राजनीति
विश्व राजनीति की दिशा के अनुरुप भारतीय राजनीति भी चमत्कारिक रुप से नए चोले मे कुलांचे मार रही है यह उसी तरह अप्रत्याशित नही है, जिस तरह नेहरुवादी समाजवाद अप्रत्याशित नही था । लेकिन इसने बस चोला ही बदला है, उसके भीतर वही उच्च मध्यमवर्ग है जिसने 47 के बाद के भारत पर अपने शिकंजे को दिन ब दिन मजबूत किया है।
शुरुआती एक-दो दशकों मे इस उच्च मध्यम वर्ग ने पूंजी को आंखे तरेर कर अपनी हैसियत का आभास कराया और अपनी वाम भाव भंगिमा से वंचितो का विश्वास हासिल करके अपनी हैसियत मे इजाफा करने का उपक्रम किया । इस पूरे दौर मे भी उच्च मध्यम वर्ग की वाम मुद्रा से पूंजी को कभी असुरक्षा नही महसूस हुई अपितु दिन ब दिन इनकी बढ़ती हैसियत और संख्या ने उद्योग जगत को अपने द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित उत्पादों के लिए विशाल ग्राहक वर्ग प्रदान किया ।
यह वर्ग उद्योग जगत की उत्पादित द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित सामग्रियों का न सिर्फ बड़ा ग्राहक वर्ग है अपितु इसने विशाल वंचित वर्ग मे उपभोगवादी जीवन पद्धति को स्वीकार्य बनाया है। इसने वंचित वर्ग को कभी महंगी जीवन पद्धति, अमीरी-गरीबी की गहरी होती खाई मे से मेढकों की मानिन्द निकलते अरबपतियों, लाखो रु0 महीने के खर्च वाले विद्यालयों आदि की उपादेयता पर मजबूती से प्रश्न नही उठने दिया।
अवसर मिलते ही इस देश को बंधक बनाए उच्च मध्यमवर्ग ने तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को येनकेन प्रकारेण ध्वस्त करते हुए शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्रों को मुनाफा कमाने वाली फैक्ट्रियो मे बदलनें का लगातार प्रयास किया है और अपने दुष्प्रचार के चलते वंचितों को यह समझाने मे सफल रहा है कि सार्वजनिक उपक्रमों के ध्वस्त होने मे मनुष्य के नैसर्गिक चरित्रगत दोष का हाथ है। ठीक उसी तरह से जैसे अंग्रेजों ने चीन मे अफीम की बिक्री नही रोकने के लिए चीनियों के चरित्रगत दोष का हवाला दिया था ।
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन सुविधाओं का आकर्षण इतना प्रबल हो चुका है कि जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को त्यागकर कन्दराओं मे धूनी रमाने वाले बाबा और महात्मा वेशधारी लोग हाल के वर्षो मे बहुत तेजी से कन्दराओं से निकलकर पांच सितारा होटलो मे प्रतिष्ठित हो चुकें है ।
वर्तमान समय मे तमाम लाल, नीले, केसरिया, हरे, पीले राजनैतिक खेमो का नेतृत्व करने वाले वर्ग को देखें तो एक दूसरे के विरोध मे अपनी सुबह-शाम खर्च करने के बावजूद इनके जीवन पद्धति मे लगभग समानता है, इनके व्यक्तिगत खातो मे प्रायः करोड़ो की धनराशि रहती है, ये कभी सार्वजनिक परिवहन, सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक चिकित्सा, सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की न तो निजी जीवन मे पैरवी करते हैं और न ही बगैर किसी राजनैतिक जरुरत के इनका उपयोग करते हैं।
असमानता की सहज स्वीकार्यता को जाति व्यवस्था ने हमारे जीवन मे पीढि़यों से प्रतिष्ठित कर रखा है और हमारे समाज का वंचित वर्ग इनके प्रति कृतज्ञ भाव रखने के लिए सदियों से अनुकूलित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरुप इन राजनैतिक नेतृत्वों के पीछे गोलबन्द समुदाय को उनकी मंहगी उपभोगवादी जीवन पद्धति चुभती नही है। इन गोलबन्द समुदायों के लम्पट युवा इनकी महंगी कारों मे लटक कर हथियारों को ढोने के अपने सौभाग्य पर वैसे ही इतराते हैं जैसे अंग्रेजी नौकरशाही द्वारा छोड़ी गयी परम्परा को निभाते चपरास का मुकुट पहन कर अर्दली इतराते रहते हैं।
