसने खूब मजाक उड़ाया था।
जब उसको पुकारा गया तो उसकी हवाई उड़ने लगी। मुख्यमंत्री ने गरजती हुई आवाज मे पूछा कब से तैनात हो.............सर 2 साल हो गए । कभी इस गांव मे आए हो, वो क्या जबाब देता थूक निगलकर सर.....सर करने लगा । आपको इनके कटहल मे फल नही लगा है इसकी जानकारी है । वो क्या जबाब देता....सर.....सर  कहकर फिर चुप हो गया । एकाएक मुख्यमंत्री भीड़ की तरफ मुखातिब हुआ । ये जिले के बागवानी के अफसर हैं, इनको कभी आपने देखा है........खिलन्दड़ो ने जोर से ललकारा.....कब्भौं नाही । इनको तत्काल सस्पेण्ड किया जाता है । लकदक कपड़ा पहने अफसर भींगी बिल्ली बनकर खड़ा था, जनता उसको देखकर तालियां बजा रही थी, जैसे फ्रांसिसी क्रान्ति में उसको गिलोटिन पर चढ़ाया जा रहा था, मुख्यमंत्री की जै-जै कार हो रही थी । मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को फटकारा कि आपलोग इन बुजुर्ग का भी खयाल नही रख सकते है, इसके लिए भी मुझको आना पड़ता है। तालियों की गड़गड़ाहट मे मुख्यमंत्री तेजी से कार मे घुसा और कार हूटर बजाते हुए रास्ता बनाने लगी । गांव जय-जयकार मे डूब गया, बड़े-बड़े सरकारी अफसर दौरा ठीक-ठाक बीत जाने की खुशी में किसी बड़े होटल मे पार्टी की तैयारी कर रहे थे। राम अधार को शाम को खटिया पर लेटे-लेटे कटहल के पेंड़ को निहारते-निहारते गहरी नींद आ गयी थी ।
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मंगलवार, 14 जून 2016

-चक्र-


नेता को,
फौज चाहिए।
फौज को,
राज्य चाहिए।
राज्य को,
देश चाहिए।
देश को,
हथियार चाहिए।
हथियार को,
दुश्मन चाहिए।
दुश्मन को,
खून चाहिए।
खून को,
उपदेश चाहिए।
उपदेश को,
जन्नत चाहिए।
जन्नत को,
दोजख चाहिए।
दोजख को,
धरती चाहिए।
धरती को,
चांद चाहिए।
चांद को,
रोटी चाहिए।
रोटी को,
नींद चाहिए।
नींद को,
सपने चाहिए।
सपनों को,
फिर नेता चाहिए।

का कइलन बाऊ ?


जिनको संयुक्त परिवारों का सुख और हश्र पता है, वो ऐसे सवालो पर चैंकते नही हैं अपितु समय की महिमा को स्वीकार करते हुए पी जाने का अभ्यास कर लेते हैं ।
जब आंगन मे उठती दीवालें सवाल करने लगती हैं, चूल्हे मे दरार और भाई पट्टीदार बनते हैं तों तोहमतो के ऐसे ही सिलसिले उठते हैं ।
सरकारी स्कूल की फीस कई महीनो पर किसी तरह जमा कर पाने की विवशता और कहने पर भी बच्चों को ट्यूशन नही करा पाने की मजबूरियां पिछली पीढ़ी की अर्कमण्यता समझी जाती हैं।
थकता मिजाज और बूढ़ा होता शरीर नयी कोपलो के रोज बदलते स्कूल परिधानो और टिफिन के मैगी नूडल्स को देखकर अपराधबोध से भर उठता है कि वे अपने बच्चो को ऐसा सुख नही दे पाए और उनकी तोहमतो को जाने-अनजाने मे स्वीकार करने लगते हंै।
ऐसे मे शायद ही कभी याद आता है कि कैसे अपने पालितो की नौकरियों के लिए जिसतिस के दरवाजे पर उन्होने मत्थे टेके थे, कैसे पढ़ाकू बच्चे लिए उन्होने अपनी जरुरतो को नगण्य बना दिया और कैसे उन्होने उनके सपनों के लिए अपने गांव, समाज और भाइयों से दगा किया था ।
अपनी पीढ़ी के रिश्तो मे सूखती नमी और नौजवान पीढ़ी के रिश्तो मे पनपती गर्मी के बीच उनको पता ही नही चलता कि जिसको उन्होने पाला पोसा उनके लिए वे अप्रासंगिक हो गए ।
ऐसे ही जब 60 साल मे क्या हुआ ? जैसे व्यंग जब आभाषी दुनिया मे तैरते हैं, तो होटलनुमा कालेजो से निकलते युवा और सोशल साइटों की चिप्पियो से देश, इतिहास और समाज को जानने का अभिमान पाले लोगों के तंज जाने-अनजाने स्वीकार होने लगते हैं।
तब याद नही आता है कि सरकारी योजनाओं की लूट और सुविधा पर पनपी यह पीढ़ी विगत की असफलताओ को गिनाते हुए उन्ही बुनियादों पर हमलावर हो रही है, जिसने उसको तंज करने लायक हैसियत बख्शी है।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...