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन स्तर पाने की अभिलाषा मे अनैतिकता और लालच की होड़ पर लगाम लगाने के लिए और सादगी को पुर्नप्रतिष्ठित करने के लिए उपभोगवादी जीवन पद्धति की धुंधली पड़ चुकी सीमारेखाओं का पुर्न रेखांकन आवश्यक है।
शुरुआती एक-दो दशकों मे इस उच्च मध्यम वर्ग ने पूंजी को आंखे तरेर कर अपनी हैसियत का आभास कराया और अपनी वाम भाव भंगिमा से वंचितो का विश्वास हासिल करके अपनी हैसियत मे इजाफा करने का उपक्रम किया । इस पूरे दौर मे भी उच्च मध्यम वर्ग की वाम मुद्रा से पूंजी को कभी असुरक्षा नही महसूस हुई अपितु दिन ब दिन इनकी बढ़ती हैसियत और संख्या ने उद्योग जगत को अपने द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित उत्पादों के लिए विशाल ग्राहक वर्ग प्रदान किया ।
यह वर्ग उद्योग जगत की उत्पादित द्वितीयक आवश्यकताओं से सम्बन्धित सामग्रियों का न सिर्फ बड़ा ग्राहक वर्ग है अपितु इसने विशाल वंचित वर्ग मे उपभोगवादी जीवन पद्धति को स्वीकार्य बनाया है। इसने वंचित वर्ग को कभी महंगी जीवन पद्धति, अमीरी-गरीबी की गहरी होती खाई मे से मेढकों की मानिन्द निकलते अरबपतियों, लाखो रु0 महीने के खर्च वाले विद्यालयों आदि की उपादेयता पर मजबूती से प्रश्न नही उठने दिया।
अवसर मिलते ही इस देश को बंधक बनाए उच्च मध्यमवर्ग ने तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को येनकेन प्रकारेण ध्वस्त करते हुए शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्रों को मुनाफा कमाने वाली फैक्ट्रियो मे बदलनें का लगातार प्रयास किया है और अपने दुष्प्रचार के चलते वंचितों को यह समझाने मे सफल रहा है कि सार्वजनिक उपक्रमों के ध्वस्त होने मे मनुष्य के नैसर्गिक चरित्रगत दोष का हाथ है। ठीक उसी तरह से जैसे अंग्रेजों ने चीन मे अफीम की बिक्री नही रोकने के लिए चीनियों के चरित्रगत दोष का हवाला दिया था ।
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन सुविधाओं का आकर्षण इतना प्रबल हो चुका है कि जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को त्यागकर कन्दराओं मे धूनी रमाने वाले बाबा और महात्मा वेशधारी लोग हाल के वर्षो मे बहुत तेजी से कन्दराओं से निकलकर पांच सितारा होटलो मे प्रतिष्ठित हो चुकें है ।
वर्तमान समय मे तमाम लाल, नीले, केसरिया, हरे, पीले राजनैतिक खेमो का नेतृत्व करने वाले वर्ग को देखें तो एक दूसरे के विरोध मे अपनी सुबह-शाम खर्च करने के बावजूद इनके जीवन पद्धति मे लगभग समानता है, इनके व्यक्तिगत खातो मे प्रायः करोड़ो की धनराशि रहती है, ये कभी सार्वजनिक परिवहन, सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक चिकित्सा, सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की न तो निजी जीवन मे पैरवी करते हैं और न ही बगैर किसी राजनैतिक जरुरत के इनका उपयोग करते हैं।
असमानता की सहज स्वीकार्यता को जाति व्यवस्था ने हमारे जीवन मे पीढि़यों से प्रतिष्ठित कर रखा है और हमारे समाज का वंचित वर्ग इनके प्रति कृतज्ञ भाव रखने के लिए सदियों से अनुकूलित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरुप इन राजनैतिक नेतृत्वों के पीछे गोलबन्द समुदाय को उनकी मंहगी उपभोगवादी जीवन पद्धति चुभती नही है। इन गोलबन्द समुदायों के लम्पट युवा इनकी महंगी कारों मे लटक कर हथियारों को ढोने के अपने सौभाग्य पर वैसे ही इतराते हैं जैसे अंग्रेजी नौकरशाही द्वारा छोड़ी गयी परम्परा को निभाते चपरास का मुकुट पहन कर अर्दली इतराते रहते हैं।
उच्च मध्यमवर्गीय जीवन स्तर पाने की अभिलाषा मे अनैतिकता और लालच की होड़ पर लगाम लगाने के लिए और सादगी को पुर्नप्रतिष्ठित करने के लिए उपभोगवादी जीवन पद्धति की धुंधली पड़ चुकी सीमारेखाओं का पुर्न रेखांकन आवश्यक है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें